मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पूर्व असिस्टेंट एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर (मार्केटिंग) कोमल प्रसाद बुरमन की रिट याचिका खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, गबन और धोखाधड़ी के आरोप सिद्ध हुए थे, जिसके चलते उन्हें सेवा से बर्खास्त किया गया था और ₹13.28 लाख की वसूली का आदेश भी दिया गया था।
माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकल पीठ ने कहा कि —
- विभागीय जांच में याचिकाकर्ता ने सभी आरोप स्वीकार किए थे, जिससे आरोपों का सिद्ध होना स्पष्ट है।
- वित्तीय अनियमितताएं आंतरिक जांच और सरप्राइज विजिलेंस चेक के दौरान सामने आईं, इसलिए चार्जशीट में देरी जानबूझकर नहीं थी।
- बर्खास्तगी और रकम की वसूली अलग-अलग कानूनी कदम हैं, इसलिए यह डबल जियोपार्डी नहीं है।
- सेवा नियमों में संशोधन से क्लॉज़ नंबर बदलने का असर सजा की वैधता पर नहीं पड़ता।
पृष्ठभूमि
कोमल प्रसाद बुरमन, जो भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में असिस्टेंट एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर (मार्केटिंग) के पद पर कार्यरत थे, पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, गबन और धोखाधड़ी के आरोप लगे।
आरोपों के अनुसार, उन्होंने 2011 से 2017 के बीच अपने पद का दुरुपयोग करते हुए लगभग ₹13.28 लाख की राशि का गबन किया। यह राशि उनके और उनके परिजनों के नाम पर ऋण चुकाने, बीमा प्रीमियम भरने और अन्य गलत वित्तीय लेनदेन में उपयोग हुई।
शुरुआत में, 07.10.2020 को उनके खिलाफ चार्जशीट जारी हुई। विभागीय जांच पूरी होने के बाद, 29.07.2021 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया और साथ ही ₹13.28 लाख की वसूली का आदेश दिया गया। अपील में भी यह फैसला 27.01.2022 को बरकरार रहा। इसके बाद बुरमन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता (बुरमन) के मुख्य तर्क
- चार्जशीट में देरी:
आरोप 2011–2017 के बीच के थे, जबकि चार्जशीट 2020 में जारी हुई, इसलिए यह “स्टेल चार्ज” (पुराने आरोप) है और इसे रद्द किया जाना चाहिए। - सबूतों की कमी:
जांच अधिकारी ने कोई गवाह पेश नहीं किया और न ही दस्तावेज़ सबूत के रूप में सही तरीके से पेश किए गए। - डबल जियोपार्डी (दोहरी सज़ा):
बर्खास्तगी के साथ-साथ वसूली का आदेश देना दोहरी सजा है, जो कानूनन गलत है। - सज़ा का प्रावधान:
चार्जशीट में केवल क्लॉज़ 39(1)(a) से (g) के अंतर्गत सजा का उल्लेख था, जबकि अंतिम आदेश में क्लॉज़ 39(1)(i) के तहत बर्खास्त किया गया।
प्रतिवादी (LIC) का पक्ष
- आरोप सिद्ध और स्वीकारोक्ति:
विभागीय जांच में बुरमन ने सभी आरोप स्वीकार किए और कहा—
“मुझे याद नहीं कि किन परिस्थितियों में यह कार्य किया, लेकिन दबाव में गलती हुई।”
यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति है, इसलिए अलग से गवाह की जरूरत नहीं थी। - देरी का औचित्य:
वित्तीय अनियमितताएं सरप्राइज विजिलेंस चेक और आंतरिक जांच में सामने आईं—- शाहडोल शाखा: आरोप (30.05.2014–27.02.2017) का पता 23.06.2017 को चला।
- दमोह शाखा: आरोप (2010–2013) का खुलासा 27.09.2018 की निरीक्षण रिपोर्ट में हुआ।
जांच के बाद तुरंत चार्जशीट जारी की गई, इसलिए देरी जानबूझकर नहीं थी।
- डबल जियोपार्डी लागू नहीं:
बर्खास्तगी एक अनुशासनात्मक सज़ा है, जबकि रकम की वसूली एक क्षतिपूर्ति उपाय (compensatory measure) है। दोनों का उद्देश्य अलग है। - सज़ा का क्लॉज़:
2022 में सेवा नियमों में संशोधन हुआ, जिसमें पहले का क्लॉज़ (f) को (i) के रूप में पुन: क्रमांकित किया गया। इसलिए यह चार्जशीट से बाहर की सजा नहीं है।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
- स्वीकारोक्ति का महत्व:
जब कर्मचारी स्वयं आरोप स्वीकार करता है, तो गवाह न बुलाने का तर्क असंगत है। - देरी घातक नहीं:
यह मामला ऐसा नहीं है जिसमें नियोक्ता ने जानबूझकर कार्रवाई टाली हो। आरोप उजागर होते ही कार्रवाई हुई, इसलिए “स्टेल चार्ज” का सिद्धांत लागू नहीं होगा। - डबल जियोपार्डी का तर्क खारिज:
बर्खास्तगी और रकम की वसूली अलग-अलग उद्देश्य वाले कदम हैं—एक सजा है, दूसरा आर्थिक हानि की भरपाई। - क्लॉज़ परिवर्तन:
सेवा नियमों में संशोधन के चलते क्लॉज़ का नंबर बदला है, न कि सजा का प्रकार। इसलिए यह तकनीकी आपत्ति मान्य नहीं है।
अंतिम फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रमाणित और स्वीकार किया गया मामला है जिसमें ₹13.28 लाख का गबन हुआ। विभागीय जांच उचित थी और सजा न्यायसंगत है।
इसलिए याचिका खारिज कर दी गई और बुरमन की बर्खास्तगी तथा रकम की वसूली के आदेश को बरकरार रखा गया।
Case Citation
मामला: कोमल प्रसाद बुरमन बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम लिमिटेड एवं अन्य W.P. No. 18586/2020
न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति विवेक जैन
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री नरमदा प्रसाद चौधरी, अधिवक्ता
प्रतिवादी क्रमांक श्री एन.पी.एस. रूप्राह, वरिष्ठ अधिवक्ता, साथ में सुश्री मुस्कान आनंद, अधिवक्ता
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