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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: बाल अपचारी को 376(A)(B) IPC में दोषी ठहराया, सजा 3 साल तक सीमित

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

प्रस्तावना

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने POCSO एक्ट और IPC की धारा 376(A)(B) के तहत दोषी ठहराए गए एक बाल अपचारी (Child in Conflict with Law) की सजा को संशोधित किया गया। यह मामला एक 12 वर्ष से कम आयु की बच्ची के साथ दुष्कर्म से संबंधित था। निचली अदालत ने आरोपी को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए सजा को अधिकतम 3 वर्ष तक सीमित कर दिया।


मामला क्या था?

मामला वर्ष 2018 का है। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता की मां मजदूरी के लिए घर से बाहर गई हुई थी। जब वह घर लौटी तो पाया कि उसकी बेटी के जननांग से रक्तस्राव हो रहा है। पूछताछ करने पर बच्ची ने बताया कि पास में रहने वाले लड़के (जो स्वयं नाबालिग था) ने अनुचित हरकत की।

इस घटना की जानकारी तुरंत पुलिस को दी गई और FIR IPC की धारा 376 तथा POCSO एक्ट की धारा 4 के तहत दर्ज की गई। मेडिकल रिपोर्ट और FSL रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि हुई।


निचली अदालत का फैसला

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और बाद में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (POCSO एक्ट) ने आरोपी बालक को वयस्क की तरह ट्रायल करने का निर्णय लिया।
निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर उसे IPC धारा 376(A)(B) और POCSO एक्ट की धारा 5(ड)/6 के तहत दोषी करार दिया और 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।


हाईकोर्ट में अपील

आरोपी की ओर से दलील दी गई कि –

  • वह घटना के समय स्वयं भी नाबालिग था।
  • साक्ष्यों में कई विरोधाभास हैं।
  • जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत उसे अधिकतम 3 साल की सजा मिल सकती थी।

वहीं, राज्य की ओर से कहा गया कि अपराध गंभीर है और पीड़िता की आयु 12 वर्ष से कम थी, इसलिए कठोर सजा उचित है।


हाईकोर्ट का निर्णय

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने सभी साक्ष्यों और कानून का गहन परीक्षण किया।

अदालत ने माना कि –

  • अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया कि पीड़िता की उम्र घटना के समय 12 वर्ष से कम थी।
  • मेडिकल और FSL रिपोर्ट से दुष्कर्म की पुष्टि होती है।
  • आरोपी बालक ने गंभीर अपराध किया है।

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 15 और 18 के अनुसार, 16 वर्ष से अधिक उम्र के बालक को ही वयस्क के रूप में ट्रायल किया जा सकता है। CCL को अधिकतम 3 साल तक “Place of Safety” में रखा जा सकता है। सजा का उद्देश्य दंडात्मक नहीं बल्कि सुधारात्मक (Reformative) होना चाहिए।

इसलिए, हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई 20 वर्ष की सजा को संशोधित कर 3 वर्ष की सजा में बदल दिया।


कानूनी महत्व

यह निर्णय कई कारणों से महत्वपूर्ण है:

  1. जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की व्याख्या – कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाल अपराधियों के लिए सुधारात्मक और पुनर्वासात्मक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
  2. POCSO एक्ट और JJ Act का संतुलन – गंभीर अपराधों में भी बाल अपराधियों को वयस्क सजा नहीं दी जा सकती।
  3. न्यायिक दृष्टिकोण – यह फैसला दिखाता है कि न्यायालय केवल दंडात्मक ही नहीं, बल्कि सुधारात्मक न्याय को भी महत्व देता है।

Case Citation

मामला; Child confict with law v state of chhatishgarh CRA 321/ 2024
न्यायालय: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
पीठ: माननीय मुख्य न्यायमूर्ति श्री रमेश सिन्हा एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री बिभु दत्ता गुरु
निर्णय दिनांक: 10 सितम्बर 2025
अपीलकर्ता (Appellant): बाल अपचारी (Child in Conflict with Law)
प्रतिवादी (Respondent): राज्य छत्तीसगढ़, थाना अम्बिकापुर, जिला सरगुजा
अधिवक्ता (अपीलकर्ता पक्ष):श्रीमती निरुपमा बाजपेयी, अधिवक्ता
अधिवक्ता (प्रतिवादी/राज्य की ओर से ):सुश्री सौम्या शर्मा, पैनल अधिवक्ता

Source – High Court Of Chhattisgarh

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