हमारा कानून

भविष्य के आरोपी को एफ.आई.आर. दर्ज करने के आदेश को चुनौती देने का अधिकार नहीं : इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय (1)

प्रतिवादी संख्या-2, वीरेंद्र सिंह (अनुसूचित जाति वर्ग से सेवानिवृत्त बैंक प्रबंधक) ने आरोप लगाया था कि बैंक के कुछ अधिकारियों ने उनके खिलाफ झूठी व फर्जी शिकायत तैयार कर उन्हें बदनाम करने और फंसाने की साजिश रची। शिकायत में आरोप था कि एक व्यक्ति रमेश चंद्र के नाम से फर्जी पत्र और हस्ताक्षर बनाकर बैंक के उच्च अधिकारियों को भेजे गए, जिससे वीरेंद्र सिंह की छवि खराब हो। साथ ही, यात्रा बिल (Travel Bills) को भी फर्जी बताने की कोशिश की गई।

वीरेंद्र सिंह ने पहले थाना, फिर पुलिस आयुक्त, आगरा को शिकायत दी। जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने धारा 173(4) BNSS के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दिया। मजिस्ट्रेट ने दस्तावेज़ और गवाहों के बयान देखकर पाया कि प्रथम दृष्टया गंभीर और संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) बनता है। इसलिए उन्होंने FIR दर्ज करने और जांच करने का आदेश दिया।


आवेदकों की दलीलें

आवेदक (कमलेश मीना व अन्य) ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा:

  1. प्रक्रिया का उल्लंघन – मजिस्ट्रेट ने धारा 173 और 175 BNSS के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
  2. विभागीय कार्रवाई लंबित – प्रतिवादी संख्या-2 पर बैंक में कार्यकाल के दौरान गबन (embezzlement) का मामला चल रहा है। FIR दर्ज कराने का प्रयास विभागीय कार्रवाई को रोकने के लिए किया गया है।
  3. कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता – आरोपों से कोई वास्तविक अपराध साबित नहीं होता।
  4. उन्होंने Om Prakash Ambadkar v. State of Maharashtra (2025), Imran Pratapgadhi v. State of Gujarat (2025), और अन्य कई सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।

प्रतिवादी की दलीलें

प्रतिवादी पक्ष (वीरेंद्र सिंह) ने कहा:

  1. लॉकस स्टैंडी (Locus Standi) – संभावित आरोपी (Prospective Accused) को यह अधिकार नहीं है कि वह FIR दर्ज करने के आदेश को चुनौती दे सके।
  2. गंभीर अपराध – फर्जी दस्तावेज़ बनाना, झूठे आरोप लगाना और अनुसूचित जाति के व्यक्ति को अपमानित करना SC/ST Act के तहत गंभीर अपराध है।
  3. कोर्ट का आदेश सही – मजिस्ट्रेट ने सभी दस्तावेज़, गवाहों और पुलिस रिपोर्ट को देखकर उचित निर्णय लिया।

हाईकोर्ट का निर्णय

माननीय न्यायालय ने विस्तृत सुनवाई और दस्तावेज़ों का अवलोकन करने के बाद कहा:

  • संभावित आरोपी को अधिकार नहीं – कोर्ट ने Father Thomas बनाम State of U.P. (2011, Full Bench) और Jagannath Verma बनाम State of U.P. (2014) के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब तक संज्ञान (Cognizance) या समन (Summons) जारी नहीं होता, संभावित आरोपी को FIR दर्ज करने के आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।
  • मजिस्ट्रेट का आदेश विधिसंगत – मजिस्ट्रेट ने पुलिस से रिपोर्ट मंगवाई, बैंक अधिकारियों से जवाब लिया और सभी तथ्यों पर विचार किया। प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, इसलिए FIR दर्ज करने का आदेश सही है।
  • प्रक्रिया का पालन – मजिस्ट्रेट ने BNSS की धारा 173(4) और 175(3) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया।
  • अर्जी खारिज – अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 528 BNSS के तहत दायर यह अर्जी अमान्य (Not Maintainable) है और इसे खारिज किया जाता है।

Case Citation

मामला:  कमलेश मीना एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य आवेदन संख्या–528 बी.एन.एस.एस. संख्या 25348 / 2025
Neutral Citation No.:2025:AHC:123424
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठ : माननीय न्यायमूर्ति दिनेश पाठक
याचिकाकर्ता की ओर से:रवि कांत एवं वात्सला
प्रतिवादी राज्य की ओर से: धर्मेंद्र शुक्ला, सुनिल कुमार सिंह

Source – Allahabad High Court

Download PDF Judgment