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म.प्र.विशेष न्यायालय अधिनियम, 2011 |The Madhya Pradesh Vishesh Nyayalaya Adhiniyam – 2011 in hindi

विषय सूची 

अध्याय एक: प्रारम्भिक 

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ 

2. परिभाषाएं 

                अध्याय दो : विशेष न्यायालयों की स्थापना 

3.विशेष न्यायालयों की स्थापना

4. विशेष न्यायालयों द्वारा मामलों का संज्ञान 

5. इस अधिनियम के अधीन विचार किए जाने वाले मामलों की घोषणा  

6. घोषणा का अभाव

7. अपराधों के विचारण के बारे में विशेष न्यायालयों की अधिकारिता 

8. विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियाँ 

9. विशेष न्यायालयों के आदेशों के विरूध्द अपील 

10. मामलों का अन्तरण 

11. किसी विचारण को स्थगित करने के लिए विशेष न्यायालय का आबध्द नही होना

12. अपने पूर्ववर्ती द्वारा अभिलिखित की गई साक्ष्य पर पीठासीन न्यायाधीश द्वारा कार्रवाई का किया जाना 

अध्याय तीन: सम्पत्ति का अधिहरण 

13. सम्पत्ति का अधिहरण 

14.अधिहरण के लिए सूचना

15. कतिपय मामलों में सम्पत्ति का अधिहरण 

16. अंतरण का अकृत और शून्य होना 

17. अपील 

18. कब्जा लेने की शक्ति

19.अधिह्नत धन या सम्पत्ति की वापसी 

 

अधयाय चार : प्रकीर्ण 

20. विवरण में त्रुटि के कारण सूचना या आदेश का अविधिमान्य होना

21. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होना

22. अन्य कार्य बाहियों का वर्जन

23. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण

24. नियम बनाने की शक्ति

25. अध्यारोही प्रभाव

26. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति 

 

 

म.प्र.विशेष न्यायालय अधिनियम, 2011 

(म.प्र.अधिनियम क्र. 8 सन् 2012) 

1. उद्देश्यों और कारणों का कथन – लोक पद धारण करने वाले व्यक्तियों तथा लोक से वकों के भ्रष्टाचार के प्रकरणों में, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49) के अन्तर्गत विचारण किया जा कर अभियुक्त को दण्डित किया जाता है । 

2. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दृष्टि से, यह आवश्यक है कि ऐसे मामलों का शीघ्र निराकरण हो और अभियुक्त को दण्डित किया जाए और भ्रष्टाचार से अर्जित की गई सम्पत्ति को शासन द्वारा अधिहत किया जाए और जनहित के लिये उसका उपयोग किया जाए इससे ऐसे कृत्य करने वाले हतोत्साहित होंगे और समाज पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। 

3. उक्त प्रयोजन के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे न्यायाधीशों के विशेष न्यायालय स्थापित किए जाएँ जो सेशन न्यायाधीश या अतिरिक्त सेशन न्यायाधीश हों या रह चुकें हों और यह भी समीचीन है कि कुछ प्रक्रियात्मक परिवर्तन किए जाएँ जिससे कि जिन ब्यक्त्यिों का विचारण किया जाना है उनके दोषी होने या निर्देष होने के अंतिम अवधारण में, ऋजु विचारण के अधिकार में हस्तक्षेप किए बिना परिहार्य विलम्ब को दूर किया जाए। 

4. उपरोक्त उद्देश्यों को प्राप्त करने की दृष्टि से एक यथोचित विधि अधिनियमित किए जाने का विनिश्चय किया गया है। 

5अत: यह विधे यक प्रस्तुत है। 

 

 

मध्यप्रदेश

 विशेष न्यायालय अधिनियम, 2011 

(म. प्र. अधिनियम क्र. 8 सन् 2012)

[दिनांक 7 फरवरी, 2012 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई, अनुमति मध्य प्रदेश राजपत्र (असाधारण)में दिनांक 10 फरवरी, 2012 को प्रथम बार प्रकाशित की गई

अपराधों के कतिपय वर्ग के त्वरित विचारण और उनमें अन्तर्वलित सम्पत्तियों का अधिहरण करने के लिए विशेष न्यायालयों के गठन का और उससे संसक्त या आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिए अधिनियम । 

भारत गणराज्य के बासठवें वर्ष में मध्य प्रदेश विधानमण्डल द्वारा निम्नलिखित रूप में यह 

