न्यायमूर्ति बी.आर. गवई एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए State of Telangana बनाम Jerusalem Mathai एवं अन्य मामले में तेलंगाना सरकार की विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) को खारिज कर दिया। यह मामला वर्ष 2015 में तेलंगाना विधान परिषद (MLC) चुनावों के दौरान कथित रिश्वत देने के आरोपों से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी अभियुक्त के खिलाफ पर्याप्त और प्रत्यक्ष सबूत न हों तो केवल आरोपों के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
केस की पृष्ठभूमि
मामले की शुरुआत 28 मई 2015 को हुई, जब शिकायतकर्ता (एक विधायक) ने तेलंगाना एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में लिखित शिकायत दर्ज कराई। आरोप था कि उन्हें एक राजनीतिक दल के पक्ष में मतदान करने या मतदान से दूर रहने के लिए पहले 2 करोड़ रुपये और विदेश यात्रा की टिकट, और बाद में 5 करोड़ रुपये तक की पेशकश की गई।
इस शिकायत पर 31 मई 2015 को FIR दर्ज की गई और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग सहित कुछ सबूत जुटाए गए। मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 12 (रिश्वत की पेशकश) के तहत दर्ज किया गया।
हालांकि, कथित अभियुक्त A4 (याचिकाकर्ता) उस समय घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे और उनके खिलाफ केवल एक “फोन कॉल” का जिक्र था। हाईकोर्ट ने यही आधार मानकर उनके खिलाफ FIR रद्द कर दी।
सुप्रीम कोर्ट में बहस
- राज्य पक्ष (तेलंगाना सरकार) की दलीलें
- हाईकोर्ट ने FIR रद्द करते समय “मिनी ट्रायल” किया है, जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के विपरीत है।
- FIR और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग से प्रथम दृष्टया संज्ञान लेने योग्य अपराध बनता है।
- इसलिए मुकदमे की पूरी जांच के बाद ही अभियुक्त की भूमिका तय होनी चाहिए थी।
- प्रतिवादी पक्ष (Jerusalem Mathai एवं अन्य) की दलीलें
- A4 के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है।
- कथित फोन कॉल का समय, विवरण और पुष्टि शिकायत में दर्ज नहीं है।
- अभियुक्त को केवल सामान्य आरोप के आधार पर मुकदमे में घसीटना न्यायोचित नहीं है।
- हाईकोर्ट ने सही कारणों से FIR रद्द की है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
- हाईकोर्ट का आदेश लंबा अवश्य है, परंतु तर्कसंगत है – केवल विस्तार से लिखे गए आदेश को “मिनी ट्रायल” नहीं कहा जा सकता।
- FIR दर्ज करने में विलंब और खामियां – 28 मई को शिकायत दर्ज हुई, पर FIR 31 मई को लिखी गई, जो गंभीर सवाल उठाती है।
- A4 की भूमिका संदिग्ध नहीं – कथित घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी का कोई सबूत नहीं और आरोप केवल फोन कॉल तक सीमित हैं।
- कानूनी सिद्धांत – यदि अभियुक्त के खिलाफ ठोस सबूत न हों, तो उसे केवल संदेह के आधार पर मुकदमे का सामना नहीं कराना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा FIR रद्द करने में कोई त्रुटि नहीं है।
- A4 (याचिकाकर्ता) के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है।
- केवल एक सामान्य आरोप और अस्पष्ट फोन कॉल से अभियुक्त को मुकदमे में नहीं घसीटा जा सकता।
- नतीजतन, तेलंगाना सरकार और शिकायतकर्ता द्वारा दायर दोनों विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) खारिज कर दी गईं।
Case Citation
मामला: State of Telangana vs. Jerusalem Mathai and Anr., SLP (Crl.) No. 5248/2016 & 9333/2016,
न्यूट्रल सिटेशन:2025 INSC 1173
निर्णय दिनांक:26 सितंबर 2025
कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
पीठ:माननीय न्यायमूर्ति बी.आर. गवई एवं माननीय न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
राज्य (तेलंगाना सरकार) की ओर से : डॉ. मेनका गुरुस्वामी, वरिष्ठ अधिवक्ता
शिकायतकर्ता की ओर से : श्री जी. प्रकाश, अधिवक्ता
Source- Supreme Court Of India
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