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भ्रष्टाचार के दोषसिद्ध सरकारी कर्मचारियों की विधवाओं को पेंशन पर कोई अधिकार नहीं: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट

मामला: श्रीमती शीला राजपूत बनाम मध्यप्रदेश राज्य,WP No.18426/2022,
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन
अधिवक्ता (याचिकाकर्ता की ओर से): — श्री ओम शंकर पांडे
अधिवक्ता (प्रतिवादी की ओर से): — सुश्री वारिधि पाठक

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्ध सरकारी कर्मचारी की पेंशन पूरी तरह से (100%) रोकी जा सकती है, और इसके लिए सरकार को अलग से कारण बताने की आवश्यकता नहीं है।

1. पृष्ठभूमि
यह मामला एक दोषसिद्ध सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की विधवा की पेंशन बहाली की मांग से जुड़ा है। संबंधित कर्मचारी को भ्रष्टाचार के अपराध में अदालत ने दोषी ठहराया था। दोषसिद्धि के बाद, मध्यप्रदेश सरकार ने पेंशन नियमों के तहत उसकी पेंशन स्थायी रूप से (100%) रोक दी। कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी ने पेंशन की मांग की, जिसे अस्वीकार कर दिया गया।

2. याचिकाकर्ता का पक्ष

  • याचिकाकर्ता (विधवा) ने तर्क दिया कि दोषसिद्ध कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसे पेंशन प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार है।
  • उसका कहना था कि पेंशन एक सेवा-निवृत्ति लाभ है, जो कर्मचारी के परिवार को उसके निधन के बाद मिलना चाहिए, चाहे दोषसिद्धि हो या न हो।
  • उसने यह भी कहा कि पेंशन रोकने का आदेश मृत्यु के बाद स्वतः निरस्त हो जाना चाहिए।

3. प्रतिवादी (राज्य सरकार) का पक्ष

  • राज्य सरकार ने पेंशन नियमों का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन कोई पूर्ण अधिकार नहीं है, बल्कि यह सेवा के दौरान अच्छे आचरण पर आधारित अनुग्रह (privilege) है।
  • पेंशन नियम स्पष्ट रूप से यह अनुमति देते हैं कि यदि कोई कर्मचारी भ्रष्टाचार या नैतिक अधमता (moral turpitude) जैसे गंभीर अपराध में दोषसिद्ध हो, तो उसकी पेंशन पूरी तरह से रोकी जा सकती है।
  • यह रोक स्थायी है और मृत्यु के बाद भी लागू रहती है।

4. कानूनी प्रावधान

  • मध्यप्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम में यह प्रावधान है कि यदि कोई सरकारी सेवक भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराध में दोषी ठहराया जाता है, तो राज्य सरकार पेंशन को आंशिक या पूर्ण रूप से रोक सकती है।
  • यह रोक न केवल सेवा के दौरान बल्कि सेवा-निवृत्ति के बाद और यहां तक कि मृत्यु के बाद भी प्रभावी रह सकती है।
  • पेंशन को “अनुग्रह” (gratuity/privilege) माना गया है, न कि “पूर्ण अधिकार” (absolute right)।

5. न्यायालय का विश्लेषण

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पेंशन का उद्देश्य ईमानदार और निष्पक्ष सेवा को प्रोत्साहन देना है।
  • पेंशन नियमों में यह स्पष्ट है कि दोषसिद्धि की स्थिति में पेंशन रोकी जा सकती है और यह निर्णय न्यायिक समीक्षा में केवल तभी पलटा जा सकता है जब यह मनमाना या कानून के विपरीत हो।
  • इस मामले में कर्मचारी भ्रष्टाचार में दोषी पाया गया था, जो गंभीर अपराध है, और पेंशन रोकने का आदेश विधिसम्मत था।
  • अदालत ने यह भी कहा कि मृत्यु के बाद भी यह रोक जारी रह सकती है और विधवा को पेंशन देने का कोई संवैधानिक या वैधानिक अधिकार नहीं है।

6. निर्णय का निहितार्थ

  • भ्रष्टाचार या गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध सरकारी कर्मचारी की पेंशन स्थायी रूप से रोकी जा सकती है।
  • पेंशन का दावा केवल तभी मान्य है जब कर्मचारी का सेवा रिकॉर्ड निष्पक्ष और ईमानदार हो।
  • यह निर्णय सरकारी सेवा में ईमानदारी, जवाबदेही और नैतिक आचरण के महत्व को दोहराता है।
  • मृत कर्मचारी की विधवा या परिवार को भी पेंशन का स्वतः अधिकार नहीं है यदि पेंशन पहले से विधिसम्मत रूप से रोकी गई हो।

7. निष्कर्ष
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि पेंशन कोई मौलिक या पूर्ण अधिकार नहीं है। यह अच्छे आचरण पर आधारित अनुग्रह है और भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि के बाद इसे स्थायी रूप से रोका जा सकता है। इस रोक का प्रभाव कर्मचारी की मृत्यु के बाद भी बना रहता है।

Source – MP High Court

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