मामला: श्रीमती मारिया बनाम राज्य राजस्थान
मामला संख्या: दूसरी जमानत याचिका संख्या 4520/2025
न्यायालय: राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्री फर्जन्द अली
राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर ने हत्या और लूट जैसे गंभीर आरोपों में दो वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद एक महिला श्रीमती मारिया को मानवीय एवं संवैधानिक आधारों पर जमानत दे दी है।
न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा गया कि याचिकाकर्ता एक युवा महिला है, जिसकी उम्र 32 वर्ष है, और वह अपने पांच वर्षीय पुत्र की एकमात्र देखभालकर्ता है। परिवार में कोई अन्य सदस्य उसके बच्चे की देखरेख करने के लिए उपस्थित नहीं है। उसकी सास-ससुर का निधन हो चुका है और मां, जो स्वयं एक वृद्ध महिला है, अपने कैंसरग्रस्त पति की देखभाल में व्यस्त रहती हैं।
न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध अभी तक कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है और अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। अभी तक गवाही का केवल आंशिक भाग ही प्रस्तुत हुआ है और मुकदमा निष्पादन से काफी दूर है।
मामले की पृष्ठभूमि:
याचिकाकर्ता स्मटी. मारिया को वर्ष 2023 में दो महिलाओं — हुसैना बाई और सारा बाई — की निर्मम हत्या, लूट, आगजनी, और सबूत मिटाने के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। प्राथमिकी संख्या 677/2023, थाना अंबामाता, जिला उदयपुर में दर्ज की गई थी। इस पर IPC की धाराएं 302, 394, 449, 380, 436 और 201 लगाई गई थीं।
मारिया की पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद यह दूसरी जमानत याचिका थी, जिसे राजस्थान उच्च न्यायालय की जोधपुर पीठ ने स्वीकार कर लिया।
प्रमुख कानूनी प्रश्न:
- क्या परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त को निरंतर न्यायिक हिरासत में रखा जाना उचित है?
- क्या एक महिला, जो एक छोटे बच्चे की एकमात्र अभिभावक है, को मानवीय आधार पर राहत दी जा सकती है?
- क्या आरोपी की लम्बी प्री-ट्रायल हिरासत अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है?
न्यायालय का विधिक विश्लेषण:
1. साक्ष्य की प्रकृति:
- कोर्ट ने पाया कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है।
- न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी है, न ही कोई ऐसा प्रमाण है जो याचिकाकर्ता को अपराध स्थल पर मौजूद सिद्ध करता हो।
- सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra [(1984) 4 SCC 116] के “पंचशील सिद्धांतों” का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि: “परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी, सुसंगत और आरोपी के दोष को छोड़कर किसी अन्य संभावना को न छोड़ने वाली होनी चाहिए।”
2. याचिकाकर्ता की सामाजिक स्थिति और मानवीय पक्ष:
- याचिकाकर्ता एक 5 वर्षीय बच्चे की एकमात्र देखभालकर्ता है।
- उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
- पति के माता-पिता का निधन हो चुका है और स्वयं की माँ अपने कैंसरग्रस्त पति की देखभाल में व्यस्त है।
- बच्चे की देखभाल न होने से बाल अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है।
3. अनुच्छेद 21 का अनुप्रयोग:
- कोर्ट ने माना कि लंबी प्री-ट्रायल हिरासत बिना दोष सिद्ध हुए, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (Right to Life and Personal Liberty) का उल्लंघन है।
- सुप्रीम कोर्ट और अन्य संविधान पीठों ने बार-बार कहा है कि जेल में बंद रखना दंड नहीं है, बल्कि अंतिम निर्णय तक “निष्पक्षता की प्रतीक्षा” है।
4. भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 / BNS की धारा 480:
- इन धाराओं के तहत महिलाओं, बच्चों और infirm व्यक्तियों को विशेष संरक्षण प्राप्त है।
- कोर्ट ने व्याख्या करते हुए कहा कि “may” शब्द को इस मामले में “shall” के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, यानी न्यायिक विवेक अनिवार्य रूप से मानवीय दृष्टिकोण से प्रयोग किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
- प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कमजोरी, मुकदमे की धीमी प्रगति, छोटे बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी और याचिकाकर्ता की कमजोर पारिवारिक स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने धारा 439 CrPC के तहत जमानत मंजूर की।
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