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IPC की धारा 78 | धारा 78 भारतीय दण्ड संहिता | IPC 78 In Hindi

IPC की धारा 78 — न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य –

कोई बात, जो न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में की जाए या उसके द्वारा अधिदिष्ट हो, यदि वह उस निर्णय या आदेश के प्रवृत्त रहते की जाए, अपराध नहीं है, चाहे उस न्यायालय को ऐसा निर्णय या आदेश देने की अधिकारिता न रही हो, परन्तु यह तब जब कि वह कार्य करने वाला व्यक्ति सद्भावपूर्वक विश्वास करता हो कि उस न्यायालय को वैसी अधिकारिता थी।


IPC की धारा 78 के प्रमुख अवयव क्या हैं ?
कोई कार्य अपराध नहीं है जो –
1. न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में की जाए या उसके द्वारा अधिदिष्ट हो,
2. चाहे उस न्यायालय को ऐसा निर्णय या आदेश देने की अधिकारिता न रही हो,
3. परन्तु यह तब जब कि वह कार्य करने वाला व्यक्ति सद्भावपूर्वक विश्वास करता हो कि उस न्यायालय को वैसी अधिकारिता थी।

IPC की धारा 78 से संबंधित महत्वपूर्ण केस –

जान एन्डरन बनाम जे0 मेक्यून, 7 वी0रि0 (क्रि0) 12
जब किसी दीवानी आदेशिका के निष्पादन में एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए आफीसर नियुक्त किया जाता है, और उस आफीसर को यह सूचना मिलती है कि आशायित व्यक्ति मामले में एक साक्षी के रूप में न्यायालय जा रहा है, तो वास्तव में आशायित व्यक्ति ही उस मार्ग में मिलने की सूचना देता है। हालांकि, आफीसर ने फिर भी उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया, इसलिए इस मामले में यह निर्धारण किया गया कि आफीसर द्वारा किया गया कार्य इस धारा के तहत संरक्षित नहीं माना जाएगा, क्योंकि आशायित व्यक्ति साक्षी हो जाने पर गिरफ्तारी से अपवर्जित माना जायेगा ।

कपूर चन्द बनाम स्टेट, 1976 (3) क्रि० लॉ टाइम्स 370 (हि0 प्र0)
जब मजिस्ट्रेट की आदेश के अनुसार पति अपनी अवयस्क पत्नी को उसकी सहमति के बिना बलपूर्वक घर ले जाने की कोशिश करता है, तो उसे किसी अपराध के तहत कार्रवाई करते हुए नहीं माना जाएगा। (आईपीसी की धारा 78 संरक्षण)
कपूर चन्द बनाम स्टेट, 1976 (3) क्रि० लॉ टाइम्स 370 (हि) प्रदेश)
यह धारा 77 के उपप्रमेय के अंतर्गत आती है। इस धारा के तहत, व्यक्तियों को वह संरक्षण प्रदान किया जाता है जो किसी न्यायालय के निर्णय या आदेश का अनुसरण करते हैं।
जान एन्डरसन बनाम जे0 मेक्यून, 7 वी0 रि० (क्रि0) 12
आईपीसी की धारा 78 के अधीन संरक्षण प्राप्ती हेतु आदेश को विधिपूर्ण रीति से निष्पादित किया जाना आवश्यक है।

IPC की धारा 78 FAQ

  1. संहिता की किस धारा में विधि की भूल को “प्रतिरक्षा के रूप में अभिवाचित किया जा सकता है?

    IPC की धारा 78 में

  2. भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 78 किन अधिकारियों को प्रतिरक्षित करती है? 

    यह धारा किसी न्यायालय के निर्णय या आदेश के अंतर्गत कार्य करते हुए अधिकारियों की प्रतिरक्षा करती है। 

  3. भारतीय दण्ड संहिता की किस धारा के अंतर्गत न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य अपराध नहीं है?

    भारतीय दण्ड संहिता की धारा 78 अंतर्गत न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य अपराध नहीं है |

  4. एक जल्लाद जो मृत्युदण्ड को निष्पादित करता है. भा.दं.सं. की किस धारा के अन्तर्गत आपराधिक दायित्व से मुक्त है ?

    भारतीय दण्ड संहिता (भा. दं.सं.) की धारा 78 से

  5. IPC की धारा 78 क्या है ?

    IPC की धारा 78 न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य से संबंधित है I

  6. न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य की कौन सी धारा है ?

    IPC की धारा 78

IPC Section 78 — Act done pursuant to the judgment or order of Court –

Nothing which is done in pursuance of, or which is warranted by the judgment or order of, a Court of Justice; if done whilst such judgment or order remains in force, is an offence, notwithstanding the Court may have had no jurisdiction to pass such judgment or order, provided the person doing the act in good faith believes that the Court had such jurisdiction.

भारतीय दण्ड संहिता के लिए महत्वपूर्ण पुस्तकें –

भारतीय दंड संहिता,1860 – प्रो सूर्य नारायण मिश्र

भारतीय दंड संहिता, 1860 – डॉ. बसंती लाल

भारतीय दण्ड संहिता ( DIGLOT) [ENGLISH/HINDI] [BARE ACT]

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