मामला: जमनालाल बनाम राज्य राजस्थान एवं अन्य विशेष अनुमति याचिका (CRL.) संख्या 69/t2025
निर्णय दिनांक: 6 अगस्त 2025
न्यायालय: भारत का उच्चतम न्यायालय
पीठ: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन
भारत के उच्चतम न्यायालय ने जमनालाल बनाम राज्य राजस्थान मामले में एक अहम फैसला सुनाया, जिसमें उसने राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत दोषी को दी गई सज़ा पर रोक (सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस) को अनुचित करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया है।
विवाद का केंद्र वह आदेश था जिसमें उच्च न्यायालय, जयपुर पीठ ने 3 सितंबर 2024 को एक 14 वर्षीय नाबालिग बालिका के साथ बलात्कार के मामले में दोषी पाए गए अभियुक्त की सज़ा पर रोक लगाते हुए उसे अपील के लंबित रहने तक अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला एक 14 वर्षीय नाबालिग बालिका के साथ बलात्कार के गंभीर आरोप से संबंधित है। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी (प्रतिवादी संख्या 2) को POCSO अधिनियम की धारा 3/4(2) के तहत दोषी करार देते हुए 20 वर्ष की कठोर कारावास और ₹50,000 के जुर्माने की सज़ा सुनाई थी। राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर पीठ ने 3 सितंबर 2024 को आरोपी की सज़ा को निलंबित कर दिया और उसे अपील लंबित रहने तक जमानत पर रिहा कर दिया। इस आदेश को पीड़िता के पिता ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
कानूनी प्रश्न:
- क्या उच्च न्यायालय ने सज़ा निलंबन (Suspension of Sentence) हेतु CrPC की धारा 389 के तहत उचित विवेक का प्रयोग किया?
- क्या ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को नज़रअंदाज़ कर, आरोपी को जमानत देना न्यायसंगत था?
- क्या अभियुक्त की पूर्ववृत्ति (antecedents) और गंभीर आरोपों को देखते हुए सज़ा निलंबन उचित था?
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ:
1. CrPC की धारा 389 का दुरुपयोग:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सज़ा निलंबन कोई स्वाभाविक अधिकार नहीं है। CrPC की धारा 389 के तहत यह विशेष विवेकाधिकार है, जिसका प्रयोग गंभीर मामलों में अत्यधिक सतर्कता से किया जाना चाहिए।
महत्वपूर्ण उद्धरण:
“…कोर्ट को देखना होता है कि दोषसिद्धि को पलटने की कोई स्पष्ट संभावनाएं हैं या नहीं — केवल संदेह या अनुमान इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते।”
2. पीड़िता की गवाही का महत्व:
ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की प्रत्यक्ष गवाही, 164 CrPC के अंतर्गत दिए गए बयान और घटना की रिपोर्टिंग में देरी न होने को संज्ञान में लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मेडिकल साक्ष्य निर्णायक न होने के बावजूद पीड़िता की स्पष्ट और लगातार गवाही सज़ा के लिए पर्याप्त है।
3. प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट और FSL का प्रभाव:
उच्च न्यायालय ने यह मानते हुए सज़ा निलंबित की थी कि मेडिकल रिपोर्ट में स्पष्ट चोटें नहीं थीं और DNA रिपोर्ट अनुपस्थित थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:-
- मेडिकल रिपोर्ट: यह केवल पूरक साक्ष्य होता है, न कि मुख्य।
- DNA रिपोर्ट: अभियोजन द्वारा स्पष्ट किया गया कि रिपोर्ट ट्रायल के बाद प्राप्त हुई और उसमें आरोपी का DNA पाया गया था।
4. POCSO अधिनियम की धारा 29 और 30:
इन धाराओं के अंतर्गत “विपरीत अनुमान (Reverse Burden of Proof)” लगाया जाता है, यानी आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है। उच्च न्यायालय ने इस कानूनी अवधारणा की पूरी तरह अनदेखी की।
5. अभियुक्त की आपराधिक पृष्ठभूमि (Antecedents):
आरोपी के खिलाफ पूर्व में 11 आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से 6 अब भी लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर देना उच्च न्यायालय की गंभीर चूक थी।
प्रमुख निर्णय और निर्देश:
- राजस्थान उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया गया।
- आरोपी को 30 अगस्त 2025 तक POCSO विशेष न्यायालय, करौली में आत्मसमर्पण का निर्देश।
- ऐसा न करने की स्थिति में राज्य सरकार को हिरासत में लेने का आदेश।
न्यायिक दृष्टिकोण का महत्व:
यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायालयों को विशेष रूप से POCSO जैसे मामलों में “संवेदनशीलता, संतुलन और कानूनी विवेक” का समुचित प्रयोग करना चाहिए। केवल तकनीकी आधार या अनुमान के बल पर जघन्य अपराधों में दोषियों को राहत देना न्याय प्रक्रिया का अपमान है।
निष्कर्ष:
यह निर्णय एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप है जो भारत की न्याय प्रणाली में नाबालिग पीड़िताओं की सुरक्षा, अभियोजन की सशक्तता और अभियुक्त के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में मार्गदर्शक सिद्ध होता है। CrPC की धारा 389 का विवेकपूर्ण उपयोग, POCSO अधिनियम के सिद्धांतों का सम्मान और पीड़िता की गवाही का मूल्य — इस निर्णय की मुख्य विशेषताएँ हैं।
Source – Supreme Court Of India
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