मामला: अर्जुनसिंह राठौर बनाम मध्यप्रदेश शासन व अन्य
याचिका संख्या: रिट याचिका क्रमांक 3480/2014
न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, ग्वालियर खंडपीठ ने न्यायमूर्ति श्री मिलिंद रमेश फडके की एकलपीठ में पारित आदेश में अर्जुन सिंह राठौर बनाम मध्यप्रदेश शासन मामले में निर्णय देते हुए, याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति को विधिसम्मत करार दिया है।
याचिकाकर्ता, जो कि 18वीं बटालियन, एसएएफ शिवपुरी में कांस्टेबल पद पर कार्यरत था, को वर्ष 2012 में एक आपराधिक मामले में गिरफ्तारी के बाद 75 दिनों तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के कारण विभागीय जांच में दोषी पाया गया था। यद्यपि वह आपराधिक मामले में सत्र न्यायालय उज्जैन द्वारा बरी कर दिया गया, परंतु विभागीय जांच में उसके विरुद्ध अनुशासनहीनता और लापरवाही के आरोप प्रमाणित पाए गए।
मामले की पृष्ठभूमि:
याचिकाकर्ता अर्जुन सिंह राठौर को वर्ष 2002 में मध्यप्रदेश पुलिस विभाग में कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था। मई 2012 में उसके विरुद्ध धारा 376, 507, 576 आईपीसी के तहत आपराधिक मामला दर्ज हुआ और उसे हिरासत में लिया गया। वह लगभग 75 दिनों तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहा, जिसके परिणामस्वरूप उसके विरुद्ध विभागीय जांच शुरू की गई और वर्ष 2013 में उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें:
- अनुपस्थिति की वैधानिकता:
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वह न्यायिक हिरासत में था, अतः ड्यूटी पर अनुपस्थित रहना उसकी मजबूरी थी, जोकि उसके नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति थी। - झूठा आपराधिक मुकदमा:
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि वह झूठे आपराधिक मामले में फंसाया गया था और बाद में सत्र न्यायालय द्वारा बरी कर दिया गया, जिससे यह सिद्ध होता है कि उस पर लगे आरोप निराधार थे। - विभागीय जांच की प्रक्रिया में त्रुटि:
यह दलील भी दी गई कि विभागीय जांच में याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत जवाबों को गंभीरता से नहीं लिया गया और मनमाने ढंग से सेवा समाप्ति का आदेश पारित कर दिया गया।
प्रशासन की दलीलें:
- विभागीय जांच की स्वतंत्रता:
राज्य की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि आपराधिक मामले और विभागीय कार्यवाही दो भिन्न प्रक्रियाएं हैं। विभागीय जांच, विशेष रूप से अनुशासन व कर्तव्य पालन से संबंधित होती है और इसका उद्देश्य विभाग की साख बनाए रखना होता है। - गैरहाजिरी को गंभीर कदाचार माना गया:
याचिकाकर्ता की 75 दिनों की अनधिकृत अनुपस्थिति पुलिस बल जैसे अनुशासित विभाग के लिए गंभीर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आती है।
न्यायालय का निष्कर्ष और प्रमुख निर्णय बिंदु:
- आपराधिक मुकदमे से बरी होना विभागीय कार्यवाही को स्वतः निरस्त नहीं करता:
सुप्रीम कोर्ट के Capt. M. Paul Anthony v. Bharat Gold Mines Ltd. [(1999) 3 SCC 679] के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब विभागीय और आपराधिक आरोप अलग हों तो दोनों में भिन्न निर्णय हो सकते हैं। - विभागीय कार्यवाही में प्रमाण की अपेक्षा अलग होती है:
Union of India v. Bihari Lal Sindhana एवं State of Bihar v. Phulpari Kumari जैसे मामलों में स्पष्ट किया गया है कि विभागीय जांच में “संदेह से परे प्रमाण” की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि “संभावनाओं का संतुलन” (preponderance of probabilities) पर्याप्त होता है। - न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ:
कोर्ट ने State of U.P. v. Man Mohan Nath Sinha [(2009) 8 SCC 310] का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट को केवल निर्णय की प्रक्रिया की समीक्षा करनी होती है, न कि साक्ष्यों की पुनः जांच। - अनुशासनात्मक कार्रवाई न्यायोचित पाई गई:
न्यायालय ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को विभागीय जांच में पूरा अवसर दिया गया था और उसके द्वारा प्रस्तुत जवाबों पर विचार करते हुए आदेश पारित किया गया था। अतः यह प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप थी।
अंतिम निर्णय:
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने यह पाते हुए कि सेवा समाप्ति का आदेश तथ्यों व विधि के अनुरूप है और इससे किसी प्रकार की न्यायिक चूक नहीं हुई है, याचिका खारिज कर दी।
Download Judgement PDF