मामला: सुखबीर सिंह बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली W.P.(CRL) 2100/2025
न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय
निर्णय तिथि: 08 अगस्त 2025
न्यायाधीश: डॉ.न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा
याचिकाकर्ता वकील: श्रीसिद्धार्थलूथरा (वरिष्ठअधिवक्ता)
प्रतिवादी वकील: श्री संजीव भंडारी, अतिरिक्त स्थायी अधिवक्ता
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस के सब-इंस्पेक्टर सुखबीर सिंह की डिफ़ॉल्ट बेल याचिका को खारिज कर दिया है। यह मामला संगठित अपराध नियंत्रण क़ानून (MCOCA) के तहत दर्ज एक संगीन आपराधिक मामले से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता पर गैंगवार में शामिल शूटर्स को संरक्षण और सहयोग देने के आरोप हैं।
न्यायमूर्ति डॉ. स्वराना कांति शर्मा की एकल पीठ ने आदेश में कहा कि—
- जांच अवधि 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन करने का आदेश विधि-सम्मत था।
- स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर (SPP) की नियुक्ति में तकनीकी/प्रक्रियात्मक देरी से जांच प्रक्रिया अमान्य नहीं हो जाती।
- SPP की रिपोर्ट और केस डायरी की समीक्षा के बाद ही 13 जून 2025 को जांच अवधि बढ़ाने का आदेश दिया गया था।
1. मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में याचिकाकर्ता दिल्ली पुलिस के सब-इंस्पेक्टर सुखबीर सिंह हैं, जिन पर संगठित अपराध नियंत्रण कानून (MCOCA) के तहत गंभीर अपराधों में संलिप्तता का आरोप है। आरोप है कि उन्होंने दो शूटरों को आपस में मिलाया, गैंगवार में मदद की एवं मुख्य आरोपी के भागने में सहयोग किया। इनके खिलाफ 07.12.2024 को गोलीबारी की घटना और विस्तृत आपराधिक जाँच चल रही थी। FIR और गिरफ्तारी के बाद, इनके खिलाफ MCOCA की धाराएँ भी जोड़ दी गईं।
2. याचिका का मुद्दा
मुख्य रूप से दो आदेशों को चुनौती दी गई:
- 8 जुलाई 2025: डिफॉल्ट बेल (Default Bail) की याचिका खारिज।
- 13 जून 2025: MCOCA के अंतर्गत जांच अवधि 180 दिन तक बढ़ाने एवं हिरासत विस्तार पर आदेश।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जांच अवधि विस्तार का आदेश अवैध है, क्योंकि उस समय स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर (SPP) के नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया अधूरी थी—अत: उस रिपोर्ट के आधार पर जांच अवधि बढ़ाना कानूनन गलत है और उन्हें डिफॉल्ट बेल मिलनी चाहिए।
3. कानूनी प्रावधानों की व्याख्या
A. MCOCA & CrPC के संबंध में:
- CrPC, धारा 167(2): सामान्य तौर पर जांच पूरी करने के लिए 90/60 दिन का समय। इस अवधि के बाद चार्जशीट न दायर हो तो ‘डिफॉल्ट बेल’ का अधिकार।
- MCOCA, धारा 21(2)(b): MCOCA केस में ‘स्पेशल कोर्ट’ जांच अवधि 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन तक कर सकती है, लेकिन यह केवल ‘स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर’ की रिपोर्ट के आधार पर ही हो सकता है।
B. SPP की नियुक्ति:
- SPP की नियुक्ति “स्टेट गवर्नमेंट” (यहाँ, लेफ्टिनेंट गवर्नर) द्वारा की जाती है।
- रिपोर्ट और केस डायरी की समीक्षा के बाद ही जांच अवधि बढ़ाई जा सकती है।
4. याचिकाकर्ता का तर्क
- नियुक्ति का विरोध: SPP की विधिवत नियुक्ति न होने, गैजेट नोटिफिकेशन के बिना, 13 जून 2025 को SPP की रिपोर्ट अमान्य थी।
- पिछले आदेश: पहली बार 14 मई 2025 को अवधि विस्तार हुई थी, जिसे वर्तमान याचिका में चुनौती नहीं दी गई।
- रिट्रोस्पेक्टिव नोटिफिकेशन: बाद में चयन को रिट्रोस्पेक्टिव इफ़ेक्ट दिया गया, जिसे बिरोध किया गया कि नियुक्ति बाद में होने से पिछला आदेश वैध नहीं माना जा सकता।
- आर्टिकल 21: प्रक्रिया के उल्लंघन पर आरोपी को बेल (स्वतंत्रता) का अधिकार नहीं छीना जा सकता।
5. राज्य (State) का तर्क
- नियुक्ति की प्रक्रिया: SPP की नियुक्ति पहले ही प्रशासनिक रूप से हो चुकी थी, अनुमति मिल गई थी, केवल औपचारिक नोटिफिकेशन बाद में जारी हुआ।
- कोर्ट के सामने रिकॉर्ड: SPP नियुक्त था, कई अन्य मामलों में भी नियुक्त किया गया था।
- न्यायिक विवेक: कोर्ट ने रिपोर्ट, केस डायरी, दोनों की समीक्षा करके आदेश पारित किया; केवल तकनीकी त्रुटि को आधार बनाकर आरोपी को लाभ नहीं दिया जा सकता।
6. न्यायालय का विश्लेषण और निर्णय
A. महत्वपूर्ण बिंदु:
- ‘रिपोर्ट’ की आवश्यकता: 13 जून 2025 के आदेश में स्पष्ट है कि SPP की रिपोर्ट और केस डायरी की जांच की गई।
- SPP की नियुक्ति: नोटिफिकेशन की देरी केवल प्रक्रिया संबंधी त्रुटि है, मूल्यांकन या मूलगामी अधिकार का उल्लंघन नहीं।
- डिफॉल्ट बेल उद्धारण: आरोपी को ‘डिफॉल्ट बेल’ तभी मिलेगी जब प्रक्रियापूर्ण उल्लंघन से उसे स्पष्ट कानूनी नुकसान/अन्याय हो, जो यहां सिद्ध नहीं हुआ।
- सुप्रीम कोर्ट की मिसाल: ऐसे मामलों में प्रक्रिया-विधिक ‘अनियमितता’ की वजह से पुलिस/राज्य की जांच पूरी तरह अवैध नहीं मानी जाती, जब तक बंगाली या कारणवश आरोपी को नुकसान न हो।
B. निष्कर्ष:
- आदेश वैध: SPP की रिकॉर्ड में नियुक्ति, रिपोर्ट दाखिल और केस डायरी की समीक्षा—तीनों को सही माना गया।
- कोई कानूनी दोष नहीं: आदेश में कोई गंभीर कानूनी कमी या गैर-वैधता नहीं मिली।
- याचिका खारिज: डिफॉल्ट बेल का अधिकार सिद्ध नहीं हुआ, इसलिए याचिका खारिज।
Download Judgement PDF
- Order 2 Rule 1 CPC | Frame of suit
- ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत पर विचार कर सुनाई उम्रकैद, फांसी की सजा को किया खत्म : मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ; दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की 15 साल से अधिक सेवाएं पेंशन के लिए जोड़ी जाएंगी,
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट : नगर परिषद कैलारस में 109 संविदा नियुक्तियाँ अवैध, याचिकाएँ खारिज
- सुप्रीम कोर्ट : तेलंगाना रिश्वत प्रकरण में FIR रद्द करने का आदेश बरकरार