छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए यह स्पष्ट किया कि पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) का उपयोग केवल जनहित के लिए किया जाना चाहिए, न कि व्यक्तिगत स्वार्थ या निजी विवाद निपटाने के लिए। कोर्ट ने एक तथाकथित “जनहित याचिका” को निराधार और स्वार्थपूर्ण मानते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का हर्जाना लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
- याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में PIL दायर करते हुए आरोप लगाया कि NTPC (नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन) द्वारा परिवहन और टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ियां हो रही हैं।
- दावा किया गया कि NTPC की गतिविधियों से न केवल सरकारी नियमों का उल्लंघन हो रहा है बल्कि सार्वजनिक हित भी प्रभावित हो रहा है।
- याचिकाकर्ता ने अपने आप को जनहित का पक्षधर बताते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की।
प्रतिवादी का पक्ष
- NTPC और अन्य प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि यह PIL असल में व्यक्तिगत व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए दायर की गई है।
- याचिकाकर्ता का सीधा व्यावसायिक विवाद था, जिसे “जनहित” के नाम पर पेश किया गया।
- इस प्रकार की याचिकाएं न्यायालय का समय बर्बाद करती हैं और असली जनहित याचिकाओं की गंभीरता को कम करती हैं।
हाईकोर्ट की अवलोकन एवं दलीलें
- PIL की मूल भावना
- कोर्ट ने कहा कि PIL एक सामाजिक न्याय का हथियार है, जिसका उद्देश्य उन लोगों को राहत दिलाना है जो स्वयं न्यायालय तक नहीं पहुंच सकते।
- इसका दुरुपयोग करके यदि कोई व्यक्ति अपने निजी विवाद या व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता को निपटाने की कोशिश करता है, तो यह कानून और संविधान की भावना के विपरीत है।
- दुरुपयोग की प्रवृत्ति
- कोर्ट ने नोट किया कि हाल के वर्षों में PIL का अत्यधिक दुरुपयोग हो रहा है।
- कई मामलों में इसे पब्लिसिटी लिटिगेशन या प्राइवेट इंटरेस्ट लिटिगेशन में बदल दिया गया है।
- सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों (जैसे State of Uttaranchal v. Balwant Singh Chaufal, (2010) 3 SCC 402) में भी इस पर चिंता व्यक्त की गई है।
- वास्तविक जनहित बनाम निजी स्वार्थ
- न्यायालय ने यह पाया कि प्रस्तुत याचिका से किसी सार्वजनिक अधिकार या जनहित का सवाल नहीं उठता।
- यह मामला स्पष्ट रूप से निजी ठेका विवाद (Contractual/Business Dispute) था, जिसे PIL के आवरण में लाया गया।
- कोर्ट का सख्त रुख
- कोर्ट ने कहा कि “न्यायपालिका का समय सीमित और मूल्यवान है, इसलिए इसे उन मामलों में खर्च नहीं किया जा सकता जहाँ जनहित का कोई सवाल ही नहीं है।”
- इस तरह की याचिकाएं न केवल वास्तविक जनहित मामलों को नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि न्यायिक संसाधनों की भी बर्बादी करती हैं।
हाईकोर्ट का आदेश
- याचिका को जनहित का मामला मानने से इंकार किया गया।
- PIL को तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया गया।
- याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का लागत (Cost) लगाने का आदेश दिया गया, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति जनहित की आड़ में निजी हित की रक्षा के लिए अदालत का दुरुपयोग न करे।
Source – High Court Of Chhattisgarh
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Kshetriya Transporter Welfare Association Sipat vs State Of Chhattisgarh WPPIL No. 71 of 2025 Download
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