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MLA दबाव में पारित निलंबन आदेश को MP हाईकोर्ट ने किया निरस्त

mphc

Rajesh Raikwar v. State of Madhya Pradesh & Others,
Writ Petition No. 20531 of 2025,
Decided on: 29 July 2025,
Before: Hon’ble Justice Vivek Jain,

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर की एकलपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, सीधी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी राजेश रैकवार के निलंबन आदेश को अवैध और पूर्वाग्रहपूर्ण बताते हुए रद्द कर दिया है। न्यायालय ने यह माना कि उक्त निलंबन आदेश, क्षेत्रीय महिला विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों के दबाव में पारित किया गया था, जो न्यायिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

प्रकरण का संक्षिप्त विवरण:

याचिकाकर्ता पर आरोप था कि उन्होंने महिला विधायक व प्रभारी मंत्री से फोन पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया। यह निलंबन आदेश तीन विधायकों के पत्र और मंत्री स्तर पर अनुशंसा के आधार पर पारित हुआ था। याचिकाकर्ता का पक्ष था कि उन्होंने नियमों के अंतर्गत एक कर्मचारी का स्थानांतरण किया था, जिससे नाराज़ होकर विधायक ने निलंबन की अनुशंसा की। शासन पक्ष ने वैकल्पिक उपाय के रूप में सहकारी प्राधिकरण (Tribunal) का विकल्प सुझाया था।

प्रमुख कानूनी प्रश्न (Legal Issues):

  1. क्या निलंबन आदेश निष्पक्ष, कानूनी और प्रशासनिक रूप से उचित था?
  2. क्या याचिकाकर्ता को वैकल्पिक उपचार (Alternative Remedy) के लिए सहकारी न्यायाधिकरण का रुख करना चाहिए था?
  3. क्या विधायकों द्वारा दबाव बनाकर निलंबन करवाना न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है?

न्यायालय की विधिक विवेचना:

1. वैकल्पिक उपचार की बाध्यता:

  • शासन पक्ष ने कहा कि याचिकाकर्ता को पहले संयुक्त रजिस्ट्रार (Sec 55(2), MP Cooperative Societies Act, 1960) या सहकारी न्यायाधिकरण (Tribunal) जाना चाहिए था।
  • न्यायालय ने कहा कि जब खुद सहकारिता मंत्री, तीन विधायक, और प्रभारी मंत्री इस प्रक्रिया में शामिल हों — तो उक्त मंचों से निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा नहीं की जा सकती
  • कोर्ट ने कहा, “Justice should not only be done but should also appear to be done” (न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए)।

2. निलंबन का आधार:

  • याचिकाकर्ता के विरुद्ध मुख्य आरोप था कि उन्होंने विधायक से फोन पर “अशोभनीय भाषा” में बात की।
  • लेकिन कोई स्पष्ट अपशब्द या अभद्र भाषा रिकॉर्ड में नहीं थी।
    कथित बयान: “मैं सहकारी बैंक का अधिकारी हूँ, राज्य सरकार के नियम मेरे ऊपर लागू नहीं होते। आप जो कह रहे हैं, मैं नहीं मानता।”
  • न्यायालय ने माना कि यह कथन कदापि अभद्र नहीं माना जा सकता, विशेष रूप से जब याचिकाकर्ता अपनी वैधानिक सीमा में कार्य कर रहे थे।

3. राजनीतिक हस्तक्षेप और दबाव:

  • न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि:
    • स्थानांतरण CEO का वैधानिक अधिकार है।
    • विधायक ने सार्वजनिक हित नहीं, बल्कि व्यक्तिगत कर्मचारी (क्लर्क) का पक्ष लिया।
    • विधायक द्वारा बार-बार फोन कर दबाव डालना लोक सेवक की स्वतंत्रता का हनन है।

महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख:

  1. Ashok Kumar Yadav v. State of Haryana (1985) 4 SCC 417:
    न्याय में केवल निष्पक्षता ही नहीं, बल्कि निष्पक्षता का आभास भी होना चाहिए।
    “Likelihood of bias is enough to invalidate an administrative action.”
  2. Commissioner of Police v. Gordhandas Bhanji (AIR 1952 SC 16):
    अधिकारों का प्रयोग नियुक्त प्राधिकारी ही कर सकता है, न कि राजनीतिक प्रभाव के अधीन।
  3. Tarun Chandra Kalita v. State of Assam (Gauhati HC):
    सरकारी सेवकों द्वारा राजनीतिक हस्तक्षेप के ज़रिए सेवा लाभ लेना, सेवा नियमों का उल्लंघन है।

न्यायालय का निष्कर्ष:

  • याचिकाकर्ता का निलंबन आदेश पूर्वाग्रहपूर्ण, दबाव में लिया गया और नियमों का दुरुपयोग था।
  • यह स्पष्ट हुआ कि विधायकों का “ईगो हर्ट” होना निलंबन का कानूनी आधार नहीं हो सकता
  • निलंबन आदेश को रद्द किया गया और याचिकाकर्ता को पूर्ण लाभ सहित बहाल करने का निर्देश दिया गया।

न्यायिक संदेश (Judicial Message):

  • यह निर्णय स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अनुमति दी जानी चाहिए, न कि राजनीतिक प्रभाव में
  • साथ ही, यह “Administrative Accountability vs Political Ego” की सीमाओं को भी रेखांकित करता है।

Source – MP High Court

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