अधिनियमित हो

अध्याय – एक : प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ इस अधिनियम का संक्षिप्त नामध्यप्रदेश विशेष न्यायालय अधिनियम, 2011 हैं। 

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण मध्यप्रदेश पर होगा

(3) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे कि राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे । 

2. परिभाषाएँ (1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो :

(क) “अधिनियम से अभिप्रेत है, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (1988 का 49)

(ख) “प्राधिकृत अधिकारीसे अभिप्रेत है, धारा 14 के प्रयोजन के लिए, उच्च न्यायिक सेवा का कोई सेवारत अधिकारी और जो सेशन न्यायाधीश / अपर सेशन न्यायाधीश हो या रह चुका हो

(ग)”संहिता” से अभिप्रेत है, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2);

(घ) किसी अपराध के सम्बन्ध में “घोषणा से अभिप्रेत है, ऐसे अपराध के सम्बन्ध में धारा 5 के अधीन की गई घोषणा ;

() अपराधसे अभिप्नेहै, आपराधिक अवचार का ऐसा अपराध जो अधिनियम की धारा 13(1)() को या तो स्वतंत्र रूप से या अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध या भारतीय दण्ड संहिता, 1860(1860 का 45) के किसी उपबन्ध के साथ संयुक्त रूप से लागू करने के लिए प्रेरित करता हो;

(च) “विशेष न्यायालय से अभिप्रेत है, धारा 3 के अधीन स्थापित विशेष न्यायालय । 

(2) उन शब्दों और अभिव्यक्तियों के , जो इसमें प्रयुक्त हुए हों और जो परिभाषित नहीं किए गए हों किन्तु संहिता या अधिनियम में परिभाषित किए गए हों, वे ही अर्थ होंगे जो संहिता या अधिनिमय में क्रमश: उनके लिए दिए गए हैं

 

अध्याय – दो : विशेष न्यायालयों की स्थापना

3. विशेष न्यायालयों की स्थापना – (1) अपराध के त्वरित विचारण के प्रयोजन के लिए राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, उतनी संख्या में न्यायालयों की स्थापना करेगी जिन्हें विशेष न्यायालय कहा जाएगा । 

(2) विशेष न्यायालय की अध्यक्षता उच्च न्यायालय की सहमति से राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट न्यायाधीश द्वारा की जाएगी। 

(3) ऐसा कोई भी व्यक्ति किसी विशेष न्यायालयों के न्यायाधीश के रूप में नाम निर्दिष्ट किए जाने के लिए अहित नहीं होगा जब तक कि वह उच्चतर न्यायिक सेवा का सदस्य हो और जो राज्य में सत्र न्यायाधीश / अपर सत्र न्यायाधीश हो या रहा हो । 

4. विशेष न्यायालयों द्वारा मामलों का संज्ञान – विशेष न्यायालय ऐसे मामलों का  संज्ञान लेगा और उनका विचारण करेगा जो उसके समक्ष संस्थित किए जाएँ या धारा 10 के अधीन उसे अंतरित किए जाएँ । 

5. इस अधिनियम के अधीन विचार किए जाने वाले मामलों की घोषणा (1) जहाँ राज्य सरकार को प्रथम दृष्टया साक्ष्य के आधार पर यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा कथित रूप से किए गए किसी अपराध के किए जाने का समुचित आधार है, जो लोक पद धारण कर चुका हो अथवा धारण कर रहा हो और जो अधिनियम की धारा 2() के अर्थ के अन्तर्गत मध्य प्रदेश राज्य में लोक सेवक हो या रह चुका हो, तो राज्य सरकार ऐसे प्रत्येक मामले में, जिस में कि उसका उपरोक्त विश्वास हो, उस आशय की घोषणा करेगी। 

(2) ऐसी घोषणा को किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा। 

6. घोषणा का प्रभाव (1) ऐसी घोषणा कर दिए जाने पर, संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध के सम्बन्ध में कोई अभियोजन किसी विशेष न्यायालय में ही संस्थित किया जाएगा। 

(2) जहाँ धारा 5 के अधीन कोई घोषणा किसी ऐसे अपराध से सम्बन्धित है जिसके सम्बन्ध में पहले ही अभियोजन संस्थित किया जा चुका है तथा इससे सम्बन्धित कार्यवाहियाँ इस अधिनियम के अधीन विशेष न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय में लम्बित हैं, वहाँ तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसी कार्य वाहियाँ, इस अधिनियम के अनुसार अपराध के बिचारण के लिए विशेष न्यायालय को अन्तरित हो जाएँगी। 

