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मात्र रिश्वत की वसूली से सजा नहीं – मांग और स्वीकार का सबूत अनिवार्य धारा 7 और 13(1)(d) पीसी एक्ट में दोषसिद्धि रद्द : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

जगेश्वर प्रसाद अवधिया बनाम राज्य छत्तीसगढ़ (CRA No.1086 of 2004) में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु ने 09 सितम्बर 2025 को दिए गए निर्णय में स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 की धारा 7 और धारा 13(1)(d) के अंतर्गत दोषसिद्धि तभी संभव है जब मांग (Demand) और स्वीकार (Acceptance) का ठोस सबूत प्रस्तुत किया जाए। इस मामले में केवल नोटों की बरामदगी और हाथ धुलाई का परिणाम (हाथ गुलाबी होना) पर्याप्त नहीं माना गया। गवाहों के विरोधाभासी बयानों और साक्ष्यों में खामियों को देखते हुए अदालत ने जगेश्वर प्रसाद अवधिया को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

प्रकरण की पृष्ठभूमि

यह मामला भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act) की धारा 7 एवं धारा 13(1)(d) से जुड़ा हुआ है। अपीलकर्ता जगेश्वर प्रसाद अवधिया, जो उस समय MPSRTC में बिल असिस्टेंट के रूप में कार्यरत थे, पर आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता से ₹100 की घूस मांगी थी ताकि उसके वेतन एरियर का बिल तैयार कर सकें।

शिकायतकर्ता अशोक कुमार वर्मा ने लोकायुक्त कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर ट्रैप की कार्यवाही की गई। ट्रैप के दौरान आरोपी को नोटों के साथ पकड़ने का दावा किया गया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी मानते हुए एक साल की सश्रम कारावास एवं ₹1000 का जुर्माना लगाया था।


अभियोजन का पक्ष

अभियोजन का कहना था कि आरोपी ने स्पष्ट रूप से ₹100 की मांग की और शिकायतकर्ता से दो ₹50 के नोट स्वीकार किए।

  • नोटों पर फिनॉल्फथेलिन पाउडर लगाया गया था, जो आरोपी की गिरफ्तारी के समय उसकी जेब से बरामद हुए।
  • आरोपी के हाथ का धुलाई परीक्षण (Handwash Test) गुलाबी हो गया, जिससे यह साबित हुआ कि उसने नोटों को छुआ था।
  • अभियोजन ने इसे भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 7 और धारा 13(1)(d) के तहत पूर्ण अपराध बताया।

अपीलकर्ता का बचाव

आरोपी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि –

  • आरोपी के पास बिल तैयार करने की शक्ति नहीं थी क्योंकि बिल तैयार करने का आदेश 19.11.1986 को प्राप्त हुआ था, जबकि शिकायत और ट्रैप की घटना 24.10.1986 की थी।
  • कई गवाहों (DW2, DW3) ने बताया कि शिकायतकर्ता ने पहले भी ₹20 जबरन देने की कोशिश की थी और आरोपी ने उसे मना कर दिया था।
  • गवाहों के बयान विरोधाभासी थे, किसी ने ₹100 के नोट की बात कही, किसी ने दो ₹50 नोटों की।
  • ट्रैप पार्टी के सदस्य 20–25 गज दूर थे और न तो बातचीत सुन सके और न ही लेन-देन देख सके।

हाईकोर्ट का अवलोकन

हाईकोर्ट ने मामले के सभी मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण किया।

  • मांग और स्वीकार के स्पष्ट सबूत प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
  • केवल शिकायतकर्ता के बयान पर अभियोजन का केस खड़ा था, जबकि अन्य गवाहों ने मांग या स्वीकार को स्पष्ट रूप से नहीं देखा।
  • ट्रैप मनी की पहचान में विरोधाभास (₹100 या दो ₹50) अभियोजन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
  • सिर्फ नोट बरामद होने और हाथ धुलाई से गुलाबी रंग आने से दोषसिद्धि नहीं की जा सकती, जब तक मांग और स्वीकार साबित न हों।
  • सुप्रीम कोर्ट के B. Jayaraj v. State of A.P. (2014) और Neeraj Dutta v. State (2022) फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि मांग और स्वीकार का प्रमाण sine qua non है।

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कहा:

  • अभियोजन मांग और स्वीकार साबित करने में विफल रहा।
  • आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।
  • दोषसिद्धि और सजा दोनों रद्द की जाती हैं।
  • आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया जाता है।

कानूनी महत्व

यह फैसला पुनः स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अंतर्गत केवल नोटों की बरामदगी पर्याप्त नहीं है।
मांग (Demand) और स्वीकार (Acceptance) को ठोस साक्ष्य से साबित करना आवश्यक है। यह निर्णय उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण नजीर है जहां अभियोजन केवल ट्रैप और बरामदगी पर आधारित होता है।

Case Citation

मामला; जगेश्वर प्रसाद अवधिया बनाम राज्य छत्तीसगढ़ CRA No. 1086 of 2004
न्यायालय: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
न्यूट्रल सिटेशन: 2025:CGHC:45932
निर्णय दिनांक: 09 सितम्बर 2025
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्री बिभु दत्त गुरु

अधिवक्ता (अपीलकर्ता पक्ष):श्री केशव देवांगन, अधिवक्ता
अधिवक्ता (प्रतिवादी/राज्य की ओर से ):श्री यू.के.एस. चंदेल, उप महाधिवक्ता (Dy. A.G.)

Source – High Court Of Chhattisgarh

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