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चार्ज से नहीं मिली मुक्ति, मोहम्मद इमरान पर गैर इरादतन हत्या और लापरवाही का केस चलेगा

Dr. Justice Swarana Kanta Sharma

मामला: मोहम्मद इमरान बनाम राज्य, GNCTD
न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय
निर्णय दिनांक: 04 अगस्त 2025
पीठ: माननीय डॉ. न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा

दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्ष 2019 के बहुचर्चित अनाज मंडी अग्निकांड मामले में आरोपी मोहम्मद इमरान द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में इमरान ने निचली अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।

माननीय न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांत शर्मा की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्यों और पुलिस जांच रिपोर्ट के आधार पर इमरान के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। कोर्ट ने माना कि इमरान न केवल अवैध निर्माण का हिस्सा था, बल्कि उसने जानबूझकर खतरनाक हालात में मजदूरों को काम और रहने की जगह मुहैया कराई, जिससे 45 लोगों की जान गई और कई अन्य घायल हुए।

पृष्ठभूमि:

08 दिसंबर 2019 को दिल्ली के सदर बाजार स्थित अनाज मंडी इलाके में भीषण अग्निकांड हुआ, जिसमें 45 लोगों की मृत्यु और 21 लोग घायल हुए। अधिकतर मृतक प्रवासी मजदूर थे, जो घटनास्थल पर बने अवैध कारखानों में काम करते थे और वहीं सो रहे थे। यह दुर्घटना एक शॉर्ट सर्किट के कारण हुई, जो एक अवैध रूप से संचालित व्यावसायिक परिसर में हुआ था।

इस मामले में आरोपी मोहम्मद इमरान सहित अन्य को IPC की विभिन्न धाराओं के तहत अभियुक्त बनाया गया। याचिकाकर्ता इमरान ने सत्र न्यायालय द्वारा आरोप तय करने के आदेश को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया कि वह उस मंज़िल का मालिक नहीं था, जहां से आग लगी थी और उसका उस क्षेत्र पर कोई नियंत्रण नहीं था।

विधिक मुद्दा:

  • क्या अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य इस स्तर पर मोहम्मद इमरान के विरुद्ध आरोप तय करने के लिए पर्याप्त हैं?
  • क्या याचिकाकर्ता को धारा 304 (Part II), 308, 304A, 337, 338, 35 और 36 IPC के अंतर्गत अभियोजन चलाने योग्य माना जा सकता है?

न्यायालय की विधिक टिप्पणियाँ:

  1. चार्ज फ्रेमिंग का सिद्धांत
    कोर्ट ने Manendra Prasad Tiwari v. Amit Kumar Tiwari तथा Ghulam Hassan Beigh v. Mohd. Maqbool Magrey मामलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि चार्ज फ्रेम करते समय कोर्ट को केवल यह देखना होता है कि क्या अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इस स्तर पर सबूतों की विश्वसनीयता या गहराई से जांच आवश्यक नहीं होती।
  2. अभियोजन पक्ष के मुख्य तर्क:
    • इमरान सह-स्वामी था और भवन के हिस्सों को बिना किसी वैध अनुमति के किराए पर दे रहा था।
    • बिजली की वायरिंग जर्जर स्थिति में थी, शिकायतों के बावजूद कोई सुधार नहीं किया गया।
    • आग से बचाव के कोई उपाय नहीं थे — ना फायर एक्सटिंग्विशर, ना अलार्म, ना आपातकालीन निकास।
    • परिसर में अत्यधिक ज्वलनशील वस्तुएं रखी गई थीं जो आग के फैलाव का कारण बनीं।
    • इमरान घटनास्थल पर नियमित रूप से उपस्थित रहता था और लाभ प्राप्त कर रहा था।
  3. याचिकाकर्ता की दलीलें:
    • उसका उस मंज़िल पर स्वामित्व नहीं था, जहां से आग शुरू हुई।
    • उसने पहले ही GPA के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी मोहम्मद रेहान को सौंप दी थी।
    • उसका खुद का कोई प्रत्यक्ष अपराध करने का उद्देश्य नहीं था।
  4. कोर्ट का निर्णय:
    • कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज (GPA, किरायानामे) ज्यादातर अपंजीकृत हैं और उनकी वैधता का परीक्षण केवल ट्रायल में हो सकता है।
    • इमरान की भूमिका सह-स्वामी और लाभार्थी के रूप में स्थापित होती है, जिसने जानबूझकर असुरक्षित परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ किया।
    • धारा 299 IPC के अनुसार, यदि किसी को किसी खतरनाक स्थिति की जानकारी थी और उसने उसके निवारण हेतु कोई कदम नहीं उठाया, तो वह गैर-इरादतन हत्या (304 Part II) में दोषी हो सकता है।

निष्कर्ष:

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया साक्ष्य इमरान के विरुद्ध गंभीर आरोपों को स्थापित करते हैं। याचिकाकर्ता के विरुद्ध मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल चार्ज फ्रेमिंग के स्तर तक सीमित है और इसका अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

Source – High Court Of Delhi

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