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पत्नी को छोड़कर अलग रहने वाले पति को तलाक से इनकार: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखा l

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए पति द्वारा मांगी गई तलाक की डिक्री को खारिज कर दिया। अदालत ने फैमिली कोर्ट, इंदौर के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि पति खुद पत्नी को छोड़कर अलग रहा और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं हुए, इसलिए वह अपने ही गलत आचरण का लाभ नहीं उठा सकता।


मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता का विवाह 10 नवंबर 1998 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। विवाह के बाद एक पुत्र का जन्म 18 दिसंबर 2002 को हुआ। पति का आरोप था कि पत्नी वैवाहिक दायित्व निभाने में रुचि नहीं रखती, उसने साथ रहने से इंकार कर दिया, और कई बार झगड़े किए। पति के अनुसार, पत्नी ने उस पर शराब पीने और अन्य महिलाओं से संबंध रखने के आरोप लगाए, जिससे मानसिक क्रूरता हुई।

पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-a) (क्रूरता) और 13(1)(i-b) (परित्याग) के तहत तलाक की याचिका दायर की, जिसे फैमिली कोर्ट ने 2018 में खारिज कर दिया। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।


पत्नी का पक्ष

पत्नी ने सभी आरोपों को नकारते हुए कहा कि वह हमेशा वैवाहिक दायित्व निभाने को तैयार रही। उसका कहना था कि पति ने खुद उसे अपने साथ नहीं रखा और झूठे आधार पर तलाक के लिए केस किया। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति का किसी महिला सहकर्मी से रोमांटिक संबंध है। इसके बावजूद वह अपने ससुराल में ससुर, सास, देवर और भाभी के साथ रह रही है और कभी matrimonial home नहीं छोड़ा।


अदालत में प्रमुख मुद्दे

हाईकोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न थे:

  1. क्या पत्नी का व्यवहार “मानसिक क्रूरता” की परिभाषा में आता है?
  2. क्या पत्नी ने “परित्याग” किया है, जिससे पति को तलाक का अधिकार मिल सके?
  3. क्या फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन किया?

अदालत की कानूनी विवेचना

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का हवाला दिया, जिनमें V. Bhagat v. D. Bhagat (1994), Ravi Kumar v. Julmidevi (2010), Samar Ghosh v. Jaya Ghosh (2007) और Shobha Rani v. Madhukar Reddi (1988) शामिल थे। इन मामलों में मानसिक क्रूरता की परिभाषा, वैवाहिक सहनशीलता और विवाह को बचाने के लिए आपसी समायोजन के महत्व को रेखांकित किया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि—

  • “क्रूरता” के लिए आचरण इतना गंभीर और वजनदार होना चाहिए कि पीड़ित पक्ष से साथ रहने की अपेक्षा न की जा सके।
  • छोटी-मोटी कहासुनी, सामान्य वैवाहिक तनाव या साधारण आरोप मानसिक क्रूरता नहीं माने जा सकते।
  • इस मामले में पत्नी ने न तो matrimonial home छोड़ा और न ही कोई आपराधिक मामला दर्ज कराया, बल्कि लगभग 19 वर्षों से ससुराल में रहकर अपने दायित्व निभा रही है।

महत्वपूर्ण अवलोकन

  1. पत्नी की निष्ठा: अदालत ने माना कि यह मामला असामान्य है, क्योंकि लंबे समय से पति अलग रहने के बावजूद पत्नी ने matrimonial home नहीं छोड़ा और अपने ससुराल वालों की सेवा की।
  2. झूठे आरोप का प्रश्न: पत्नी द्वारा पति पर किसी अन्य महिला से संबंध का आरोप “क्रूरता” सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, विशेषकर तब जब वह मात्र प्रतिवाद में लिखा गया हो और सार्वजनिक रूप से न कहा गया हो।
  3. पति की गलती: अदालत ने nullus commodum capere potest de injuria sua propria सिद्धांत लागू किया — अर्थात कोई भी अपने ही गलत आचरण का लाभ नहीं उठा सकता।
  4. साक्ष्यों की कमी: पति अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जबकि उसके खुद के परिवार के सदस्यों ने उसका समर्थन नहीं किया।

अंतिम निर्णय

  • हाईकोर्ट ने पाया कि यह पत्नी नहीं, बल्कि पति था जिसने अलग रहकर विवाहिक दायित्व का उल्लंघन किया।
  • फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार रखते हुए तलाक की याचिका खारिज कर दी गई।
  • अपील को निराधार मानते हुए खारिज किया गया और पक्षकारों को अपने-अपने खर्च वहन करने का निर्देश दिया गया।

Case Citation

मामले का नाम: संतोष चौधरी बनाम सीमा चौधरी, FA 1283/2018
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ,
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति विवेक रूसिया एवं माननीय न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री समीर वर्मा, अधिवक्ता
प्रतिवादी/आपत्ति दर्जकर्ता की ओर से: श्री प्रमोद सी. नायर, अधिवक्ता,

Source – MP High Court

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