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सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश लागू: राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को एक माह में फैसला सुनाने को कहा

Rajasthan High Court

न्यायिक व्यवस्था में समय पर फैसला सुनाना न केवल न्यायिक अनुशासन का हिस्सा है बल्कि यह आम नागरिक के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत त्वरित न्याय के संवैधानिक अधिकार से भी जुड़ा हुआ है। हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर की डॉ. जस्टिस नूपुर भाटी की एकलपीठ ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।

मामला गीता चौधरी बनाम राज्य एवं अन्य से संबंधित था, जिसमें याचिकाकर्ता (Geeta Choudhary) ने शिकायत की थी कि उनका मामला राजस्थान सिविल सर्विसेज अपीलीय ट्रिब्यूनल, जोधपुर में अप्रैल 2025 से लंबित है। अपील की सुनवाई पूरी हो चुकी थी और फैसला सुरक्षित (Reserved) किया जा चुका था, लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी ट्रिब्यूनल ने निर्णय सुनाया नहीं।


केस की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता गीता चौधरी पेशे से पटवारी (Patwari) हैं। उन्हें जनवरी 2025 में झलामंड पटवार मंडल में स्थानांतरित किया गया था। लेकिन उनके स्थानांतरण आदेश को चुनौती देते हुए एक निजी प्रतिवादी ने ट्रिब्यूनल में अपील दाखिल कर दी।

ट्रिब्यूनल ने अंतरिम आदेश (Interim Order) पारित करते हुए स्थानांतरण पर रोक लगा दी। परिणामस्वरूप गीता चौधरी न तो कार्यभार ग्रहण कर पाईं और न ही फरवरी 2025 से उन्हें वेतन प्राप्त हो रहा था। उन्होंने दलील दी कि सुनवाई पूरी होने और 24 अप्रैल 2025 को फैसला सुरक्षित किए जाने के बावजूद, अब तक कोई निर्णय नहीं सुनाया गया है, जिससे उन्हें अनावश्यक मानसिक, सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयाँ झेलनी पड़ रही हैं।


याचिकाकर्ता की दलीलें

  1. न्यायालय में यह दलील दी गई कि ट्रिब्यूनल की देरी अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लंघन है।
  2. याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया कि हाईकोर्ट, ट्रिब्यूनल को समयबद्ध तरीके से निर्णय सुनाने का आदेश दे।
  3. साथ ही, उन्होंने लंबित वेतन भुगतान (Outstanding Salary) और भविष्य में नियमित वेतन भुगतान का भी आदेश चाहा।

न्यायालय का विश्लेषण

राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण थे:

  • Anil Rai v. State of Bihar (2001) 7 SCC 318
    इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सुनवाई पूरी होने के बाद अनावश्यक देरी से फैसला सुनाना न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
  • Ravindra Pratap Shahi v. State of U.P. (2025 INSC 1039)
    इस नवीनतम फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने Anil Rai मामले के दिशा-निर्देशों को पुनः दोहराया और कहा कि यदि कोई फैसला तीन महीने तक लंबित रहे तो मुख्य न्यायाधीश को हस्तक्षेप कर मामले को दूसरी पीठ को सौंपना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरक्षित निर्णय (Reserved Judgment) को समय पर न सुनाना न्यायपालिका की गरिमा और आम नागरिक के विश्वास को ठेस पहुँचाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “Justice delayed is justice denied” (न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है)।


हाईकोर्ट का आदेश

  1. राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि अपील संख्या 23/2025, जिसका निर्णय 24 अप्रैल 2025 से सुरक्षित रखा गया है, उसे एक माह के भीतर सुनाया जाए।
  2. यह आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए Anil Rai और Ravindra Pratap Shahi के दिशा-निर्देशों के अनुरूप पारित किया गया।
  3. न्यायालय ने कहा कि आरक्षित फैसले को छह माह से अधिक लंबित रखना अनुचित है और इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं।
  4. साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में लंबित वेतन और सेवा लाभों पर विचार होना चाहिए, ताकि कर्मचारी को अनावश्यक कठिनाई का सामना न करना पड़े।

Source- Rajasthan High Court

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Case Citation

मामला: चौधरी बनाम राज्य राजस्थान एवं अन्य (S.B. Civil Writ Petition No. 15424/2025)
न्यायालय : राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर
पीठ : माननीय डॉ. न्यायमूर्ति नूपुर भाटी
याचिकाकर्ता (Petitioner) की ओर से : श्री दीपक नेहरा, अधिवक्ता
प्रतिवादी (State of Rajasthan एवं अन्य) की ओर से : (सरकारी पक्षकार/AG का नाम आदेश में उल्लेखित नहीं)