मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए POCSO एक्ट और IPC की गंभीर धाराओं में दोषी ठहराए गए राहुल कवड़े की फांसी की सजा को आजीवन कारावास (बिना रिमिशन) में बदल दिया है। यह निर्णय CRRFC No. 2/2023 और Criminal Appeal No. 4955/2023 में सुनाया गया। अदालत ने कहा कि सजा का उद्देश्य केवल प्रतिशोध नहीं बल्कि न्याय, सुधार और पुनर्वास भी है।
केस का बैकग्राउंड
यह मामला नवंबर 2022 का है। आरोपी राहुल कवड़े, जो पीड़िता का रिश्तेदार (दामाद) था, 17 नवंबर को पीड़िता के घर मेहमान के रूप में आया था। 18 नवंबर की सुबह वह 8 वर्षीय बच्ची को अपने साथ ले गया। दोपहर तक बच्ची के घर न लौटने पर परिवार ने उसकी तलाश शुरू की।
- शिकायत: पीड़िता के पिता ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।
- तलाश: बच्ची का शव चार टेकरी गांव के जंगल में मिला। पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट में दुष्कर्म और गला घोंटकर हत्या की पुष्टि हुई।
- गिरफ्तारी और सबूत: आरोपी को पकड़ा गया, उसके कपड़ों, बाइक और अन्य सामान से DNA साक्ष्य मिले। DNA रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि आरोपी के अंडरवियर पर मिला डीएनए प्रोफ़ाइल और पीड़िता के सैंपल मेल खाते हैं।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
इटारसी के विशेष न्यायालय (POCSO) ने फरवरी 2023 में आरोपी को दोषी ठहराया और धारा 363 IPC (अपहरण), 376(AB) IPC (गंभीर बलात्कार), 376(2)(f) IPC, 302 IPC (हत्या), तथा धारा 5(M)/6 और 5(N)/6 POCSO Act के तहत फांसी की सजा सुनाई।
हाईकोर्ट में अपील
आरोपी ने सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की।
- आरोपी की दलील:
- वह मात्र 22 साल का है, उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
- घटना शराब के नशे में हुई, उसने गला घोंटने की बात मानी पर दुष्कर्म से इंकार किया।
- फांसी की सजा अत्यधिक कठोर है, इसे उम्रकैद में बदला जाए।
- राज्य की दलील:
- यह घटना भरोसे के रिश्ते का घोर दुरुपयोग है।
- आरोपी ने नाबालिग के साथ अत्याचार कर उसकी हत्या की।
- ऐसे मामलों में समाज को कड़ा संदेश देना जरूरी है।
हाईकोर्ट का अवलोकन
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की बेंच ने कहा कि सजा तय करते समय केवल अपराध की गंभीरता नहीं बल्कि आरोपी की पृष्ठभूमि, सुधार की संभावना और जेल में उसके आचरण पर भी विचार करना आवश्यक है।
- सामाजिक पृष्ठभूमि:
- आरोपी अनुसूचित जनजाति से है, गरीब परिवार से है, माता-पिता निरक्षर हैं।
- कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं मिला।
- स्कूल में उसका व्यवहार सामान्य और अच्छा बताया गया।
- जेल आचरण रिपोर्ट:
- आरोपी जेल में धार्मिक पुस्तकें पढ़ता है।
- उसका व्यवहार अन्य कैदियों और जेल स्टाफ के प्रति अच्छा है।
- किसी अनुशासनहीनता की घटना नहीं पाई गई।
- कानूनी सिद्धांत:
- सुप्रीम कोर्ट के बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) और मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983) के फैसलों में कहा गया है कि मृत्युदंड केवल रेयरेस्ट ऑफ रेयर (Rarest of Rare) मामलों में ही दिया जाना चाहिए।
- विशेष कारण (Special Reasons) बताए बिना धारा 354(3) CrPC के तहत मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता।
- पुनर्वास (Reformation) की संभावना होने पर मृत्युदंड उचित नहीं है।
फैसला
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा लेकिन सजा को संशोधित किया।
- मौत की सजा को बदलकर उम्रकैद (Natural Life) में किया गया।
- आरोपी को 20 साल तक बिना रिमिशन जेल में रहना होगा।
- अदालत ने कहा कि यह फैसला पीड़िता के प्रति न्याय, आरोपी के सुधार की संभावना और समाज के प्रति न्यायिक जिम्मेदारी को ध्यान में रखकर दिया गया।
महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु
- धारा 235(2) CrPC के तहत सजा से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य।
- धारा 354(3) CrPC के अनुसार विशेष कारण बताए बिना मृत्युदंड नहीं।
- Rarest of Rare Test – कोर्ट ने कहा कि यह मामला भले ही जघन्य है, पर आरोपी सुधार योग्य है।
- सामाजिक न्याय का सिद्धांत – गरीब और पहली बार अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए पुनर्वास को प्राथमिकता।
Case Citation
मामला: इन रेफरेंस बनाम राहुल कवड़े क्रिमिनल रेफरेंस कैपिटल नं. 2/2023 / राहुल कवड़े बनाम मध्यप्रदेश राज्य क्रिमिनल अपील नं. 4955/2023
Neutral Citation : 2025:MPHC-JBP:49786
निर्णय दिनांक :तारीख: 27 सितम्बर 2025
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
पीठ; माननीय न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल एवं माननीय न्यायमूर्ति अवनीन्द्र कुमार सिंह
अधिवक्ताओं के नाम (Appearance of Advocates)
श्री आदित्य अधीकारी – वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate)
सहयोगी: श्री सतीश चंद्र चतुर्वेदी एवं श्री कौस्तुभ चतुर्वेदी – Amicus Curiae
श्री अतुलानंद अवस्थी – वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate)
सहयोगी: सुश्री रेनू तिवारी – अपीलार्थी (Appellant) की ओर से अधिवक्ता
श्री नितिन गुप्ता – शासन अधिवक्ता (Government Advocate) – प्रतिवादी राज्य की ओर से
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- Order 2 Rule 1 CPC | Frame of suit
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