मामला: मनोहर सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
रिट याचिका संख्या: 3504/2020
निर्णय दिनांक: 31 जुलाई 2025
न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने रिट याचिका संख्या 3504/2020 में याचिकाकर्ता मनोहर सिंह को बड़ी राहत देते हुए गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल द्वारा की गई नियुक्ति प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण और अवैध करार दिया है। न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने यह फैसला 31 जुलाई 2025 को सुनाया।
प्रमुख विषयवस्तु:
यह याचिका गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल द्वारा अस्पताल प्रबंधक, सहायक अस्पताल प्रबंधक और डिप्टी रजिस्ट्रार के पदों पर भर्ती प्रक्रिया में की गई अयोग्यता की कार्यवाही को चुनौती देने हेतु दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता मनोहर सिंह को MBA (Hospital Management) की डिग्री होने के बावजूद दो पदों पर अयोग्य घोषित कर दिया गया, जबकि एक पद पर योग्य माना गया।
याचिकाकर्ता का तर्क:
याचिकाकर्ता के पास पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से प्राप्त MBA (Hospital Management) की मान्य डिग्री है।
- उसे अनुचित रूप से अयोग्य ठहराया गया, जबकि अन्य उम्मीदवारों की समान डिग्री स्वीकार की गई।
- OBC डिजिटल प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के बावजूद उसे आयु में छूट नहीं दी गई।
- भर्ती प्रक्रिया में दुर्भावना, भेदभाव और पारदर्शिता की कमी रही।
प्रतिवादी का पक्ष:
- याचिकाकर्ता की डिग्री पर “Hospital Management” ब्रैकेट में नहीं लिखा गया है, इसलिए अयोग्य माना गया।
- केवल डिग्री की प्रति मांगी गई थी, मार्कशीट की नहीं।
- OBC प्रमाण पत्र डिजिटल नहीं था, इसलिए आयु छूट अस्वीकार्य मानी गई।
3. न्यायालय के अवलोकन (Observations of the Court):
- याचिकाकर्ता की शैक्षणिक योग्यता MBA (Hospital Management) थी, जो Punjab Technical University से प्राप्त थी, और UGC द्वारा मान्यता प्राप्त थी।
- उत्तरदाताओं ने बिना ठोस आधार के केवल “ब्रैकेट में शब्द न होने” का हवाला देकर डिग्री को अमान्य घोषित कर दिया।
- याचिकाकर्ता ने OBC डिजिटल प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था, जिसे उत्तरदाताओं ने “मैनुअल” कहकर खारिज किया, जबकि प्रमाणपत्र में स्पष्ट रूप से QR कोड और वेब सत्यापन की सुविधा थी।
- डिप्टी रजिस्ट्रार पद के लिए योग्य ठहराना और अन्य दो पदों पर अयोग्य ठहराना स्वयं में ही भेदभाव और द्वैध मापदंड को दर्शाता है।
4. विधिक सिद्धांतों का प्रयोग (Application of Legal Principles):
A. Mohinder Singh Gill बनाम Chief Election Commissioner (1978) 1 SCC 405
न्यायालय ने दोहराया कि कोई भी आदेश केवल उसमें दिए गए कारणों के आधार पर ही वैध/अवैध ठहराया जा सकता है। नई वजहें बाद में नहीं जोड़ी जा सकतीं।
B. प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice):
उत्तरदाताओं द्वारा याचिकाकर्ता को कारण बताकर कोई स्पष्टीकरण का अवसर न देना, Audi Alteram Partem सिद्धांत का उल्लंघन है।
C. मूल्यांकन में समानता का सिद्धांत:
समान योग्यता रखने वाले अन्य अभ्यर्थियों को चुना जाना और याचिकाकर्ता को बाहर करना, अनुच्छेद 14 और 16 का स्पष्ट उल्लंघन है।
5. न्यायालय का निर्णय (Court’s Verdict):
- याचिकाकर्ता की अयोग्यता अवैध घोषित की गई।
- तीन नियुक्त अभ्यर्थियों के नियुक्ति आदेश रद्द किए गए।
- याचिकाकर्ता को पुनः साक्षात्कार में शामिल किया जाएगा।
- पूर्व डीन डॉ. सलील भार्गव पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया गया। यदि राशि निर्धारित समय में जमा नहीं होती तो FIR दर्ज करने के निर्देश।
6. विश्लेषणात्मक निष्कर्ष (Analytical Conclusion):
यह निर्णय प्रशासनिक पारदर्शिता, प्राकृतिक न्याय, तथा न्यायिक ईमानदारी को सुदृढ़ करता है। यह स्पष्ट करता है कि कोई भी सरकारी निकाय यदि दुर्भावना और पूर्वाग्रह के आधार पर निर्णय लेता है, तो न्यायालय उसमें हस्तक्षेप कर सकता है।
यह भी सिद्ध हुआ कि शैक्षणिक योग्यता की टेक्निकल व्याख्या (जैसे “ब्रैकेट में शब्द होना”) के आधार पर किसी पात्र अभ्यर्थी को बाहर करना असंगत और अवैध है।
Download Judgement PDF