मामला: Rajneesh Chaturvedi v. High Court of Madhya Pradesh & Others
याचिका संख्या: Writ Petition No. 18528/2025
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं माननीय न्यायमूर्ति अमित सेठ
निर्णय दिनांक: 10 जुलाई 2025
प्रकरण का संक्षेप:
याचिकाकर्ता राजनीश चतुर्वेदी द्वारा जबलपुर उच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने जिला न्यायिक मजिस्ट्रेट सुश्री खालिदा तनवीर के विरुद्ध की गई शिकायत को बिना कारण बताए निस्तारित (फाइल) कर देने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने इस बात पर आपत्ति जताई कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया प्रशासनिक आदेश “non-speaking order” है, और उसमें कोई कारण नहीं बताया गया कि शिकायत को क्यों खारिज किया गया।
याचिकाकर्ता की शिकायत के प्रमुख बिंदु:
- याचिकाकर्ता को IPC की धारा 332 में दोषी ठहराया गया था, जबकि अन्य धाराओं में बरी किया गया था।
- उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायाधीश ने उन्हें मौखिक रूप से भरोसा दिलाया कि वह दोषमुक्त होंगे और बचाव साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है।
- इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (विजिलेंस) को शिकायत भेजी थी।
न्यायालय का निर्णय और टिप्पणी:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक आदेशों को हर बार “speaking order” होना अनिवार्य नहीं, जब तक कि वह किसी व्यक्ति के वैधानिक या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन न करें।
- शिकायतकर्ता का शिकायत भेजने के बाद कोई अधिकार शेष नहीं रहता कि न्यायालय उस पर अनिवार्य रूप से कार्रवाई करे।
- कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आरोपों को “अमूर्त, असत्य और कपटपूर्ण” करार दिया।
- कोर्ट ने यह भी माना कि यह याचिका न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और अपीलीय कार्यवाही को प्रभावित करने का प्रयास थी।
दंडात्मक कार्यवाही:
- न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए, याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया।
- यह राशि 10 दिनों के भीतर मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (MPSLSA) के खाते में जमा करनी होगी।
- समय पर भुगतान न होने की स्थिति में यह राशि राजस्व बकाया के रूप में वसूल की जाएगी।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी:
“जिला न्यायपालिका पर झूठे आरोप लगाकर दबाव बनाने की प्रवृत्ति अत्यंत निंदनीय है और इसे सख्ती से रोका जाना चाहिए।”
याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत महत्वपूर्ण निर्णय:
- Kranti Associates Pvt. Ltd. v. Masood Ahmed Khan, (2010) 9 SCC 496:
- सभी न्यायिक, अर्ध-न्यायिक और प्रशासनिक आदेशों में कारण दिया जाना आवश्यक है।
- कारण देना न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांतों का अनिवार्य अंग है।
- Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner, (1978) 1 SCC 405:
- सार्वजनिक आदेश को उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए जैसा वह लिखा गया हो, न कि बाद में दिए गए स्पष्टीकरणों के आधार पर।
- आदेश को निष्पक्ष और पारदर्शी भाषा में होना चाहिए।
न्यायालय का विचार (Judicial Reasoning):
- प्रशासनिक आदेशों की प्रकृति:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हर प्रशासनिक आदेश को “speaking order” होना आवश्यक नहीं है।
- केवल वही आदेश जिनसे किसी व्यक्ति का वैधानिक या संवैधानिक अधिकार प्रभावित होता हो, उनके लिए कारण देना आवश्यक है।
- शिकायतकर्ता की स्थिति:
- शिकायतकर्ता केवल सूचना देने वाला (messenger) होता है — उसे यह कानूनी अधिकार नहीं है कि उसकी शिकायत पर अनिवार्य रूप से जांच या कार्रवाई की जाए।
- यदि कोई जज अपने न्यायिक कर्तव्यों का पालन करते हुए कोई निर्णय लेता है, तो उस पर शिकायत करना प्रशासनिक विवेक का विषय है, न कि अधिकार।
- शिकायत की विश्वसनीयता:
- शिकायत में दिए गए आरोप बिना किसी समय, तिथि, स्थान के अस्पष्ट एवं असंगत थे।
- यह प्रतीत होता है कि शिकायत का उद्देश्य अपील अदालत को प्रभावित करना था।
- अत्यधिक दुरुपयोग का आरोप:
- अदालत ने कहा कि जिला न्यायाधीश दो तरफा दबाव में काम कर रहे हैं — एक ओर उच्च न्यायालय का दबाव, दूसरी ओर झूठी शिकायतों का डर।
- इस प्रवृत्ति को “विधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग” माना गया।
न्यायिक महत्व (Judicial Significance):
- यह निर्णय स्पष्ट करता है कि:
- शिकायतकर्ता को यह अधिकार नहीं कि उनकी शिकायत पर जांच या कार्यवाही अवश्य हो।
- हर प्रशासनिक आदेश को “speaking order” बनाना आवश्यक नहीं, जब तक वह किसी कानूनी अधिकार को प्रभावित न करता हो।
- न्यायपालिका को झूठी शिकायतों से संरक्षित रखना आवश्यक है ताकि निर्णय स्वतंत्रता से लिए जा सकें।
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