पुष्पराज सिंह बनाम भारत संघ व अन्य
याचिका संख्या: W.P. No. 7043/2021
न्यायालय: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन
निर्णय की तिथि: 24 जुलाई 2025
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर की एक महत्वपूर्ण और विधिक दृष्टिकोण से दूरगामी प्रभाव वाली निर्णय में न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने सेना भर्ती कार्यालय द्वारा किशोरावस्था में अपराध के आधार पर पुष्पराज सिंह की नियुक्ति को अस्वीकार करने की कार्रवाई को ग़लत और कानून विरुद्ध करार देते हुए निरस्त कर दिया।
यह आदेश 24 जुलाई 2025 को रिट याचिका क्रमांक 7043/2021 में पारित किया गया। याचिकाकर्ता पुष्पराज सिंह ने सेना में सोल्जर/जनरल ड्यूटी के पद हेतु परीक्षा और शारीरिक परीक्षण दोनों में सफलता प्राप्त की थी, लेकिन उसका पुलिस सत्यापन रिपोर्ट के आधार पर चयन रोका गया क्योंकि उसमें उसकी पूर्व किशोरावस्था की सज़ा का उल्लेख था।
🔷 मामले की पृष्ठभूमि
पुष्पराज सिंह पर 2017 में धारा 294, 323, 506 IPC के तहत मामूली आरोप लगे थे। यह घटना उस समय की है जब वह अप्राप्तवय (juvenile) था। उसे किशोर न्याय बोर्ड, सतना द्वारा केवल ₹1000 जुर्माने की सज़ा दी गई थी और बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया था कि यह निर्णय उसके भविष्य में किसी भी प्रकार की अयोग्यता नहीं माने जाएंगे।
हालाँकि, सेना भर्ती कार्यालय ने उसकी पूर्व जानकारी को न दर्शाने (non-disclosure) के आधार पर उसकी नियुक्ति रोक दी।
कानूनी विश्लेषण:
1. प्रमुख मुद्दा (Issue):
क्या किसी ऐसे व्यक्ति को, जो नाबालिग अवस्था में किसी मामूली आपराधिक मामले में दोषी पाया गया हो, और जिसने उस जानकारी को नियुक्ति फॉर्म में नहीं दर्शाया हो, नियुक्ति से अयोग्य ठहराया जा सकता है?
2. विधिक प्रावधान (Relevant Legal Provisions):
a) Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015:
- धारा 24(1): “न्याय बोर्ड द्वारा नाबालिग के विरुद्ध निर्णय आने पर भी, उसे भविष्य में किसी प्रकार की अयोग्यता नहीं भुगतनी होगी।”
- धारा 24(2): “ऐसे रिकॉर्ड को अपील की अवधि के बाद नष्ट कर देना चाहिए, जब तक कि वह कोई गंभीर (heinous) अपराध न हो।”
- धारा 3(xiv): Principle of Fresh Start: “किसी भी बालक के खिलाफ Juvenile Justice प्रणाली में दर्ज समस्त रिकॉर्ड मिटा दिए जाने चाहिए, जब तक कोई विशेष परिस्थिति न हो।”
3. अदालत की व्याख्या (Judicial Reasoning):
🔹 प्रतियोगी परीक्षाएं व नियुक्तियाँ:
- याचिकाकर्ता ने सेना में सिपाही (GD) पद हेतु लिखित व शारीरिक परीक्षण उत्तीर्ण किया था।
- उसे केवल इसलिए नियुक्ति नहीं दी गई क्योंकि पुलिस वेरिफिकेशन में पूर्व किशोरवय अपराध की जानकारी सामने आई।
🔹 पूर्व अपराध की प्रकृति:
- अपराध अत्यंत सामान्य (trivial) श्रेणी का था – IPC की धारा 294, 323, 506।
- किशोर न्याय बोर्ड ने सिर्फ ₹1000 का जुर्माना लगाया था।
🔹 रिकॉर्ड व गोपनीयता:
- कोर्ट ने माना कि जब JJ Act स्वयं ऐसे रिकॉर्ड को नष्ट करने और सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं करने की बात करता है, तो नियोक्ता को यह जानने या इसका उपयोग करने का अधिकार नहीं है।
🔹 जानकारी छिपाना – क्या धोखाधड़ी है?
- कोर्ट ने कहा, जब कानून ऐसे रिकॉर्ड को स्वतः नष्ट करने का आदेश देता है, तब जानकारी न देना “suppression of material fact” नहीं माना जा सकता।
- Juvenile को ऐसे मामलों की जानकारी देने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
4. न्यायिक मिसालें (Judicial Precedents):
- Union of India v. Ramesh Bishnoi, (2019) 19 SCC 710
– नाबालिग के अपराध को भविष्य में नियुक्ति में अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता। - Lokesh Kumar v. State of Chhattisgarh, SLP (Crl.) No. 851/2025
– पुलिस द्वारा पुरानी जानकारी उजागर करना JJ Act का उल्लंघन है। - Mohd. Parvej Alam v. UOI (2024) और Akhilesh Kumar v. UOI (2018)
– Juvenile द्वारा जानकारी न देना “विलफुल suppression” नहीं माना जाएगा।
5. 🔍 न्यायालय का निष्कर्ष (Conclusion of the Court):
- याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामूली किशोरवय अपराध की जानकारी न देना कानून के तहत दंडनीय नहीं है।
- सेना द्वारा नियुक्ति न देना कानून के विरुद्ध है।
- नियोक्ता को निर्देश: याचिकाकर्ता को नियुक्ति पत्र एक माह के भीतर दिया जाए।
निष्कर्षात्मक टिप्पणी (Doctrinal Commentary):
- बाल अधिकारों का संरक्षण: यह फैसला Juvenile Justice Act की “rehabilitative” प्रकृति को मज़बूती देता है।
- गोपनीयता और पुनर्वास: यह स्पष्ट करता है कि बच्चों के खिलाफ दर्ज मामूली आपराधिक रिकॉर्ड को संरक्षित नहीं किया जा सकता, न ही उनका उपयोग जीवनभर के लिए बाधा के रूप में किया जा सकता है।
- प्रशासनिक सुधार: पुलिस वेरिफिकेशन और सरकारी संस्थाओं को JJ Act के प्रावधानों के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है।
न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि:
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 24 के अनुसार, किसी किशोर को सज़ा मिलने के बावजूद कोई स्थायी अयोग्यता नहीं लगाई जा सकती।
- धारा 3(xiv) के अंतर्गत “नई शुरुआत का सिद्धांत (principle of fresh start)” लागू होता है, जिसके अनुसार किशोर का पूरा रिकॉर्ड मिटा दिया जाना चाहिए जब तक कोई विशेष परिस्थिति न हो।
- अतः, याचिकाकर्ता को अपने किशोरावस्था की सज़ा का विवरण देने की कानूनी आवश्यकता नहीं थी, और न ही उस “छिपाने” को कोई गलत मंशा माना जा सकता है।
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