मामले का नाम: मोहम्मद अशिक एवं अन्य बनाम राज्य मध्यप्रदेश एवं अन्य,CRR 2254/2024,
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ,
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति गजेन्द्र सिंह
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री विवेक सिंह (वरिष्ठ अधिवक्ता) के साथ श्री राजेश यादव, अधिवक्ता
राज्य की ओर से: श्री हेमंत शर्मा, शासकीय अधिवक्ता, महाधिवक्ता की ओर से
प्रतिवादी/आपत्ति दर्जकर्ता की ओर से: श्री दिलीप कुमार सक्सेना, अधिवक्ता
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर की एकलपीठ ने क्रिमिनल रिवीजन नंबर 2254/2024 में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए पति के खिलाफ लगाए गए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) के आरोप को रद्द कर दिया, लेकिन 498A (वैवाहिक क्रूरता), 323 (मारपीट), 294 (अश्लील शब्दों का प्रयोग) और मुस्लिम महिला (विवाह के अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 4 समेत अन्य आरोपों में ट्रायल जारी रखने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
शिकायतकर्ता की शादी 29 नवंबर 2010 को मुस्लिम रीति-रिवाज से मोहम्मद अशिक से हुई थी। आरोप है कि शादी के बाद से ही पति ने उसे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी। शिकायत के अनुसार, पति ने पत्नी की इच्छा के विरुद्ध बार-बार अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए और विरोध करने पर अश्लील भाषा का प्रयोग किया।
शिकायतकर्ता का कहना है कि 1 अक्टूबर 2023 की रात 10 बजे भी पति ने उसकी मर्जी के खिलाफ अप्राकृतिक संबंध बनाए। जब उसने विरोध किया, तो पति ने तलाक-ए-बिद्दत (तीन तलाक) उच्चारित कर उसे घर से बाहर निकाल दिया।
इसके बाद पीड़िता अपने मायके पहुंची और 15 दिसंबर 2023 को थाना महाकाल, जिला उज्जैन में रिपोर्ट दर्ज कराई। इस पर क्राइम नंबर 653/2023 दर्ज हुआ और पुलिस ने धारा 294, 323, 376, 498A, 34 IPC और मुस्लिम महिला अधिनियम की धारा 4 के तहत चालान पेश किया।
सत्र न्यायालय में चार्ज-फ्रेमिंग
मामला सत्र न्यायालय, उज्जैन में विचारण हेतु पहुँचा। वहां पर:
- आरोपी नंबर 1 (पति) पर धारा 294, 323, 377, 498A, 34 IPC और मुस्लिम महिला अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप तय किए गए।
- अन्य सह-आरोपियों पर धारा 294, 323, 498A, 34 IPC के तहत आरोप फ्रेम हुए।
रिवीजन याचिका के तर्क
रिवीजन याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा:
- कुछ सह-आरोपियों के नाम FIR में नहीं थे, फिर भी उन पर चार्ज फ्रेम कर दिए गए।
- धारा 377 IPC के तहत चार्ज गलत है, क्योंकि आरोपी नंबर 2 (पत्नी) पहले से ही बालिग थी और पति-पत्नी के बीच अप्राकृतिक संबंध को इस धारा के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता।
- उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों — Kuldeep Singh बनाम पंजाब राज्य और Umang Singhar बनाम मध्यप्रदेश राज्य — पर भरोसा जताया।
राज्य और पीड़िता का पक्ष
- राज्य की ओर से कहा गया कि FIR, 161 CrPC बयान, घरेलू हिंसा की रिपोर्ट और मंत्रालय को दी गई शिकायत में स्पष्ट रूप से प्रताड़ना और अप्राकृतिक यौन संबंध का उल्लेख है।
- पीड़िता के वकील ने भी आरोपों का समर्थन किया और चार्ज कायम रखने की मांग की।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
माननीय न्यायमूर्ति गजेन्द्र सिंह ने आदेश में कहा:
- FIR और अन्य साक्ष्य दर्शाते हैं कि अप्राकृतिक संबंध की घटना तलाक से पहले हुई थी।
- Umang Singhar और Banty Jatav मामलों का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि पत्नी की इच्छा के विरुद्ध ऐसा संबंध क्रूरता (498A) की श्रेणी में आता है, न कि धारा 377 IPC में।
- इस आधार पर धारा 377 के तहत आरोप कायम रखने का कोई औचित्य नहीं है।
- हालांकि, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना, मारपीट, अश्लील भाषा और तीन तलाक के आरोपों के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, इसलिए बाकी सभी धाराओं में ट्रायल जारी रहेगा।
अदालत का आदेश
- धारा 377 IPC का चार्ज रद्द।
- धारा 294, 323, 498A IPC, 34 IPC और मुस्लिम महिला अधिनियम की धारा 4 के तहत चार्ज कायम।
- ट्रायल कोर्ट शेष धाराओं में नियमित सुनवाई जारी रखेगा।
- रिवीजन याचिका आंशिक रूप से स्वीकार।
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- Order 2 Rule 1 CPC | Frame of suit
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