मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, इंदौर बेंच ने एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) का निपटारा किया, जो दुनाबाई के नाम से दर्ज थी। यह याचिका वर्ष 2011 में दाखिल की गई थी, जिसमें बरवानी ज़िले की आदिवासी महिलाओं की लगातार मातृ मृत्यु दर और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को चुनौती दी गई थी।
इस मामले ने लगभग 14 वर्षों तक अदालत की निगरानी में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को परखा और अंततः न्यायालय ने विस्तृत आदेश देते हुए सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के निर्देश दिए।
याचिका की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता दुनाबाई, एक आदिवासी महिला और आशा कार्यकर्ता थीं। उनकी बहू की मौत गर्भावस्था के दौरान जिला अस्पताल बरवानी में उचित इलाज न मिलने से हो गई थी। इसके बाद उन्होंने जनहित याचिका दाखिल की और यह दावा किया कि 2010 में केवल 9 महीनों में ही कम से कम 25 मातृ मृत्यु हुईं।
याचिका में कहा गया कि यह केवल बजटीय कमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक असफलता (Structural Failure) है। सरकार द्वारा चलाई जा रही जननी सुरक्षा योजना (JSY) और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK) जैसे कार्यक्रम ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं हो रहे थे।
अदालत की कार्यवाही
- 2011 में हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर सरकार से जवाब मांगा।
- अदालत ने AGCA (Advisory Group on Community Action) की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें बरवानी की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली उजागर हुई थी।
- कोर्ट ने सरकार को मातृ मृत्यु की समीक्षा (Maternal Death Review) करने और तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने का आदेश दिया।
सरकार ने 2012 से 2014 तक कई रिपोर्टें दाखिल कीं, जिनमें दावा किया गया कि नई सुविधाएँ खोली गईं, ASHA कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया गया और डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई।
लेकिन याचिकाकर्ता ने अपनी rejoinder में बताया कि यह सब केवल कागज़ी दावे हैं। कई CHC और PHC बिना डॉक्टरों के चल रहे थे, ब्लड बैंक में योग्य पैथोलॉजिस्ट नहीं था और आदिवासी क्षेत्रों में डॉक्टर पोस्टिंग से बचते थे।
मुख्य कानूनी मुद्दे
- क्या स्वास्थ्य का अधिकार, अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का हिस्सा है?
- याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पश्चिम बंगाल खेत मज़दूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996) 4 SCC 37 का हवाला दिया, जिसमें स्वास्थ्य को जीवन का मूलभूत हिस्सा माना गया था।
- क्या राज्य सरकार ने योजनाओं का सही क्रियान्वयन किया?
- रिपोर्टों से यह साफ हुआ कि योजनाएँ कागज़ों पर थीं, लेकिन जमीनी हकीकत में आदिवासी महिलाएँ प्रसव के समय उचित इलाज से वंचित रहीं।
- क्या न्यायालय संरचनात्मक सुधार का आदेश दे सकता है?
- यह PIL एक Structural Litigation का उदाहरण बनी, जहाँ अदालत ने केवल व्यक्तिगत राहत नहीं बल्कि पूरे सिस्टम में सुधार की मांग पर विचार किया।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल ने तर्क दिया कि:
- सरकार ने लगातार NHM (National Health Mission) और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं को लागू किया है।
- बरवानी ज़िले में SNCU, NRC, Janani Express जैसी सुविधाएँ शुरू की गईं।
- डॉक्टरों की भर्ती, मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और बजट आवंटन से स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हो रही हैं।
न्यायालय का निर्णय
दो जजों की पीठ (न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी) ने आदेश में कहा:
- बीते वर्षों में सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में कई सुधार किए हैं।
- लेकिन अब भी जनजातीय और दूरस्थ क्षेत्रों में स्टाफ की कमी और इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतें बनी हुई हैं।
- स्वास्थ्य का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न हिस्सा है और सरकार को इसे प्रभावी बनाना होगा।
- कोर्ट ने याचिका को निपटाते हुए सरकार को निर्देश दिया कि वह पारदर्शिता के साथ योजनाओं का क्रियान्वयन करे और समय-समय पर समीक्षा करती रहे।
निष्कर्ष
यह मामला भारतीय न्यायपालिका में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी PIL का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि केवल योजनाएँ बनाना काफी नहीं, बल्कि उनका ज़मीनी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना भी राज्य का कर्तव्य है।
Case Citation
मामला:दुनाबाई बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य W.P. No. 5097/2011 (जनहित याचिका)
न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर पीठ (Division Bench)
पीठ; माननीय न्यायमूर्ति विवेक रूसिया एवं माननीय न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी
याचिकाकर्ता की ओर से : सुश्री शन्नो शगुफ्ता खान, अधिवक्ता
प्रतिवादी/राज्य की ओर से : श्री सुदीप भार्गव, उप महाधिवक्ता
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