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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हत्या के मामले में उम्रकैद घटाकर चार साल की सजा सुनाई

केस: सर्नाम सिंह बघेल व अन्य बनाम राज्य क्रिमिनल अपील सं. 116/2025
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्री आनंद पाठक एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री हिर्देश
संबंधित धाराएँ : धारा 302/34, 323/34, 325 भा.दं.सं.

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ ने सर्नाम सिंह बघेल व अन्य बनाम राज्य प्रकरण में प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सेवढ़ा (जिला दतिया) के दिनांक 18 दिसम्बर 2024 के फैसले में आंशिक संशोधन किया है।

1. प्रकरण के तथ्य एवं पृष्ठभूमि

  • दिनांक 2 जनवरी 2020 को, शिकायतकर्ता हविलदार सिंह बघेल व उनकी माँ मयादेवी पर अभियुक्तों द्वारा मारपीट की गई।
  • महेश बघेल द्वारा लाठी से सिर पर वार किया गया, उपचार के दौरान मयादेवी की मृत्यु (दिनांक 4 फ़रवरी 2020) हो गई।
  • प्रथम दृष्टि में अभियुक्त: महेश, करु एवं सर्नाम पर IPC की धारा 302/34 (आजीवन कारावास) एवं 323/34 (छोटे चोट) के तहत दोष सिद्ध हुआ।

2. ट्रायल कोर्ट का निर्णय

  • सभी अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा (धारा 302/34) दी गई, साथ ही प्राथमिकी में नुकसान पहुँचाने के लिए छह माह की सजा (धारा 323/34) भी सुनाई गई।

3. अपील कोर्ट की विधिक विवेचना

(a) साक्ष्य का मूल्यांकन

  • अधिकांश गवाह मृतका के रिश्तेदार थे—पर ‘रिलेटेड’ गवाहों की विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट के प्रति स्थापित कानून के हवाले से न्यायालय ने माना, कि उन्हें केवल रिश्तेदारी के कारण अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
  • FIR और मेडिकल रिपोर्ट: FIR में स्पष्ट रूप से महेश द्वारा सिर पर लाठी मारने का उल्लेख है, अन्य अभियुक्तों का विशिष्ट आरोप नहीं।
  • डॉक्टर की राय: पोस्टमॉर्टम में मृत्यु का कारण सिर पर चोट और इलाज/ऑक्सीजन की कमी बताया गया।

(b) अभियोग का पुनर्मूल्यांकन

  • Common Intention (धारा 34 IPC) सिद्ध नहीं हुई—यानी सभी अभियुक्तों की हत्या की पूर्व नियोजित मंशा नहीं थी।
  • महेश बघेल ने एक ही ‘लाठी’ का वार किया, जिसमें बार-बार प्रहार या मृतका को मारने का विशेष उद्देश्य स्पष्ट नहीं।
  • करु उर्फ महेन्द्र और सर्नाम सिंह बघेल के विरुद्ध हत्या के आरोप में प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिले।

(c) सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का अनुप्रयोग

  • Mohd. Ishaq Mohammad vs. State of Maharashtra—अगर सिर्फ़ एक ही लाठी का वार हो, हत्या का विशेष इरादा न हो, तो मामला धारा 325 IPC (गंभीर चोट) में आएगा, न कि 302/34 में।
  • अन्य निर्णयों में भी सर पर एकल प्रहार की स्थिति में 325 IPC के तहत ही कठिन सजा उचित ठहराई गई है।

4. अंतिम निर्णय

  • महेश बघेल की सजा — धारा 302/34 से परिवर्तित होकर धारा 325 IPC में 4 वर्ष का सश्रम कारावास + ₹50,000 जुर्माना।
  • करु उर्फ महेन्द्र एवं सर्नाम सिंह बघेल — धारा 302/34 से बरी; धारा 323/34 के तहत पहले ही भुगती गई सजा ही पर्याप्त मानी गई।
  • सभी अभियुक्तों को हविलदार सिंह बघेल को चोट पहुँचाने के लिए 323/34 IPC में दोषी मानकर सजा दी गई थी।

5. विधिक निष्कर्ष एवं महत्त्व

  • निष्कर्ष:
    • विशेष हत्या की मंशा एवं सामान्य उद्देश्य पर आधारित साक्ष्य न होने पर, आजीवन कारावास स्पष्ट रूप से उचित नहीं।
    • चिकित्सा साक्ष्य ने यह भी सिद्ध किया कि उपचार एवं ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु का कारण बन सकता है, जिससे सीधी हत्यात्मक मंशा ख़ारिज होती है।
    • कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों का अनुपालन किया—एकल चोट एवं उपचार की कमी के दृष्टिकोण से सजा को बदलना उचित समझा गया।
  • महत्त्वपूर्ण पहलू:
    • साक्ष्य की गुणवत्ता, अभियुक्तों की भूमिका, और चिकित्सा रिपोर्ट हर क्रिमिनल केस के निर्णय में निर्णायक तत्व हैं।
    • केवल एक वार और हत्या की मंशा न सिद्ध हो तो सजा गंभीर चोट (धारा 325) तक सीमित की जा सकती है।

Source – MP High Court

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