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संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 76 | Section 76 TPA in hindi

संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 76 – सकब्जा बंधकदार का दायित्व-

जबकि बन्धक चालू रहने के दौरान बन्धकदार बन्धक-सम्पत्ति का कब्जा ले लेता है, तब

(क) उसको उस सम्पत्ति का प्रबन्ध उस प्रकार करना होगा जैसा मामूली प्रज्ञावाला व्यक्ति उसका प्रबन्ध करता, यदि वह उसकी अपनी होती;

(ख) उसको उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों को वसूल करने में अपने सर्वोत्तम प्रयास करने होंगे;

(ग) तत्प्रतिकूल संविदा न हो तो उसे सरकारी राजस्व, लोक प्रकृति के सब अन्य प्रभार और ऐसे कब्जे के दौरान तत्संबंधी प्रोद्भवमान शोध्य सब भाटक और भाटक की ऐसी कोई बकाया, जिसका संदाय करने में व्यतिक्रम होने पर वह सम्पत्ति संक्षेपतः बेची जा सके, उस सम्पत्ति की आय में से देनी होगी;

( घ) तत्प्रतिकल संविदा न हो तो, उसे उस सम्पत्ति की ऐसी आवश्यक मरम्मत करानी होगी जिसके लिए वह उस सम्पत्ति के भाटकों और लाभों में से खंड (ग) में वर्णित संदायों की और मूलधन पर ब्याज की कटौती करने के पश्चात् उन भाटकों और लाभों में से संदाय कर सकता हो;

(ङ) वह ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जो सम्पत्ति के लिए विनाशक या स्थायी रूप से क्षतिकर हो;

(च) जहां कि उसने संपूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग या हानि या नुकसान के लिए, जो अग्नि से हो, बीमा कराया है, वहां ऐसी हानि या नुकसान होने पर, उसे ऐसा कोई धन, जिसे वह पालिसी के अधीन वस्तुतः प्राप्त करता है या उसमें से इतना, जितना आवश्यक हो, सम्पत्ति के यथापूर्वकरण में, अथवा यदि बन्धककर्ता ऐसा निदेश दे तो बन्धक धन के घटाने या भुगतान में उपयोजित करना होगा;

(छ) बंधकदार की हैसियत में उस द्वारा प्राप्त और खर्च की गई सब राशियों का स्पष्ट, पूरा और शुद्ध लेखा उसे रखना होगा और बन्धक के चालू रहने के दौरान किसी भी समय बन्धककर्ता को उसके निवेदन और खर्च पर ऐसे लेखाओं की और ऐसे वाउचरों की जिनसे वे समर्थित हों, सही प्रतियां देनी होंगी;

(ज) बन्धक-सम्पत्ति से उसे हुई प्राप्तियां, या जहां कि ऐसी सम्पत्ति उसके वैयक्तिक अधिभोग में है, वहां उस सम्पत्ति के बारे में उचित अधिभोग-भाटक, उस सम्पत्ति के प्रबंध के लिए और भाटकों और लाभों के संग्रह्ण के लिए समुचित रूप से उपगत व्ययों को और अन्य व्ययों को, जो खंड (ग) और (घ) में वर्णित है, तथा उन पर के ब्याज को काट लेने के पश्चात् उस रकम को (यदि कोई हो), जो समय-समय पर ब्याज मद्धे शोध्य हो, कम करने में और ऐसी प्राप्तियां, जितनी शोध्य व्याज से अधिक हो, बन्धक धन के चटाने या भुगतान में उसके प्रति विकलित की जाएंगी और अधिशेष, यदि हो, बन्धककर्ता को दे दिया जाएगा;

(झ) जब कि बन्धककर्ता बंधक पर तत्समय शोध्य रकम निविदत्त करता है या एतस्मिन्पश्चात् उपबन्धित प्रकार से निक्षिप्त करता है, तब बन्धकदार बन्धक-सम्पत्ति से, यथास्थिति, निविदा की तारीख से या उस पूर्वतम समय से, जब वह न्ययालय से ऐसी रकम निकाल सकता था, अपने को हुई प्राप्तियों का लेखा इस धारा के अन्य खंडों में के उपबन्धों के होते हुए भी देगा ‘और वह ऐसी तारीख या समय के पश्चात् किए गए बंधक सम्पत्ति संबंधी किन्हीं भी व्ययों मद्धे, कोई रकम उनमें से काटने का हकदार नहीं होगा।

उसके व्यतिक्रम के कारण हई हानि–यदि बन्धकदार इस धारा द्वारा अपने पर अधिरोपित कर्तव्यों में से किसी का पालन करने में असफल रहे, तो ऐसी असफलता के कारण हुई हानि, यदि कोई हो, उस समय, जब इस अध्याय के अधीन की गई किसी डिक्री के अनुसरण में लेखा लिया जाए, उसके प्रति विकलित की जा सकेगी।


Section 76 TPA – Liabilities of mortgagee in possession –

When, during the continuance of the mortgage, the mortgagee takes possession of the mortgaged property,–

(a) he must manage the property as a person of ordinary prudence would manage it if it were his own;

(b) he must use his best endeavours to collect the rents and profits thereof;

(c) he must, in the absence of a contract to the contrary, out of the income of the property, pay the Government-revenue, all other charges of a public nature 1[and all rent] accruing due in respect thereof during such possession, and any arrears of rent in default of payment of which theproperty may be summarily sold;

(d) he must, in the absence of a contract to the contrary, make such necessary repairs of the property as he can pay for out of the rents and profits thereof after deducting from such rents and profits the payments mentioned in clause (c) and the interest on the principal money;

(e) he must not commit any act which is destructive or permanently injurious to the property;

(f) where he has insured the whole or any part of the property against loss or damage by fire, he must, in case of such loss or damage, apply any money which he actually receives under the policy, or. so much thereof as may be necessary, in reinstating the property, or, if the mortgagor so directs, in reduction or discharge of the mortgage-money;

(g) he must keep clear, full and accurate accounts of all sums received and spent by him as mortgagee, and, at any time during the continuance of the mortgage, give the mortgagor, at his request and cost, true copies of such accounts and of the vouchers by which they are supported; संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 76

(h) his receipts from the mortgaged property, or, where such property is personally occupied by him. a fair occupation-rent in respect thereof shall, after deducting the expenses 2[properly incurred for the management of the property and the collection of rents and profits and the other expenses] mentioned in clauses (c) and (d), and interest thereon, be debited against him in reduction of the amount (if any) from time to time due to him on account of interest 3*** and, so far as such receipts exceed any interest due, in reduction or discharge of the mortgage-money; the surplus, if any, shall be paid to the mortgagor; संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 76

(i) when the mortgagor tenders, or deposits in manner hereinafter provided, the amount for the time being due on the mortgage, the mortgagee must, notwithstanding the provisions in the other clauses .of this section, account for his 4*** receipts from the mortgaged property from the date of the tender or from the earliest time when he could take such amount out of Court, as the case may be ‘and shall not be entitled to deduct any amount therefrom on account of any expenses incurred after such date or time in connection with the mortgaged property. संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 76

Loss occasioned by his default.-– If the mortgagee fail to perform any of the duties imposed upon him by this section, he may, when accounts are taken in pursuance of a decree made under this Chapter, be debited with the loss, if any, occasioned by such failure. संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 76


1. Ins. by s. 40, ibid.

2. Ins. by Act 20 of 1929, s. 40.

3. The words “on the mortgage-money” omitted by s. 40, ibid.

4. The word “gross” omitted by s. 40, ibid.

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