मामले का नाम: महेश कुमार वर्मा बनाम राज्य छत्तीसगढ़
अपील संख्या: CRA No. 1229/2024
पीठ: माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश सिन्हा एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री बिभु दत्ता गुरु
न्यायालय: उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़, बिलासपुर
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर की खंडपीठ (माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री रमेश सिन्हा एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री बिभु दत्ता गुरु) ने सत्र प्रकरण क्रमांक 37/2021 में दंडित आरोपी महेश कुमार वर्मा की अपील (CRA No. 1229/2024) को स्वीकार करते हुए उसे हत्या एवं मारपीट के आरोपों से बरी कर दिया।
मामला वर्ष 2021 का है, जिसमें महेश कुमार वर्मा पर अपने पिता और दादी की हत्या करने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (दो बार) एवं 323 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
- आरोपी महेश कुमार वर्मा पर आरोप था कि 13 अप्रैल 2021 की रात उसने अपने पिता पन्नालाल वर्मा और दादी त्रिवेणी वर्मा की हत्या कर दी तथा अपनी मां को धक्का देकर चोट पहुंचाई।
- सत्र न्यायालय, धमतरी ने उसे भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 (दो बार) और 323 के तहत दोषी ठहराकर आजीवन कारावास व जुर्माने की सजा सुनाई।
- घटना से पहले आरोपी का मानसिक उपचार रायपुर में चल रहा था; वह COVID-19 लॉकडाउन के दौरान छत से गिरकर सिर में चोट खा चुका था और मानसिक रूप से अस्थिर था।
अपील में मुख्य तर्क
- आरोपी कानूनी दृष्टि से “पागलपन” (Legal Insanity) की स्थिति में था।
- लंबे समय से मानसिक रोग का इलाज चल रहा था; घटना के दिन भी इलाज के बाद ही घर लाया गया और उसे कमरे में बंद रखा गया था।
- ट्रायल कोर्ट ने केवल धारा 328 CrPC के तहत ट्रायल के लिए मानसिक क्षमता का आकलन किया, घटना के समय की मानसिक स्थिति पर विचार नहीं किया।
अभियोजन पक्ष:
- धारा 328 CrPC की रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को मानसिक रूप से सक्षम माना गया।
- धारा 313 CrPC के बयान में आरोपी ने केवल झूठा फंसाए जाने का दावा किया, मानसिक अस्वस्थता का विशेष उल्लेख नहीं किया।
न्यायालय का विश्लेषण
- गवाहों के सुसंगत बयान: PW2 (माता) और अन्य रिश्तेदारों ने स्पष्ट किया कि आरोपी मानसिक उपचाररत था और उसकी स्थिति अस्थिर थी।
- जांच में कमी: IO ने मानसिक उपचार के प्रमाण एकत्र नहीं किए और न ही डॉक्टर का बयान लिया।
- व्यवहारिक संकेत: घटना के समय आरोपी के कथन (“मैं हनुमानजी, बजरंगबली, दुर्गा हूं”) और अचानक हिंसक प्रवृत्ति मानसिक विक्षिप्तता की ओर इशारा करते हैं।
- मकसद का अभाव: पिता व दादी की हत्या के लिए कोई पूर्व विवाद या उद्देश्य साबित नहीं हुआ।
कानूनी आधार
- धारा 22 भारतीय न्याय संहिता, 2023 (पूर्व धारा 84 IPC):
यदि आरोपी अस्वस्थ मानसिक स्थिति के कारण अपने कृत्य की प्रकृति या उसकी गलतता नहीं जान पाता, तो वह दंडनीय नहीं है। - न्यायालय द्वारा संदर्भित प्रमुख निर्णय:
- Bapu @ Gujraj Singh v. State of Rajasthan, (2007) 8 SCC 66 — पूर्व मानसिक रोग की स्थिति में अभियोजन को जांच करानी चाहिए।
- Dahyabhai Chhaganbhai Thakkar v. State of Gujarat, AIR 1964 SC 1563 — अभियोजन पर mens rea सिद्ध करने का भार, आरोपी को केवल उचित संदेह पैदा करना होता है।
- Surendra Mishra v. State of Jharkhand, (2011) 11 SCC 495 — कानूनी पागलपन और चिकित्सीय पागलपन में अंतर।
- Dashrath Patra v. State of Chhattisgarh, CRA No. 821/2025 — मानसिक अस्वस्थता के उचित संदेह पर आरोपी को लाभ देना आवश्यक।
निर्णय
- आरोपी के मानसिक रोग के पर्याप्त प्रमाण और अभियोजन द्वारा जांच में गंभीर कमी को देखते हुए न्यायालय ने पाया कि घटना के समय आरोपी अपने कृत्य की प्रकृति या उसकी गलतता को समझने में असमर्थ था।
- धारा 22 BNS (धारा 84 IPC) का संरक्षण दिया गया।
- सत्र न्यायालय का दोषसिद्धि आदेश निरस्त कर आरोपी को बरी किया गया और तत्काल रिहाई का निर्देश दिया गया।
निष्कर्ष
यह निर्णय इस बात को दोहराता है कि मानसिक विक्षिप्तता से जुड़े मामलों में केवल चिकित्सीय रिपोर्ट पर्याप्त नहीं, बल्कि आरोपी के घटना-पूर्व, घटना के समय और घटना के बाद के व्यवहार पर भी गहन विचार आवश्यक है। यदि परिस्थितियां कानूनी पागलपन का संदेह उत्पन्न करती हैं, तो अभियोजन का भार है कि वह इसे खंडित करे, अन्यथा संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाएगा।
Source – High Court Of Chhattisgarh
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