7. अपराधों के विचारण के बारे में विशेष न्यायालयों की अधिकारिता – विशेष न्यायालय को किसी ऐसे व्यक्ति का मुख्य आरोपी, षडयंत्रकर्ता या दुष्प्रेरक के रूप में विचारण करने की अधिकारिता होगी जिसने कथित रूप से बह अपराध किया है जिसके सम्बन्ध में धारा 5 के अधीन घोषणा की गई हो, और उन समस्त व्यक्तियों का, संहिता के अनुसार एक ही विचारण में उनके साथ संयुक्त रूप से विचारण किया जा सकता है। 

8. विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियाँ (1) ऐसे मामलों के विचारण में विशेष न्यायालय मजिस्ट्रेट के समक्ष वारण्ट वाले मामलों के विचारण के लिए संहिता द्वारा विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा। 

(2) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित के सिवाय, संहिता और अधिनियम के उपबन्ध जहाँ तक वे इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत हों, विशेष न्यायालय के समक्ष की कार्य वाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबन्धों के प्रयोजन के लिए विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन संचालित करने वाले व्यक्ति लोक अभियोजक समझे जाएँगे । 

(3) विशेष न्यायालय उसके द्वारा किसी व्यक्ति को दोष सिद्ध ठहराए जाने पर, उसे उस अपराध के दण्ड के लिए जिसके लिए ऐसा व्यक्ति दोषी ठहराया गया हो, विधि द्वारा प्राधिकृत दण्डादेश पारित कर सकेगा। 

9. विशेष न्यायालयों के आदेशों के विरूद्ध अपील (1) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, विशेष न्यायालय के किसी निर्णय और दण्डादेश के विरूद्ध अपील तथ्यों एवं विधि दोनों आधार पर उच्च न्यायालय को की जाएगी। 

(2) उपरोक्त के सिवाय विशेष न्यायालय के किसी निर्णय, दण्डादेश या आदेश के विरूद्ध किसी न्यायालय में कोई अपील या पुनरीक्षण नहीं किया जाएगा। 

(3) इस धारा के अधीन प्रत्ये अपील, विशेष न्यायालय के निर्णय और दण्डादेश की तारीख से तीस दिन के भीतर प्रस्तुत की जाएगी

परन्तु उच्च न्यायालय तीस दिन की उक्त कालावधि का अवसान हो जाने के पश्चात् भी अपील स्वीकार कर सकेगा, यदि अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी के पास निर्धारित अवधि के भीतर अपील प्रस्तुत करने का पर्याप्त कारण था। 

10. मामलों का अन्तरण – इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के होते हुए भी, उच्च न्यायालय मामलों को एक विशेष न्यायालय से दूसरे विशेष न्यायालय में अन्तरित कर सकेगा। 

11. किसी विचारण को स्थगित करने के लिए विशेष न्यायालय का आबद्ध नहीं होना –(1) कोई विशेष न्यायालय किसी विचारण को किसी भी प्रयोजन के लिए तब तक स्थगित नहीं करेगा जब 

तक कि उसकी राय में तथा लिखित में अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से न्याय के हित में ऐसा स्थगन आवश्यक हो। 

(2) विशेष न्यायालय मामले के विचारण को, इसके संस्थित किए जाने अथवा अन्तरण की तारीख से एक बर्ष के भीतर निपटाने का प्रयास करेगा। 

12. अपने पूर्ववर्ती द्वारा अभिलिखित की गई साक्ष्य पर पीठासीन न्यायाधीश द्वारा कार्रवाई का किया जाना विशेष न्यायालय का कोई न्यायाधीश अपने पूर्ववर्ती या पूर्व बर्तियों द्वारा अभिलिखित अथवा अपने पूर्ववर्ती या पूर्ववर्तियों द्वारा आंशिक रूप से अभिलिखित तथा आंशिक रूप से अपने द्वारा अभिलिखित साक्ष्य के आधार पर कार्रवाई कर सकेगा। 

 

