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MP HIGH COURT- छह साल की अलगाव के बाद हाईकोर्ट ने विवाह किया समाप्त, पत्नी को ₹20 लाख का अंतिम भुगतान आदेशित

MP HIGH COURT - छह साल की अलगाव के बाद हाईकोर्ट ने विवाह किया समाप्त

पक्षकार: कामेन्द्र सिंह राजावत बनाम सोनू सिंह FA 268/2023 एवं 270/2023
निर्णय दिनांक: 23 जुलाई 2025
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर
न्यायाधीश: न्यायमूर्ति श्री आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति श्री हीरदेश

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर की डिवीज़न बेंच ने पति कामेन्द्र सिंह राजावत द्वारा दायर तलाक याचिका को स्वीकार करते हुए विवाह विच्छेद (Divorce) की डिक्री पारित की है। न्यायालय ने यह निर्णय पति-पत्नी के बीच 6 वर्षों से जारी अलगाव, आपसी कटुता, वैवाहिक संबंधों का पूर्णतः टूट जाना और मानसिक क्रूरता को ध्यान में रखते हुए पारित किया।

वादी (पति) द्वारा यह दावा किया गया था कि पत्नी सोनू सिंह ने उनके साथ दांपत्य जीवन में सहयोग नहीं किया, उन्हें आत्महत्या की धमकियाँ दीं और झूठे प्रकरणों में फंसाया, जिससे उन्हें मानसिक प्रताड़ना हुई। वहीं पत्नी ने आरोप लगाए कि पति एवं उसके परिजनों द्वारा दहेज की मांग की गई और शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न किया गया।

परिवार न्यायालय द्वारा पहले पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई थी, किंतु उच्च न्यायालय ने यह माना कि:

“लगातार छह वर्षों से अलगाव, वैवाहिक संबंधों की अनुपस्थिति और आपसी तनाव, विवाह को एक कानूनी बंधन मात्र बनाते हैं; इसे बनाए रखना दोनों पक्षों के लिए मानसिक क्रूरता के समान है।”

1. वैवाहिक पृष्ठभूमि एवं विवाद का मूल आधार:

वाद-पत्रों से स्पष्ट है कि दोनों पक्षकारों का विवाह 26 अप्रैल 2016 को हुआ था और वर्ष 2019 से वे अलग-अलग रह रहे हैं। वादी (पति) ने तलाक की याचिका हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) के अंतर्गत “क्रूरता (Cruelty)” और “परित्याग (Desertion)” के आधार पर दाखिल की थी। इसके अतिरिक्त, पत्नी ने धारा 9 HMA के अंतर्गत वैवाहिक अधिकारों की पुनः स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।

2. पति के आरोप (Appellant’s Grounds for Divorce):

पति ने कई गंभीर आरोप लगाए, जैसे: पत्नी का झगड़ालू स्वभाव होना और तुच्छ बातों पर विवाद करना।आत्महत्या की धमकी देना। यौन संबंधों से बार-बार इनकार करना। माता-पिता को झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देना। संतानोत्पत्ति में असमर्थता का तथ्य छिपाकर विवाह किया जाना। मानसिक प्रताड़ना व जबरदस्ती रूपए व गहने ले जाना। इन सभी को मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) का आधार बताया गया।

3. पत्नी की आपत्तियाँ और जवाब:

पत्नी ने पति के सभी आरोपों का खंडन किया और कहा: पति व उनके परिजन ₹2 लाख दहेज की मांग कर रहे थे। ₹11 लाख नकद, गहने व घरेलू सामान देने के बावजूद उत्पीड़न हुआ। मारपीट कर उसे 29 जुलाई 2019 को घर से निकाल दिया गया। पति का दिल्ली में किसी अन्य महिला से संबंध है। उसने पति के खिलाफ धारा 498A IPC और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 में शिकायत दर्ज कराई है।

4. फैमिली कोर्ट का निर्णय:

परिवार न्यायालय ने:

  • पति की तलाक याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह क्रूरता व परित्याग सिद्ध नहीं कर सका
  • जबकि पत्नी की धारा 9 की याचिका स्वीकार कर ली गई।

5. उच्च न्यायालय द्वारा कानूनी परीक्षण:

(A) क्रूरता (Cruelty) की परिभाषा:

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों का हवाला दिया, जैसे:

  • Samar Ghosh v. Jaya Ghosh [(2007) 4 SCC 511]
  • U. Sree v. U. Srinivas [(2013) 2 SCC 114]
  • Dr. Dastane v. Dastane [AIR 1975 SC 1534]

इनमें कहा गया कि:

“क्रूरता केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी हो सकती है। यदि दो लोगों के बीच सह-अस्तित्व असंभव हो जाए, तो वह मानसिक क्रूरता मानी जाएगी।”

यहाँ, छह वर्षों से बिना सहवास (cohabitation) के जीवन और एक-दूसरे के प्रति कटुता को “मानसिक क्रूरता” माना गया।

(B) परित्याग (Desertion) की विधिक अवधारणा:

सुप्रीम कोर्ट ने Bipinchandra Shah v. Prabhavati [AIR 1957 SC 176] में परित्याग के लिए दो शर्तें निर्धारित की थीं:

  1. Separation का तथ्यात्मक आधार
  2. सहवास को स्थायी रूप से समाप्त करने का उद्देश्य (animus deserendi)

यहाँ न्यायालय ने माना कि पत्नी 2019 से लगातार अलग रह रही है और दोनों के बीच कोई सामंजस्य नहीं बचा, अतः परित्याग सिद्ध होता है।

(C) Irretrievable Breakdown of Marriage (अविभाज्य टूटन):

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्णयों का हवाला दिया:

  • R. Srinivas Kumar v. R. Shametha (2019) 4 SCC 409
  • Neha Tyagi v. Lt. Col. Deepak Tyagi (2022) 3 SCC 86

इन मामलों में कहा गया कि यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग हैं और संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं, तो विवाह को समाप्त करना ही न्यायोचित है।

6. न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष:

न्यायालय ने माना कि: पति-पत्नी के बीच कोई विवाहिक सामंजस्य नहीं बचा। विवाह एक कानूनी बंधन मात्र रह गया है। छह वर्षों से अलगाव, आपसी आरोप-प्रत्यारोप, मानसिक तनाव व मुकदमेबाजी – ये सभी “मानसिक क्रूरता” की श्रेणी में आते हैं। तलाक की डिक्री पारित की गई।

आर्थिक व्यवस्था (Permanent Alimony):

पति की ओर से प्रस्तावित ₹20 लाख की एकमुश्त राशि को न्यायालय ने पूर्ण और अंतिम समझौता (Full and Final Settlement) मानते हुए पत्नी को भुगतान का निर्देश दिया।

न्यायिक सिद्धांतों की पुनः पुष्टि:

  • विवाह जब केवल कानूनी बोझ बन जाए, तब उसे समाप्त करना ही न्याय है।
  • मानसिक क्रूरता के लिए इरादा (intention) आवश्यक नहीं होता, प्रभाव (impact) अधिक महत्वपूर्ण होता है।
  • दीर्घकालिक पृथक्करण स्वयं में विवाह-विच्छेद का पर्याप्त आधार हो सकता है।

निष्कर्ष:

यह निर्णय “मानसिक क्रूरता और विवाहिक टूटन” की अवधारणा को विस्तार देता है और बताता है कि न्यायिक दृष्टिकोण में विवाह का उद्देश्य केवल साथ रहना नहीं, बल्कि सम्मान और संतुलन के साथ जीना भी है।

Source – MP High Court

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