मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम निर्णय देते हुए नगर परिषद कैलारस, जिला मुरैना में संविदा/दैनिक वेतन पर की गई 109 नियुक्तियों को अवैध करार दिया। न्यायमूर्ति आशीष श्रोटी की एकलपीठ ने कहा कि राज्य सरकार की अनुमति और विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई ऐसी नियुक्तियाँ “Void ab initio” (शून्य प्रारंभ से) मानी जाएंगी।
यह फैसला कई रिट याचिकाओं (जिनमें प्रमुख रूप से जितेन्द्र शाक्य बनाम राज्य शासन एवं अन्य, WP No. 8290/2023 तथा विक्की बाथम एवं अन्य, WP No. 18104/2023 शामिल थीं) को एक साथ सुनते हुए सुनाया गया।
मामला क्या था?
- वर्ष 2021 में नगर परिषद कैलारस के तत्कालीन मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) ने परिषद की जरूरत का हवाला देते हुए 109 कर्मचारियों को दैनिक वेतन/संविदा पर नियुक्त कर लिया।
- यह नियुक्तियाँ जल वितरण, राजस्व संग्रहण एवं अन्य कार्यों के लिए की गई थीं।
- बाद में शिकायतें आईं कि इन नियुक्तियों में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताएँ और नियमों का उल्लंघन हुआ है।
- जिला नगरीय विकास अभिकरण (DUDA) के प्रोजेक्ट ऑफिसर द्वारा की गई जांच में पाया गया कि:
- नियुक्तियाँ बिना विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के की गईं।
- अधिकांश कर्मचारी कभी कार्यस्थल पर उपस्थित नहीं हुए और घर बैठे वेतन उठाते रहे।
- नियुक्तियाँ परिषद के स्वीकृत बजट से कहीं अधिक बोझ डाल रही थीं।
- उपस्थिति सत्यापन तक चपरासी स्तर के कर्मचारियों से कराया गया।
इसी रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने निर्देश दिए और CMO ने 10.04.2023 को सभी 109 कर्मचारियों की सेवाएँ समाप्त कर दीं।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में आदेश को चुनौती दी और दलील दी कि:
- उनकी नियुक्ति CMO ने की थी और वही कार्रवाई करने का प्राधिकारी था, न कि राज्य सरकार।
- उन्हें बर्खास्त करने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Natural Justice) के तहत सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।
- CMO ने स्वतंत्र दिमाग से नहीं, बल्कि उच्च अधिकारियों के दबाव में आदेश पारित किया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों – Commissioner of Police, Bombay v. Gordhandas Bhanji (AIR 1952 SC 16) और Mansukhlal Vithaldas Chauhan v. State of Gujarat (1997) 7 SCC 622 का हवाला दिया।
प्रतिवादियों का पक्ष
नगर परिषद और राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि:
- मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 94(9) के अनुसार संविदा नियुक्ति के लिए राज्य सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
- यहां नियुक्तियाँ बिना अनुमति और बिना स्वीकृत स्टाफिंग पैटर्न के विपरीत की गईं।
- नियुक्तियाँ बैकडोर एंट्री (Backdoor Entry) थीं और संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन करती थीं।
- जब नियुक्ति ही अवैध है, तब सुनवाई का अवसर देना “Empty Formality” मात्र है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसलों – State of U.P. v. Sudhir Kumar Singh (2021) 19 SCC 706 और State of Bihar v. Devendra Sharma (2020) 15 SCC 466 का हवाला देते हुए कहा कि अवैध नियुक्तियों को निरस्त करने में प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों और कानूनी बिंदुओं पर विचार करने के बाद कहा:
- नगर परिषद या उसका CMO बिना राज्य सरकार की अनुमति संविदा नियुक्ति नहीं कर सकते।
- याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियाँ बिना विज्ञापन, बिना अनुबंध, बिना अवधि निर्धारित किए की गई थीं।
- DUDA की जांच रिपोर्ट से स्पष्ट है कि अधिकांश कर्मचारी कार्य पर उपस्थित नहीं थे और वेतन उठा रहे थे।
- नियुक्तियाँ प्रारंभ से ही अवैध थीं, इसलिए सुनवाई का अवसर देना आवश्यक नहीं था।
- सुप्रीम कोर्ट के Umadevi (2006) 4 SCC 1 फैसले के अनुसार, बैकडोर एंट्री के माध्यम से की गई नियुक्तियाँ न तो नियमित की जा सकती हैं और न ही संरक्षित।
अंततः, कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और नगर परिषद की कार्रवाई विधिसम्मत है और याचिकाओं में कोई दम नहीं है। सभी याचिकाएँ खारिज कर दी गईं।
Case Citation
मामला: जितेन्द्र शाक्य एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य W.P. No. 8290/2023
Neutral Citation No. 2025:MPHC-GWL:23449
निर्णय दिनांक :तारीख: 23 सितम्बर 2025
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर
पीठ; माननीय न्यायमूर्ति अशिष श्रोटी
याचिकाकर्ता (Petitioners) की ओर से: श्री एम.पी.एस. रघुवंशी (वरिष्ठ अधिवक्ता) श्री धर्मेन्द्र सिंह रघुवंशी, अधिवक्ता
राज्य की ओर से (Respondent State): श्री एन.के. गुप्ता, शासकीय अधिवक्ता
प्रतिवादी नगर परिषद/अन्य की ओर से: श्री आलोक कुमार शर्मा, अधिवक्ता (कुछ याचिकाओं में) श्री अंकुर महेश्वरी, अधिवक्ता
Download Judgement PDF
- Order 2 Rule 1 CPC | Frame of suit
- ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत पर विचार कर सुनाई उम्रकैद, फांसी की सजा को किया खत्म : मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ; दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की 15 साल से अधिक सेवाएं पेंशन के लिए जोड़ी जाएंगी,
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट : नगर परिषद कैलारस में 109 संविदा नियुक्तियाँ अवैध, याचिकाएँ खारिज
- सुप्रीम कोर्ट : तेलंगाना रिश्वत प्रकरण में FIR रद्द करने का आदेश बरकरार