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धारा 65-बी सर्टिफिकेट पर हाईकोर्ट का फैसला – अब इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश करना होगा आसान

JUSTICE ANIL VERMA
मामले का नाम: आशु जाटव@आकाश बनाम मध्यप्रदेश राज्य CRR No.3444/2025
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्री अनिल वर्मा
निर्णय दिनांक: 01 अगस्त 2025
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री लोकेन्द्र शर्मा, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री योगेश पाराशर, लोक अभियोजक

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि कोई अभियुक्त इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, जैसे मोबाइल चैट्स और वीडियो, प्रस्तुत करता है तो उसका मूल्यांकन निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के तहत किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति अनिल वर्मा की एकल पीठ ने आशु जाटव @ आकाश बनाम राज्य शासन के मामले में दखल देते हुए यह निर्णय दिया कि ट्रायल कोर्ट का केवल पेन ड्राइव को रिकॉर्ड पर लेना, लेकिन साक्ष्य के रूप में अस्वीकार करना तकनीकी दृष्टिकोण है और यह कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।

इस मामले में याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n) और 506 के अंतर्गत गंभीर आरोप लगे थे। ट्रायल के दौरान याचिकाकर्ता ने एक पेन ड्राइव न्यायालय में प्रस्तुत की, जिसमें मोबाइल चैट्स व वीडियो थे जो कथित रूप से यह सिद्ध करते थे कि पीड़िता और याचिकाकर्ता के बीच संबंध सहमति पर आधारित थे। याचिकाकर्ता ने इसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में पेश करते हुए, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र भी संलग्न किया।

मूल विवाद:
निचली अदालत (सेशन कोर्ट, डबरा) ने पेन ड्राइव को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी, परंतु इसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया। यह आदेश इस आधार पर दिया गया कि प्रमाणपत्र सम्यक रूप से दाखिल नहीं किया गया।

हाईकोर्ट का हस्तक्षेप:
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने यह स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी आधारों पर किसी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय State of Karnataka vs. M.R. Hiremath (2019) 7 SCC 515 तथा Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao Gorantyal (2020) 7 SCC 1 पर भरोसा करते हुए कहा कि धारा 65-बी का प्रमाणपत्र बाद में भी प्रस्तुत किया जा सकता है, बशर्ते ट्रायल समाप्त न हुआ हो।

उच्च न्यायालय का निर्णय:

  • अदालत ने यह माना कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए धारा 65-बी का प्रमाणपत्र एक प्रक्रिया संबंधी औपचारिकता है और उसकी अनुपस्थिति “curable defect” (उपचार योग्य त्रुटि) है।
  • अदालत ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है और साक्ष्य को तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
  • अंततः, निचली अदालत का आदेश रद्द किया गया और याचिकाकर्ता को प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई, साथ ही ₹2000/- लागत राशि प्रतिपक्ष को देने का निर्देश भी दिया गया।

Source – MP High Court

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