यह मामला 20 साल पुराने भूमि विवाद और कथित फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर की गई संपत्ति ट्रांसफर से जुड़ा है। आरोपी, जो उस समय राजस्व विभाग में सर्कल ऑफिसर और तलाठी थे, पर आरोप है कि उन्होंने म्यूटेशन एंट्री (mutation entries) को प्रमाणित किया, जिससे संपत्ति अवैध रूप से ट्रांसफर हो गई।
पृष्ठभूमि
- FIR पंजीकरण: 26 जनवरी 2019 को पालघर जिले के अर्नाला सागरी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज हुई।
- आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 420, 463, 464, 465, 467, 468, 471, 474 और 34 के तहत मुकदमा दर्ज।
- आरोपियों को 1996 में म्यूटेशन एंट्री प्रमाणित करने का दोषी ठहराया गया।
- 1998 में Sub-Divisional Officer ने म्यूटेशन एंट्री रद्द कर दी।
- FIR लगभग 20 साल बाद दर्ज हुई।
आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए सेशन कोर्ट और फिर बॉम्बे हाईकोर्ट में आवेदन किया। सेशन कोर्ट ने आवेदन खारिज कर दिया लेकिन अंतरिम सुरक्षा दी। हाईकोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद 04 जुलाई 2025 को अग्रिम जमानत खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट में अपील
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया:
- उन्हें FIR में नामित भी नहीं किया गया था, बाद में आरोपी बनाया गया।
- उन्होंने कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं लिया, केवल सरकारी ड्यूटी निभाई।
- दस्तावेज़ पहले से रद्द हो चुके थे, कोई “continuing illegality” नहीं बची थी।
- FIR 20 साल की देरी से दर्ज हुई, जो न्याय के खिलाफ है।
- वे जांच में सहयोग करने को तैयार हैं, इसलिए हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं।
राज्य का पक्ष
राज्य ने तर्क दिया कि:
- पावर ऑफ अटॉर्नी मृत व्यक्तियों के नाम से फर्जी बनाई गई थी।
- आरोपियों ने अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं किया और संपत्ति ट्रांसफर में मदद की।
- अंतरिम सुरक्षा के बावजूद आरोपियों ने जांच में पूरा सहयोग नहीं किया।
- अपराध गंभीर प्रकृति का है और हिरासत में पूछताछ जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अग्रिम जमानत का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना है, लेकिन यह स्वतःसिद्ध अधिकार नहीं है।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- धारा 438 CrPC के तहत अग्रिम जमानत केवल न्यायालय के विवेक पर दी जाती है।
- 20 साल की देरी FIR को अमान्य नहीं बनाती, खासकर जब आरोप गंभीर हों।
- दस्तावेज़ आधारित मामलों में भी हिरासत में पूछताछ आवश्यक हो सकती है ताकि सबूत छुपाने से रोका जा सके।
- हाईकोर्ट का आदेश सही है, अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।
- आरोपी नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं और उसे मेरिट पर सुना जाएगा।
महत्वपूर्ण अवलोकन
सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिकाओं के लंबे समय तक लंबित रहने पर गंभीर चिंता जताई और कहा:
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों का त्वरित निपटारा होना चाहिए।
- हाईकोर्ट और अधीनस्थ अदालतें अग्रिम जमानत व जमानत याचिकाओं को 2 महीने के भीतर निपटाएं।
- अनावश्यक स्थगन और देरी से बचें ताकि आरोपी पर “अनिश्चितता की तलवार” न लटके।
- यह दिशा-निर्देश सभी हाईकोर्ट्स को भेजने का आदेश दिया गया।
Case Citation
मामला: Anna Waman Bhalerao बनाम महाराष्ट्र राज्य (Criminal Appeal No. 4004-4005/2025)
न्यूट्रल सिटेशन:2025 INSC 1114
निर्णय दिनांक: 12-09-2025
कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया,
पीठ:जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन
Source- Supreme Court Of India
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