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सीआरपीसी की धारा 83 | 83 CrPC in hindi

सीआरपीसी की धारा 83 – फरार व्यक्ति की सम्पत्ति की कुर्की —

(1) धारा 82 के अधीन उद्घोषणा जारी करने वाला न्यायालय, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे उद्घोषणा जारी किए जाने के पश्चात् किसी भी समय, उद्घोषित व्यक्ति की जंगम या स्थावर अथवा दोनों प्रकार की किसी भी सम्पत्ति की कुर्की का आदेश दे सकता है :

परन्तु यदि उद्घोषणा जारी करते समय न्यायालय का शपथ-पत्र द्वारा या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति जिसके संबंध में उद्घोषणा निकाली जाती है —

(क) अपनी समस्त संपत्ति या उसके किसी भाग का व्ययन करने वाला है, अथवा

(ख) अपनी समस्त संपत्ति या उसके किसी भाग को उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता से हटाने वाला है, तो वह उद्घोषणा जारी करने के साथ ही साथ कुर्की का आदेश दे सकता है।

(2) ऐसा आदेश उस जिले में, जिसमें वह दिया गया है, उस व्यक्ति की किसी भी संपत्ति की कुर्की प्राधिकृत करेगा और उस जिले के बाहर की उस व्यक्ति की किसी संपत्ति की कुर्की तब प्राधिकृत करेगा जब वह उस जिला मजिस्ट्रेट द्वारा, जिसके जिले में ऐसी संपत्ति स्थित है, पृष्ठांकित कर दिया जाए।

(3) यदि वह संपत्ति जिसको कुर्क करने का आदेश दिया गया है, ऋण या अन्य जंगम संपत्ति हो, तो इस धारा के अधीन कुर्की –

(क) अभिग्रहण द्वारा की जाएगी: अथवा

(ख) रिसीवर की नियुक्ति द्वारा की जाएगी; अथवा

(ग) उद्घोषित व्यक्ति को या उसके निमित्त किसी को भी उस सम्पत्ति का परिदान करने का प्रतिषेध करने वाले लिखित आदेश द्वारा की जाएगी; अथवा

(घ) इन रीतियों में से सब या किन्हीं दो से की जाएगी, जैसा न्यायालय ठीक समझे

(4) यदि वह संपत्ति जिसको कुर्क करने का आदेश दिया गया है, स्थावर है तो इस धारा के अधीन कुर्की राज्य सरकार को राजस्व देने वाली भूमि की दशा में उस जिले के कलेक्टर के माध्यम से की जाएगी जिसमें वह भूमि स्थित है और अन्य सब दशाओं में है और अन्य सब दशाओं में–

(क) कब्जा लेकर की जाएगी; अथवा

(ख) रिसीवर की नियुक्ति द्वारा की जाएगी; अथवा

(ग) उद्घोषित व्यक्ति को या उसके निमित्त किसी को भी उस सम्पत्ति का किराया देने या उस सम्पत्ति का परिदान करने का प्रतिषेध करने वाले लिखित आदेश द्वारा की जाएगी; अथवा

(घ) इन रीतियों में से सब या किन्हीं दो से की जाएगी, जैसा न्यायालय ठीक समझे ।  

(5) यदि वह संपत्ति जिसको कुर्क करने का आदेश दिया गया है, जीवधन है या विनश्वर प्रकृति की है तो, यदि न्यायालय समीचीन समझता है तो वह उसके तुरन्त विक्रय का आदेश दे सकता है और ऐसी दशा में विक्रय के आगम न्यायालय के आदेश के अधीन रहेंगे।

(6) इस धारा के अधीन नियुक्त रिसीवर की शक्तियाँ, कर्तव्य और दायित्व वे ही होंगे जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन नियुक्त रिसीवर के होते हैं।


83 CrPC in hindi – Attachment of property of person absconding —

(1) The Court issuing a proclamation under section 82 may, for reasons to be recorded in writing, at any time after the issue of the proclamation, order the attachment of any property, movable or immovable, or both, belonging to the proclaimed person:

Provided that where at the time of the issue of the proclamation the Court is satisfied, by affidavit or otherwise, that the person in relation to whom the proclamation is to be issued,–

(a) is about to dispose of the whole or any part of his property, or

(b) is about to remove the whole or any part of his property from the local jurisdiction of the Court,

it may order the attachment simultaneously with the issue of the proclamation.

(2) Such order shall authorise the attachment of any property belonging to such person within the district in which it is made; and it shall authorise the attachment of any property belonging to such person without such district when endorsed by the District Magistrate within whose district such property is situate.

(3) If the property ordered to be attached is a debt or other movable property, the attachment under this section shall be made–

(a) by seizure; or

(b) by the appointment of a receiver; or

(c) by an order in writing prohibiting the delivery of such property to the proclaimed person or to any one on his behalf; or

(d) by all or any two of such methods, as the Court thinks fit.

(4) If the property ordered to be attached is immovable, the attachment under this section shall, in the case of land paying revenue to the State Government, be made through the Collector of the district in which the land is situate, and in all other cases–

(a) by taking possession; or

(b) by the appointment of a receiver; or

(c) by an order in writing prohibiting the payment of rent on delivery of property to the proclaimed person or to any one on his behalf; or

(d) by all or any two of such methods, as the Court thinks fit.

(5) If the property ordered to be attached consists of live-stock or is of a perishable nature, the Court may, if it thinks it expedient, order immediate sale thereof, and in such case the proceeds of the sale shall abide the order of the Court.

(6) The powers, duties and liabilities of a receiver appointed under this section shall be the same as those of a receiver appointed under the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908).

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