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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला : धारा 368 आईपीसी में दोषसिद्धि रद्द, आरोपी पंकज राम बरी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने आरोपी पंकज राम को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 368 के तहत दी गई सज़ा से बरी कर दिया। निचली अदालत ने उसे तीन साल की सश्रम कारावास और ₹1000 जुर्माने की सज़ा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपी को पीड़िता के अपहरण की जानकारी थी या उसने जानबूझकर उसे छिपाया।


मामला क्या था?

यह मामला जशपुर ज़िले का है। घटना अप्रैल 2015 की है, जब एक नाबालिग पीड़िता अपने दोस्तों के साथ एक ‘छठी’ समारोह में शामिल हुई थी। रात लगभग 8:30 बजे वह घर लौट रही थी, तभी एक किशोर अपराधी (JCL) ने उसे रास्ते में रोककर जबरन पकड़ लिया और उसके साथ बलात्कार किया।

इसके बाद, JCL ने पीड़िता को अपने मित्र पंकज राम (अपीलकर्ता) के घर ले जाकर रात भर वहीं रखा। अगले दिन सुबह पीड़िता को ताले लगे कमरे में बंद पाया गया। परिजनों ने उसकी तलाश की और गांव के सरपंच की मदद से पुलिस को सूचित किया। अंततः पुलिस ने पीड़िता को बरामद किया और मामला दर्ज हुआ।

  • JCL के खिलाफ धारा 342, 376 IPC और पॉक्सो एक्ट के तहत कार्यवाही हुई।
  • पंकज राम पर धारा 368 IPC (किडनैपिंग/अपहरण की जानकारी होते हुए छिपाना या कैद करना) का आरोप लगाया गया।

निचली अदालत का फैसला

जशपुर की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (FTC) ने 2016 में पंकज राम को दोषी मानते हुए 3 साल की सश्रम कारावास और ₹1000 जुर्माना लगाया। अदालत ने माना कि पीड़िता को उसके घर में रखा गया था और इस प्रकार आरोपी ने अपराध में सहयोग किया।


हाईकोर्ट में अपील

पंकज राम ने इस फैसले को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में आपराधिक अपील (CRA 288/2016) दायर की।

  • अपीलकर्ता की दलील:
    • उसके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है।
    • मुख्य अपराधी JCL था, जिसने बलात्कार और अपहरण किया।
    • पंकज को यह जानकारी नहीं थी कि लड़की को जबरन लाया गया है।
    • केवल चाबी देने से यह साबित नहीं होता कि उसने अपराध में जानबूझकर सहयोग किया।
  • राज्य पक्ष की दलील:
    • पीड़िता को आरोपी के घर से बरामद किया गया।
    • चाबी भी आरोपी ने दी थी, इससे उसकी भूमिका स्पष्ट होती है।
    • इसलिए निचली अदालत का फैसला सही है।

हाईकोर्ट का अवलोकन

माननीय न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु ने दोनों पक्षों की दलीलों और गवाहों के बयानों का गहराई से विश्लेषण किया।

  1. पीड़िता का बयान – उसने कहा कि JCL ने उसके साथ बलात्कार किया और फिर पंकज राम के घर में रखा। लेकिन उसने यह नहीं कहा कि पंकज को अपहरण या बलात्कार की जानकारी थी।
  2. गवाह (मां, पिता और मौसी) – उन्होंने स्वीकार किया कि पीड़िता को पंकज के घर से बरामद किया गया, लेकिन यह भी बताया कि स्थान और चाबी की जानकारी JCL ने ही दी थी।
  3. कानूनी बिंदु
    • धारा 368 IPC तभी लागू होती है जब यह साबित हो कि आरोपी को स्पष्ट रूप से पता था कि पीड़िता का अपहरण हुआ है।
    • केवल चाबी देने या घर में ठहराने से अपराध सिद्ध नहीं होता जब तक कि ज्ञान और मंशा साबित न हो।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दो महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट मामलों का उल्लेख किया –

  • Saroj Kumar बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1973) 3 SCC 669
  • Om Prakash बनाम हरियाणा राज्य (2011) 14 SCC 309

इनमें स्पष्ट किया गया कि धारा 368 IPC के तहत सज़ा तभी दी जा सकती है जब आरोपी को पीड़िता के अपहरण की जानकारी हो और उसने जानबूझकर उसे छिपाया हो


हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय

सभी तथ्यों और साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद, हाईकोर्ट ने कहा –

  • अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि पंकज राम को पीड़िता के अपहरण की जानकारी थी।
  • केवल घर की चाबी देना या अस्थायी रूप से ठहराना जानबूझकर छिपाना या अपराध में भागीदारी नहीं माना जा सकता।
  • इस प्रकार, दोषसिद्धि गलत है और अभियोजन संदेह से परे अपराध सिद्ध नहीं कर पाया

👉 परिणामस्वरूप, पंकज राम को बरी कर दिया गया और निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया गया।

Source – High Court Of Chhattisgarh

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