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IPC की धारा 77 | धारा 77 भारतीय दण्ड संहिता | IPC 77 In Hindi

IPC की धारा 77 — न्यायिकतः कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य –

कोई बात अपराध नहीं है, जो न्यायिकतः कार्य करते हुए न्यायाधीश द्वारा ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग में की जाती है, जो या जिसके बारे में उसे सद्भावपूर्वक विश्वास है कि वह उसे विधि द्वारा दी गई है।


IPC की धारा 77 के प्रमुख अवयव क्या हैं ?
कोई बात अपराध नहीं है, जो-
1. न्यायिकतः कार्य होना चाहिये ,
2. ऐसा कार्य न्यायाधीश द्वारा ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग में,
3. जिसके बारे में उसे सद्भावपूर्वक विश्वास है कि वह उसे विधि द्वारा दी गई है।

IPC की धारा 77 से संबंधित महत्वपूर्ण केस –

चन्दर नारायण सिंह बनाम ब्रज बल्लभ गुई, 14 बंगाल लॉ रि0 254
इस धारा की सुरक्षा केवल एक न्यायाधीश को ही प्राप्त होगी, जो न्यायिक कार्य को व्यावसायिक पद्धति से संपादित करते हुए होता है।
मेघराज बनाम जाकिर 1इला.280
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्णीत किया है कि "कोई व्यक्ति न्यायिकतः कार्य करते हुये, किसी कार्य को करने या करने के लिये आदेशित किये जाने पर अपने पदीय दायित्व का पालन करते हुये अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत करता है तो वह दायित्वाधीन नहीं होगा और ऐसे किसी मामले में सद्भावपूर्वक कार्य करने का प्रश्न ही नहीं उठता। सद्भावपूर्वक का प्रश्न अनुचित हैं. मात्र जबकि जज क्षेत्राधिकार के बाहर कार्य कर रहा है। परन्तु यदि क्षेत्राधिकार है तब उन्मुक्ति उन कार्यों तक भी विस्तृत रहती है जो क्षेत्राधिकार का दुरुपयोग गठित करते हैं।
सैलारनन्द पाण्डेय बनाम सुरेश चन्द्र, ए0 आई0 आर0 1969 पटना 194
एक मजिस्ट्रेट को मिथ्या कारावास के लिए जिम्मेदार माना जाएगा, यदि उसे ज्ञात होता है कि वह ऐसे विचारण पर क्षेत्राधिकार नहीं रखता है और उसने अवैध रूप से ऐसे व्यक्ति को दण्डित किया है।
कालडर बनाम हालके, 2 एम0 आई0 ए0 293
हर एक न्यायिक कार्य, चाहे वह न्यायालय में निष्पादित हुआ हो या न हुआ हो, आईपीसी की धारा 77 द्वारा संरक्षित माना जाएगा।

IPC की धारा 77 FAQ

  1. कोई बात अपराध नहीं है जो न्यायाधीश द्वारा न्यायिकत: कार्य करते हुए किया गया है।” किस धारा में कहा गया है ?

    IPC की धारा 77

  2. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 77 क्या है ?

    भारतीय दण्ड संहिता 77 के अनुसार- कोई बात अपराध नहीं है, जो न्यायिकत: कार्य करते हुए न्यायाधीश द्वारा ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग में की जाती है जो या जिसके बारे में उसे सद्भावपूर्वक विश्वास है कि वह उसे विधि द्वारा दी गयी है।

  3. IPC की धारा 77 में न्यायाधीश को उन्मुक्ति क्या सिविल प्रक्रियाओं में भी प्राप्त है?

    नहीं! इस धारा के अंतर्गत उन्मुक्ति केवल आपराधिक प्रक्रियाओं में ही प्राप्त है।

  4. आईपीसी की धारा 77 किसको संरक्षित करती है ?

    न्यायाधीश को |

  5. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 77 प्रमुख तत्व क्या है ?

    1. न्यायिकतः कार्य होना चाहिये ,
    2. ऐसा कार्य न्यायाधीश द्वारा ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग में,
    3. जिसके बारे में उसे सद्भावपूर्वक विश्वास है कि वह उसे विधि द्वारा दी गई है।

  6. सैलारनन्द पाण्डेय बनाम सुरेश चन्द्र, ए0 आई0 आर0 1969 का केस किस धारा से संबंधित हैं ?

    IPC की धारा 77 से

  7. मेघराज बनाम जाकिर 1इला.280 का केस किस धारा से संबंधित हैं ?

    आईपीसी की धारा 77 से

  8. चन्दर नारायण सिंह बनाम ब्रज बल्लभ गुई, का केस किस धारा से संबंधित हैं ?

    भारतीय दण्ड संहिता 77 से

IPC Section 77 — Act of Judge when acting judicially –

Nothing is an offence which is done by a Judge when acting judicially in the exercise of any power which is, or which in good faith he believes to be, given to him by law.

भारतीय दण्ड संहिता के लिए महत्वपूर्ण पुस्तकें –

भारतीय दंड संहिता,1860 – प्रो सूर्य नारायण मिश्र

भारतीय दंड संहिता, 1860 – डॉ. बसंती लाल

भारतीय दण्ड संहिता ( DIGLOT) [ENGLISH/HINDI] [BARE ACT]

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