भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जिला न्यायाधीश नियुक्ति से संबंधित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे को पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजने का आदेश दिया। यह आदेश रेजनिश के.वी. बनाम के. दीपा एवं अन्य सहित कई सिविल अपीलों, पुनर्विचार याचिकाओं और रिट याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
पृष्ठभूमि
यह मामला Dheeraj Mor बनाम दिल्ली उच्च न्यायालय (2020) 7 SCC 401 के निर्णय की पुनर्विचार याचिकाओं और संबंधित रिट याचिकाओं से जुड़ा है।
2020 के निर्णय में तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि:
- राज्य की न्यायिक सेवा के सदस्य को जिला न्यायाधीश के पद पर या तो पदोन्नति से या सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा (LDCE) के माध्यम से नियुक्त किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 233(2) के अनुसार, कोई भी अधिवक्ता या वकील, जिसके पास सात वर्ष का अनुभव हो और जो पहले से न्यायिक सेवा में न हो, प्रत्यक्ष भर्ती से जिला न्यायाधीश बन सकता है।
- उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए ऐसे नियम, जो न्यायिक अधिकारियों को “बार से प्रत्यक्ष भर्ती” वाले पदों पर दावा करने से रोकते हैं, संविधान के विपरीत नहीं हैं।
वर्तमान विवाद
पुनर्विचार याचिकाओं और अन्य याचिकाओं में यह मांग की गई कि:
- ऐसे न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने न्यायिक सेवा में शामिल होने से पहले सात वर्ष का बार अनुभव प्राप्त किया हो, उन्हें भी अनुच्छेद 233(2) के तहत “बार वैकेंसी” के लिए पात्र माना जाए।
कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं (श्री जयंत भूषण, डॉ. मेनका गुरुस्वामी, श्री वी. गिरी आदि) ने दलील दी कि यह संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिसे अनुच्छेद 145(3) के तहत कम से कम पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए।
दूसरी ओर, कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि मामला पहले ही Rameshwar Dayal बनाम पंजाब राज्य (1961) और Chandra Mohan बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1967) के संविधान पीठ के फैसलों से निपट चुका है, इसलिए नया संदर्भ (Reference) आवश्यक नहीं है।
मुख्य कानूनी प्रश्न
- क्या ऐसा न्यायिक अधिकारी, जिसने न्यायिक सेवा में आने से पहले सात वर्ष बार में वकालत की हो, जिला न्यायाधीश के “बार कोटे” के पद के लिए पात्र है?
- जिला न्यायाधीश की पात्रता — क्या यह आवेदन की तिथि पर देखी जाएगी, नियुक्ति की तिथि पर, या दोनों पर?
संविधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 233(2) – जिला न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए पात्रता: “कोई व्यक्ति जो पहले से संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, और जिसने कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता या वकील के रूप में कार्य किया है तथा उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्ति की अनुशंसा की गई है, जिला न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है।”
- अनुच्छेद 145(3) – जब संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न हो, तो मामला कम से कम पाँच-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष सुना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
- Rameshwar Dayal केस में सवाल था कि क्या भारत के विभाजन से पहले लाहौर हाईकोर्ट में वकालत का अनुभव भी सात वर्षों की पात्रता में गिना जा सकता है।
- Chandra Mohan केस में सवाल था कि क्या गैर-न्यायिक सेवाओं (जैसे पुलिस, राजस्व) के अफसरों को जिला न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है।
- कोर्ट ने माना कि ये दोनों मामले वर्तमान विवाद से अलग हैं, क्योंकि मौजूदा सवाल यह है कि क्या पूर्व-बार अनुभव रखने वाले न्यायिक अधिकारी भी “बार कोटे” के लिए पात्र हैं या नहीं।
- अनुच्छेद 145(3) के अनुसार, संविधान की व्याख्या से जुड़े प्रश्नों पर पाँच-न्यायाधीशों की पीठ ही निर्णय करेगी।
- Janhit Abhiyan बनाम भारत संघ (2021) में भी स्पष्ट किया गया कि ऐसे मामलों को पाँच-न्यायाधीशों के समक्ष रखा जाना चाहिए।
अदालत का आदेश
- अनुच्छेद 233(2) की व्याख्या से जुड़े दोनों प्रश्नों को संविधान पीठ (पाँच-न्यायाधीश) के पास भेजा जाए।
- रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि मामला प्रशासनिक पक्ष पर भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करे।
- वर्तमान बैच की याचिकाओं की सुनवाई संविधान पीठ के निर्णय के बाद ही होगी।
Case Citation
मामले का नाम: रेजनिश के.वी. बनाम के. दीपा एवं अन्य सिविल अपील संख्या 3947/2020
न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
निर्णय दिनांक: 12 अगस्त 2025
पीठ: माननीय मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, माननीय न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन, माननीय न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया
Source- Supreme Court of India
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