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सेक्शन 53A TPA के तहत कब्ज़ा बचाने में नाकाम, मप्र हाईकोर्ट ने अपील खारिज की

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, इंदौर खंडपीठ ने Ramchandra (Deceased) through LRs v. Babulal & Anr. मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए 1989 के विवादित Agreement to Sell को अवैध ठहराया और कब्ज़ा संरक्षण देने से इंकार कर दिया।

माननीय न्यायमूर्ति संजिव एस. कालगांवकर ने सेकंड अपील नं. 1666/2025 पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट और फर्स्ट अपीलेट कोर्ट के फैसलों को बरकरार रखा

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला दो भाइयों के बीच परिवारिक बंटवारे और जमीन के मालिकाना हक़ को लेकर चला।

  • वादी (Babulal) ने दावा किया कि 1993-94 में परिवारिक बंटवारे में उसे विवादित जमीन मिली और राजस्व रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज हुआ।
  • उसने अपने भाई Ramchandra को 50% मुनाफे पर खेती करने की अनुमति दी।
  • 2001-02 में पता चला कि Ramchandra ने उसकी अनुमति के बिना अपना नाम म्यूटेशन में दर्ज करवा लिया और दावा किया कि उसने जमीन 18.01.1989 के Agreement to Sell से खरीदी थी।

वादी ने इस एग्रीमेंट को फर्जी और अवैध बताते हुए घोषणात्मक वाद, स्थायी निषेधाज्ञा और कब्ज़ा वापसी की मांग की।


निचली अदालतों का निर्णय

  • ट्रायल कोर्ट: वादी के पक्ष में डिक्री जारी — एग्रीमेंट को अवैध और शून्य घोषित किया, कब्ज़ा वापसी का आदेश दिया।
  • फर्स्ट अपीलेट कोर्ट: ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।
  • दोनों अदालतों ने पाया कि: एग्रीमेंट न तो रजिस्टर्ड था, न ही भुगतान के सबूत पेश हुए।म्यूटेशन से टाइटल प्राप्त नहीं होता।

सेकंड अपील के तर्क

अपीलकर्ता (Ramchandra के LRs) ने दलील दी:

  1. निचली अदालतों ने 1993-94 के बंटवारे की गलत धारणा बनाई, जबकि बंटवारा 1976 में हुआ था।
  2. हैंडराइटिंग एक्सपर्ट ने हस्ताक्षर प्रमाणित किए, फिर भी एग्रीमेंट को अवैध माना गया।
  3. सेक्शन 53A, ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के तहत कब्ज़ा सुरक्षित किया जाना चाहिए था।
  4. रजिस्टर्ड न होने के आधार पर एग्रीमेंट को खारिज करना गलत है।

प्रतिवादी का पक्ष

  • मात्र Agreement to Sell से स्वामित्व नहीं मिलता।
  • एग्रीमेंट के निष्पादन और वैधता पर गंभीर संदेह है।
  • भुगतान या अनुबंध की पूर्ति का कोई सबूत नहीं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

1. सेकंड अपील का दायरा (CPC की धारा 100)

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (Chandrabhan v. Saraswati, (2022) 20 SCC 199; Kulwant Kaur, (2001) 4 SCC 262) का हवाला देते हुए कहा —

  • सेकंड अपील केवल Substantial Question of Law पर ही सुनी जा सकती है।
  • तथ्यों की पुनः सराहना करना या निचली अदालतों के साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करना संभव नहीं, जब तक कि निर्णय में स्पष्ट कानूनी त्रुटि या पर्सवर्सिटी न हो।

2. 1993-94 के बंटवारे की स्वीकारोक्ति

  • लिखित बयान के पैरा 1 में 1993-94 में बंटवारे की स्पष्ट स्वीकृति दी गई थी।
  • सबूतों से यह भी स्पष्ट हुआ कि 1993-94 में ही वादी के नाम म्यूटेशन हुआ।

3. हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय

  • यह केवल Opinion Evidence है (Evidence Act, S. 45)।
  • इसे प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के साथ पढ़ना चाहिए।
  • कोर्ट ने प्रत्यक्ष साक्ष्यों के आधार पर एग्रीमेंट की वैधता पर संदेह जताया।

4. सेक्शन 53A, TPA के तहत कब्ज़ा संरक्षण

  • इस प्रावधान का लाभ तभी मिलता है जब:
    1. लिखित अनुबंध हो,
    2. कब्ज़ा दिया गया हो,
    3. अनुबंध के अनुपालन में कुछ किया गया हो,
    4. अनुबंध का पालन किया गया हो या पालन की तत्परता हो।
  • अपीलकर्ता इन शर्तों को पूरा नहीं कर पाया, विशेषकर भुगतान और अनुबंध पालन का सबूत नहीं दिया।

5. म्यूटेशन का प्रभाव

  • म्यूटेशन केवल राजस्व प्रविष्टि है, इससे स्वामित्व का अधिकार नहीं मिलता (Suraj Lamp, (2012) 1 SCC 656)।

हाईकोर्ट का निष्कर्ष

  • निचली अदालतों के निष्कर्ष तथ्यों और साक्ष्यों के सही विश्लेषण पर आधारित हैं।
  • न कोई कानूनी गलती, न पर्सवर्सिटी पाई गई।
  • कोई Substantial Question of Law नहीं बनता।
  • अपील खारिज

फैसले से निकले प्रमुख कानूनी सिद्धांत

  1. एग्रीमेंट टू सेल से स्वामित्व अधिकार नहीं बनता, भले ही म्यूटेशन हो।
  2. सेक्शन 53A TPA का लाभ तभी मिलेगा जब अनुबंध का पालन व भुगतान सिद्ध हो।
  3. हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट अंतिम नहीं, केवल राय है।
  4. सेकंड अपील में तथ्यात्मक निष्कर्षों में हस्तक्षेप केवल Substantial Question of Law पर संभव है।

निष्कर्ष

यह निर्णय जमीन विवादों और Agreement to Sell मामलों में महत्वपूर्ण है, खासकर जब कब्ज़ा संरक्षण (Section 53A TPA) और म्यूटेशन के आधार पर मालिकाना हक़ का दावा किया जाए। यह स्पष्ट करता है कि म्यूटेशन टाइटल का प्रमाण नहीं है और बिना रजिस्टर्ड सेल डीड, मालिकाना हक़ सिद्ध करना कठिन है

Case Citation

मामला: रामचंद्र (मृत) उनके विधिक प्रतिनिधि बनाम बाबूलाल एवं अन्य SA 1666/2025
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति संजिव एस. कालगांवकर
अपीलकर्ता की ओर से: श्री सुनील जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता, सह-अपस्थित सुश्री नंदिनी शर्मा, अधिवक्ता।
प्रतिवादी की ओर से : श्री निलेश अग्रवाल, अधिवक्ता।

Source – MP High Court

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