अध्याय तीन: सम्पत्ति का अधिहरण

13. सम्पत्ति का अधिहरण – (1) जहाँ राज्य सरकार को, प्रथम दृष्टया साक्ष्य के आधार पर यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी ऐसे व्यक्ति ने अपराध किया है, जो लोक पद धारण कर चुका हो या धारण कर रहा हो और जो लोक सेवक हो या लोक से बक रह चुका हो, तो राज्य सरकार, भले ही विशेष न्यायालय ने अपराध का संज्ञान लिया हो या लिया हो, इस अधिनियम के अधीन उस धन या सम्पत्ति के अधिहरण के लिए जिसके बारे में राज्य सरकार को यह विश्वास हो कि वह अपराध के द्वारा उपाप्त की गई है, लोक अभियोजक को, प्राधिकृत अधिकारी को आवेदन देने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी। 

(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन में

() एक या अधिक शपथपत्र संलग्न होंगे जिनमें उन आधारों का उल्लेख होगा जिन पर यह विश्वास किया किया गया हो कि उक्त व्यक्ति ने अपराध किया है तथा उस धन की उस रकम और अन्य सम्पत्ति के प्राक्कलित मूल्य का उल्लेख होगा जिसके बारे में यह विश्वास किया गया हो कि वह अपराध के द्वारा उपाप्त की गई है; और

() ऐसे किसी धन एवं अन्य सम्पत्ति की तत्समय की अवस्थिति के सम्बन्ध में उपलब्ध कोई सूचना भी अन्तर्विष्ट होगी तथा यदि आवश्यक हो तो, इस संदर्भ में सुसंगत समझी जाने वाली अन्य विशिष्टियाँ भी दी जाएँगी। 

14. अधिहरण के लिए सूचना – (1) धारा 13 के अधीन किया गया कोई आवेदन प्राप्त होने पर प्राधिकृत अधिकारी, उस व्यक्ति पर, जिसके सम्बन्ध में आवेदन किया गया है (जो इसमें इसके पश्चात प्रभावित व्यक्ति के रूप में निर्दिष्ट है) एक सूचना तामील करेगा जिसमें उससे ऐसे समय के भीतर जो कि सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, जो सामान्य ता तीस दिन से कम का नहीं होगा, उसकी उस आय, उपार्जन या आस्तियों का स्त्रोत बताने की अपेक्षा की जाएगी जिससे या जिसके द्वारा उसने ऐसा धन या सम्पत्ति अर्जित की है, वह साक्ष्य जिस पर बह निर्भर करता हो तथा अन्य सुसंगत जानकारी और विवरण देने की तथा यह कारण बताने की अपेक्षा की जाएगी कि क्यों ऐसा समस्त या कुछ धन या सम्पत्ति अथवा दोनों अपराध द्वारा अर्जित किए गए घोषित कर दिए जाएँ  और राज्य सरकार द्वारा अधिह्रत कर लिए जाएँ । 

(2) जब उपधारा (1) के अधीन किसी व्यक्ति को दी गई सूचना में किसी धन या सम्पत्ति या दोनों को ऐसे व्यक्ति के निमित्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा धारण किए जाने का विनिर्देश हो वहाँ सूचना की एक प्रति ऐसे अन्य व्यक्ति पर भी तामील की जाएगी। 

(3) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रभावित व्यक्ति द्वारा प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष अभिलिखित कराई गई साक्ष्य, सूचना और विशिष्टियाँ का विशेष न्यायालय के समक्ष विचारण में खण्डन किया जा सकेगा परन्तु ऐसा खण्डन इस अधिनियम के अधीन विशेष न्यायालय द्वारा अपराधी के अपराध के अवधारण और न्यायनिर्णयन के विचारण तक ही सीमित होगा। 

15. कतिपय मामलों में सम्पत्ति का अधिहरण – (1) धारा 14 के अधीन जारी किए गए कारण बताओं सूचना के स्पष्टीकरण, यदि कोई हो, तथा उसके समक्ष उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के पश्चात और प्रभावित व्यक्ति को (तथा उस दशा में जहाँ प्रभावित व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से सूचना में विनिर्दिष्ट कोई धन या संपत्ति धारण करता हो, ऐसे अन्य व्यक्ति को भी) सुनवाई का युक्ति युक्त अवसर प्रदान करने के पश्चात , प्राधिकृत अधिकारी, आदेश द्वारा , निष्कर्ष अभिलिखित करे गा कि क्या प्रश्न गत समस्त या कोई अन्य धन या सम्पत्ति विधि विरूद्ध अर्जित की गई 

