मामला: गजानंद कुमरावत बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य (W.P. No. 6389/2018)
न्यायाधीश: माननीय श्री विजय कुमार शुक्ला, उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय में आदिवासी कल्याण विभाग में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित वेतनमान और अन्य लाभ दिए जाने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला की एकलपीठ ने गजानंद कुमरावत बनाम मध्यप्रदेश राज्य प्रकरण में आदेश पारित करते हुए कहा कि जिन कर्मचारियों ने निरंतर पाँच वर्षों की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें 17 मार्च 1978 के शासन के परिपत्र के अनुसार नियमित वेतनमान का लाभ उनके सेवा पूर्ण करने की वास्तविक तिथि से दिया जाए।
न्यायालय ने पूर्व में दायर याचिकाओं एवं उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के आलोक में यह स्पष्ट किया कि सेवा की निरंतरता के बावजूद केवल याचिका दायर करने की तिथि से लाभ देना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को सभी एरियर एवं परिलाभ दिए जाएं।
1. पृष्ठभूमि:
याचिकाकर्ता गजानंद कुमरावत तथा अन्य, मध्यप्रदेश आदिवासी कल्याण विभाग में वर्षों से दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। उनका मुख्य दावा यह था कि उन्होंने पाँच वर्ष की निरंतर सेवा पूर्ण कर ली है और इस आधार पर उन्हें नियमित वेतनमान (Regular Pay Scale) तथा उससे संबंधित समस्त परिलाभ 17 मार्च 1978 के वित्त विभाग के परिपत्र के अनुसार मिलना चाहिए। विभाग द्वारा उन्हें यह लाभ केवल उस तिथि से दिया गया जब उन्होंने याचिका दायर की, जो याचिकाकर्ता के अनुसार असंवैधानिक था।
2. प्रमुख कानूनी प्रश्न:
- क्या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को 5 वर्षों की निरंतर सेवा के पश्चात नियमित वेतनमान का अधिकार है?
- क्या लाभ केवल याचिका दायर करने की तिथि से सीमित किया जा सकता है?
- क्या राज्य सरकार द्वारा पूर्व में जारी सर्कुलर के अधिकार को बाद के सर्कुलर से समाप्त किया जा सकता है, जब लाभ पहले ही अर्जित हो चुका हो?
3. याचिकाकर्ता की दलीलें:
- संवैधानिक अधिकार: याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (रोजगार में समान अवसर) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि समान कार्य कर रहे कर्मचारियों को समान वेतन लाभ मिलना चाहिए।
- समानता का आधार: याचिकाकर्ताओं ने Revaram बनाम राज्य शासन और Kailash Talware बनाम राज्य शासन जैसे मामलों का हवाला दिया, जिनमें अदालत ने लाभ सेवा प्रारंभ होने के 5 वर्ष पूर्ण होने की तिथि से ही देने का आदेश दिया था।
- पूर्व अर्जित अधिकार: 17.03.1978 के सर्कुलर के अनुसार उन्हें 5 वर्षों की सेवा पूरी करने के बाद स्वतः लाभ मिलना चाहिए, और 2014 के नए सर्कुलर से इसे रद्द करना उनके अर्जित अधिकार का उल्लंघन है।
4. प्रतिवादी (राज्य शासन) की दलीलें:
- याचिकाकर्ता दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं, ना कि नियमित पदों पर कार्यरत, अतः उन्हें नियत वेतनमान देने का कोई दायित्व नहीं बनता।
- 17.03.1978 का सर्कुलर अब 28.01.2014 के नए सर्कुलर द्वारा रद्द किया जा चुका है।
- पूर्व में दिए गए आदेशों के अनुसार केवल याचिका दायर करने की तिथि से ही लाभ दे सकते हैं।
- राज्य की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए पिछली तिथि से एरियर देना राज्य पर वित्तीय बोझ डालना होगा।
5. न्यायालय की विवेचना एवं निर्णय:
- न्यायालय ने माना कि 1978 का सर्कुलर पूर्ण रूप से लागू था और याचिकाकर्ता इसके अधीन 5 वर्षों की सेवा पूरी करने के बाद लाभ के पात्र हो चुके थे। 2014 का सर्कुलर उनका अधिकार समाप्त नहीं कर सकता, क्योंकि उनका अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका था।
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले आदेशों को रद्द कर मामला पुनः विचार हेतु भेजा गया था, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से न्याय मिलना चाहिए।
- Revaram और Kailash Talware मामलों में उच्च न्यायालय ने समान रूप से यह तय किया था कि कर्मचारी को लाभ वास्तविक सेवा तिथि से मिलना चाहिए न कि याचिका दायर करने की तिथि से।
- कलेक्टर द्वारा जानबूझकर आदेशों का उल्लंघन किया गया, जिससे न्यायालय ने ₹20,000 का जुर्माना लगाया।
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