मामला: तेजुबाई बनाम मदन पवार CONC 3883/2023
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर पीठ
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्री पवन कुमार द्विवेदी
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता : श्री अजय जैन
प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता : श्री जितेन्द्र भरत मेहता
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर पीठ ने एक महत्त्वपूर्ण आदेश में तेजुबाई बनाम मदन पवार मामले में दाखिल की गई अवमानना याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि अपील संख्या 584/2003 में पारित 28.09.2020 के अंतरिम आदेश, जिसमें संपत्ति की बिक्री पर रोक लगाई गई थी, का उल्लंघन हुआ है।
कोर्ट ने पाया कि याचिका दायर करने वाली तेजुबाई स्वयं भी उसी अपील की सह-अपीलकर्ता थीं और उस आदेश का लाभ सीधे तौर पर उन्हें नहीं मिल रहा था। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अवमानना याचिका केवल वही व्यक्ति दाखिल कर सकता है, जो आदेश से प्रभावित या लाभान्वित होता है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से संबंधित है। मूल वाद स्मृति रजुबाई द्वारा सिविल वाद संख्या 34-A/1997 में दायर किया गया था, जिसमें संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा किया गया था। समय के साथ यह विवाद अपीलों और द्वितीय अपील में बदल गया।
द्वितीय अपील संख्या 584/2003 में दिनांक 14.11.2019 को “status quo” बनाए रखने का आदेश पारित किया गया और फिर दिनांक 28.09.2020 को आदेश पारित हुआ कि “कोई भी बिक्री विलेख निष्पादित नहीं किया जाएगा।“
लेकिन बाद में सभी पक्षकारों के बीच आपसी समझौता (Compromise under Order 23 Rule 3 CPC) हो गया और ₹35 लाख में विवाद निपटा लिया गया।
विवाद का कारण:
तेजुबाई, जो कि अपील में अपीलकर्ता संख्या 7 थीं, ने यह अवमानना याचिका दायर की। उनका आरोप था कि अपीलकर्ता संख्या 2 (मदन पवार) ने अदालत के 28.09.2020 के आदेश का उल्लंघन करते हुए संपत्ति का विक्रय कर दिया।
प्रतिवादी का पक्ष:
- समझौता आवेदन (I.A. No. 1301/2021) सभी अपीलकर्ताओं द्वारा हस्ताक्षरित था, जिसमें विवादित संपत्ति पर ₹35 लाख में समझौता हुआ।
- याचिकाकर्ता (तेजुबाई) ने उस समय कोई आपत्ति नहीं की।
- प्रतिवादी (मदन पवार) एक अशिक्षित ग्रामीण व्यक्ति हैं और उन्हें विश्वास था कि अपील निपट गई है।
- उन्होंने बिना दुर्भावना के संपत्ति बेची।
न्यायालय का विश्लेषण:
- अवमानना याचिका केवल प्रभावित पक्ष ही दाखिल कर सकता है:
सुप्रीम कोर्ट के फैसले Food Corporation of India v. Sukh Deo Prasad, (2009) 5 SCC 665 में कहा गया कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो संबंधित आदेश से प्रभावित नहीं है, वह अवमानना याचिका दायर नहीं कर सकता। - तेजुबाई का आदेश से कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं जुड़ा था:
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि 28.09.2020 का आदेश प्रतिवादी के विरुद्ध उत्तरदाताओं (Respondents) के आवेदन पर जारी किया गया था, न कि तेजुबाई के अनुरोध पर। - कोई व्यक्तिगत हानि या अधिकार हनन साबित नहीं हुआ:
याचिकाकर्ता ने यह नहीं बताया कि संपत्ति की बिक्री से उन्हें कैसे नुकसान हुआ या उनका अधिकार कैसे प्रभावित हुआ। - किसी दुर्भावना से प्रेरित याचिका नहीं चल सकती:
कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यह याचिका प्रस्तावित बिक्री से हिस्सा प्राप्त करने की नीयत से दाखिल की गई प्रतीत होती है, जो न्यायालय की अवमानना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
न्यायालय का निष्कर्ष:
- प्रतिवादी के विरुद्ध कोई जानबूझकर अवमानना सिद्ध नहीं होती।
- याचिकाकर्ता याचिका दायर करने का अधिकार (locus standi) नहीं रखती।
- इसलिए याचिका निर्बल, दुर्भावनापूर्ण एवं औचित्यहीन पाई गई और खारिज कर दी गई।
Download Judgement PDF