(2) जहाँ प्राधिकृत अधिकारी वह विनिर्दिष्ट करता है कि कारण बताओ सूचना में निर्दिष्ट कुछ धन या सम्पत्ति या दोनेां अपराध के माध्यम से अर्जित किए गए हैं, किन्तु ऐसे धन या सम्पत्ति को विनिर्दिष्टत: चिन्हित करने में समर्थ होता हो तो प्राधिकृत अधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह धन या सम्पत्ति या दोनेां विनिर्दिष्ट करे जो उसके सर्वोत्तम निर्णय के अनुसार अपराध के माध्यम से अर्जित किए गए हैं और उपधारा (1) के अधीन तद्नुसार निष्कर्ष अभिलिखित करेगा। 

(3) जहाँ, प्राधिकृत अधिकारी इस धारा के अधीन इस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करता है कि कोई धन या सम्पत्ति या दोनों अपराध के माध्यम से अर्जित किए गए हैं वहाँ वह घोषित करेगा कि ऐसा धन या सम्पत्ति या दोनों, इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए सभी विल्लं गमों से मुक्त राज्य सरकार को अधिहत माने जाएँगें

परन्तु यदि अधिह्नत सम्पत्ति का बाजार मूल्य प्राधिकृत अधिकारी के पास जमा कर दिया गया हो तो सम्पत्ति अधिह्रत नहीं की जाएगी। 

(4) जहाँ इस अधिनियम के अधीन, किसी कम्पनी को कोई शेयर राज्य सरकार को अधिहत माना जाता है तो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) अथवा कम्पनी के संगम अनुच्छेदों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कम्पनी तुरन्त राज्य सरकार को ऐसे शेयर के अंतरिती के रूप में रजिस्ट्रीकृत करेगी। 

(5) इस अध्याय के अधीन धन या सम्पत्ति या दोनेां के अधिहरण की प्रत्येक कार्यवाही धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन सूचना तामील किए जाने की तारीख से छह मास की कालावधि के भीतर निपटाई जाएगी। 

(6) इस धारा के अधीन पारित अधिहरण का आदेश, अपील, यदि कोई हो, में पारित आदेश के अध्यधीन रहते हुए धारा 17 के अधीन अंतिम होगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा। 

16. अंतरण का अकृत और शून्य होना – जहाँ धारा 14 के अधीन, सूचना जारी किए जाने के पश्चात उक्त सूचना में निर्दिष्ट कोई धन या सम्पत्ति या दोनों को किसी भी तरीके से अंतरित किया जाता हो, वहाँ ऐसा अन्तरण, इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के प्रयोजनों के लिए शून्य होगा और यदि ऐसा धन या सम्पत्ति या दोनों तत्पश्चात् धारा 15 के अधीन राज्य सरकार को अधिहत हो जाते हों तो ऐसा धन या सम्पत्ति या दोनों का अंतरण अकृत और शून्य माना जाएगा। 

17. अपील – (1) इस अध्याय के अधीन प्राधिकृत अधिकारी के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उस तारीख से जिसको कि अपीलीय आदेश पारित किया गया था, तीस दिन के भीतर उच्च न्यायालय को अपील कर सकेगा । 

(2) इस धारा के विरूद्ध कोई अपील की जाने पर, उच्च न्यायालय ऐसे पक्षकारों को, जिन्हें वह उचित समझे, सुनवाई का अवसर प्रदान कर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा कि वह उचित समझे। 

(3) उपधारा (1) के अधीन की गई कोई अपील उसके किए जाने की तारीख से छह मास की कालावधि के भीतर निपटाई जाऐगी और स्थगन आदेश, यदि कोई हो, अपील में पारित किया जाता है तो अपील का निपटारा विहित कालावधि के परे प्रवृत्त नहीं रहेगा

 18. कब्जा लेने की शक्ति – (1) जहाँ इस अधिनियम के अधीन, कोई धन या संपत्ति या दोनों राज्य सरकार को अधिह्रत हो गए हों वहाँ सम्बन्धित प्राधिकृत अधिकारी प्रभावित व्यक्ति के साथसाथ किसी अन्य व्यक्ति को, जिसके कब्जे में धन या सम्पत्ति या दोनों हों, आदेश देगा कि वह आदेश तामील किए जाने के तीस दिन के भीतर सम्बन्धित प्राधिकृत अधिकारी को या इस निमित्त उसके द्वारा सम्यक रूप से प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति को अभ्यर्पित कर दे अथवा उसका कब्जा दे 

