मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि स्टाम्प ड्यूटी से जुड़े मामलों में ट्रायल कोर्ट को भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 33, 35 और 38 का पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई दस्तावेज अपर्याप्त स्टाम्प शुल्क पर प्रस्तुत होता है, तो ट्रायल कोर्ट को पहले उसे “इम्पाउंड” करना चाहिए और उसके बाद ही आगे की कार्रवाई करनी चाहिए। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने बिना उचित प्रक्रिया अपनाए सीधे स्टाम्प कलेक्टर को रिपोर्ट के लिए भेज दिया, जिसे हाईकोर्ट ने गंभीर त्रुटि मानते हुए आदेश निरस्त कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता दीनेश कुशवाह और अन्य ने विशेष वाद (Specific Performance Suit) दायर किया था। उनका दावा था कि दिनांक 30 मई 2014 को प्रतिवादी नंबर 1 (राजेंद्र सिंह, निदेशक – जी.सी. डेयरी इंडिया लिमिटेड) ने उनकी कृषि भूमि बेचने हेतु एक समझौता किया था। तय मूल्य ₹3,15,000/- प्रति बीघा रखा गया।
चूँकि भूमि कृषि भूमि थी, इसलिए राज्य शासन को भी प्रॉ-फॉर्मा प्रतिवादी बनाया गया। वाद दायर करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने मुद्दे तय किए और 22 मई 2024 को वादीगण के साक्ष्य हेतु तिथि तय की।
ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही
मुख्य परीक्षा (Chief Examination) के दौरान प्रतिवादी ने आपत्ति उठाई कि प्रस्तुत Agreement to Sale दस्तावेज अपर्याप्त स्टाम्प पर है और साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं है।
लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उस आपत्ति पर कोई ठोस निर्णय दिए बिना दस्तावेज को सीधे कलेक्टर ऑफ स्टाम्प के पास भेजने का आदेश पारित कर दिया। कलेक्टर ने रिपोर्ट दी कि दस्तावेज पर लगभग ₹9,97,850/- की कमी है और इसके साथ 10 गुना दंड (Penalty) भी देय है। इस आधार पर 05 जुलाई 2024 को ट्रायल कोर्ट ने वादीगण को उक्त राशि जमा करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट में चुनौती
वादीगण ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि:
- ट्रायल कोर्ट ने भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 की धारा 33 और 35 का पालन नहीं किया।
- किसी भी दस्तावेज को यदि अपर्याप्त स्टाम्प शुल्क पर प्रस्तुत किया जाता है तो कोर्ट को पहले इम्पाउंड करना चाहिए, और फिर अधिनियम की धारा 38 व 40 के तहत कार्रवाई करनी चाहिए।
- ट्रायल कोर्ट ने बिना इम्पाउंडिंग किए दस्तावेज को सीधे कलेक्टर को भेज दिया, जो कि पूरी तरह अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
- प्रतिवादी द्वारा उठाई गई आपत्ति का कोई निर्णय नहीं दिया गया, जबकि यह अदालत का कर्तव्य था।
वहीं प्रतिवादी की ओर से तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से स्टाम्प कलेक्टर की राय मंगाई है और आदेश में कोई त्रुटि नहीं है।
कानूनी प्रावधानों पर हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने विस्तार से भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धाराओं का उल्लेख किया –
- धारा 33 : यदि कोर्ट के समक्ष कोई दस्तावेज अपर्याप्त स्टाम्प पर प्रस्तुत होता है, तो उसे इम्पाउंड (जब्त) करना अनिवार्य है।
- धारा 35 : अपर्याप्त स्टाम्प वाले दस्तावेज को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि आवश्यक शुल्क व दंड अदा न किया जाए।
- धारा 38 : यदि दस्तावेज इम्पाउंड किया जाता है, तो ट्रायल कोर्ट को उसे कलेक्टर को भेजने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने इन धाराओं की अनदेखी की और सीधे कलेक्टर को रिपोर्ट के लिए भेज दिया। यह तरीका कानूनन गलत है।
हाईकोर्ट का निर्णय
माननीय न्यायमूर्ति हिरदेश ने स्पष्ट कहा कि –
- ट्रायल कोर्ट ने विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
- दस्तावेज को इम्पाउंड किए बिना कलेक्टर को भेजना गंभीर त्रुटि है।
- इसलिए 22/05/2024 और 05/07/2024 के ट्रायल कोर्ट के आदेश अवैध घोषित किए जाते हैं।
- ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 33, 35 और 38 के अनुसार विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए दोबारा विचार करे।
निष्कर्ष
यह फैसला स्पष्ट करता है कि स्टाम्प ड्यूटी संबंधी मामलों में न्यायालय प्रक्रिया का सख्ती से पालन करे। यदि कोर्ट बिना इम्पाउंडिंग सीधे कलेक्टर को भेजता है, तो ऐसा आदेश न्यायिक दृष्टि से टिकाऊ नहीं होगा।
Case Citation
मामला:दीनेश कुशवाह एवं अन्य बनाम जी.सी. डेयरी इंडिया लिमिटेड एवं अन्य MP 3776/2024 एवं 5756/2024
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ
पीठ; माननीय न्यायमूर्ति हिरदेश
याचिकाकर्ता की ओर से : श्री प्रकाश चन्द्र चंदिल, अधिवक्ता
प्रतिवादी राज्य की ओर से : श्री दिलीप अवस्थी, शासकीय अधिवक्ता
प्रतिवादी क्रमांक 1 (जी.सी. डेयरी इंडिया लिमिटेड) की ओर से : श्री अनिल शर्मा, अधिवक्ता
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