परन्तु प्राधिकृत अधिकारी इस निमित्त आवेदन दिए जाने पर तथा यह समाधान कर लेने पर कि प्रभावित व्यक्ति प्रश्नगत सम्पत्ति में निवास कर रहा है उसे उससे तत्काल बेदखल करने के बदले में ऐसे व्यक्ति को विनिर्दिष्ट की जाने वाली सीमित कालावधि तक के लिए राज्य सरकार को बाजार दर का भुगतान कर उसका कब्जा बनाए रखने की अनुमति दे सके गा और उसके पश्चात ऐसा व्यक्ति उस सम्पत्ति का खाली कब्जा सौंप देगा। 

(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश का पालन करने से इंकार करता है या पालन करने में असफल रहता है तो प्राधिकृत अधिकारी संपत्ति को कब्जे में ले सके गा और उस प्रयोजन के लिये ऐसे बल का प्रयोग कर सकेगा जैसा कि आवश्यक हो । 

(3) उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकृत अधिकारी उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी धन या सम्पत्ति या दोनों का कब्जा लेने के प्रयोजन के लिए सहायता के लिए किसी पुलिस अधिकारी की सेवा की अध्यपेक्षा कर सकेगा और ऐसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करना ऐसे अधिकारी का आबद्धकारी कर्तव्य होगा। 

19. अधिहत धन या सम्पत्ति की वापसी – जहाँ धारा 15 के अधीन किया गया अधिहरण का आदेश अपील में उच्च न्यायालय द्वारा उपांतरित या बातिल कर दिया जाता है या जहाँ प्रभाबित व्यक्ति विशेष न्यायालय द्वारा दोषमुक्त कर दिया जाता है, वहाँ धन या सम्पत्ति या दोनों प्रभावित व्यक्ति को वापस कर दिए जाएँगे और यदि किसी कारण से सम्पत्ति वापस करना संभव हो, तो ऐसे व्यक्ति को इस प्रकार अधिहत धन को सम्मिलित करते हुए उसके मूल्य का भुगतान अधिहरण की तारीख से उस पर पाँच प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से परिगणित ब्याज सहित किया जाएगा। 

अध्याय चार : प्रकीर्ण 

20. विवरण में त्रुटि के कारण सूचना या आदेश का अविधिमान्य न होना – इस अधिनियम के अधीन जारी की गई या तामील की गई कोई सूचना, की गई घोषणा और पारित कोई आदेश, उसमें उल्लिखित सम्पत्ति या व्यक्ति के विवरण में किसी त्रुटि के कारण अविधिमान्य नहीं समझी जाएगी, यदि ऐसी सम्पत्ति या व्यक्ति ऐसे उल्लिखित विवरण से पहचाने जाने योग्य है । 

21. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होना – इस अधिनियम के उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे कि उसका अल्पीकरण करने वाले और इसमें अंतर्विष्ट कोई भी बात किसी लोक सेबक को ऐसी किसी कार्यवाही से, जो उसके विरूद्ध इस अधिनियम के अलावा संस्थित की जा सकती हो, विवर्जित नहीं करेगी। 

22. अन्य कार्यवाहियों का वर्जन धारा 9 और धारा 17 में यथा उपबन्धित के सिवाय तथा किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, धारा 15 के अधीन किसी धन या सम्पत्ति या दोनों का अधिहत किए जाने के आदेश के सम्बन्ध में किसी न्यायालय में कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकेगी। 

23. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए किसी व्यक्ति के विरूद्ध कोई वाद, अभियोजन या कोई अन्य विधिक कार्य बाही नहीं होगी। 

24. नियम बनाने की शक्ति (1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसे नियम, यदि कोई हों, बना सकेगी, जो इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक समझे जाएँ। 

(2) उपधारा (1) के अधीन बनाए गए प्रत्येक नियम राज्य विधानमण्डल के समक्ष रखे जाएँगें । 

25. अध्यारोही प्रभाव अधिनियम अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में की किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के उपबन्ध किसी असंगति की दशा में अभिभावी होंगे । 

26. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति – यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उद्भूत होती है तो राज्य सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत हो, कठिनाई दूर कर सकेगी :

परन्तु कोई ऐसा आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ होने से दो वर्ष की कालावधिका अवसान होने के पश्चात नहीं किया जाएगा ।