मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, ग्वालियर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना उचित शो-कॉज नोटिस दिए सेवानिवृत्त कर्मचारी से वेतन या अन्य राशि की वसूली नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक आदेशों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन आवश्यक है। यह मामला P.K. Jain बनाम राज्य शासन से जुड़ा है, जिसमें न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहलावत ने फैसला सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पी.के. जैन वर्ष 1976 में सहायक लेखा परीक्षक (Assistant Audit Officer) के पद पर नियुक्त हुए थे। वर्ष 1991 में उन्हें सहायक निदेशक, मध्यप्रदेश जीवन बीमा निगम के पद पर पदोन्नत किया गया। बाद में यह निगम वित्त विभाग में विलय कर दिया गया।
जैन लंबे समय तक सेवा देने के बाद वरिष्ठ वेतनमान और चयन वेतनमान पाने के हकदार थे, लेकिन उन्हें यह लाभ समय पर नहीं मिला। इसके विपरीत, उनके कनिष्ठ अधिकारियों को 1 जनवरी 2005 से लाभ दे दिया गया। इसके चलते जैन ने कई बार विभाग को प्रतिवेदन दिया।
2008 में उन्हें खजांची अधिकारी (Treasury Officer), छतरपुर पद पर कार्यभार ग्रहण करना था। इस हेतु उन्होंने विधिवत अनुमति ली और स्थानांतरण के बाद ₹880/- का यात्रा भत्ता (TA Bill) प्रस्तुत किया। लेकिन यह बिल स्वीकृत नहीं हुआ।
विभागीय कार्रवाई
10 नवम्बर 2009 को कलेक्टर द्वारा जैन को एक शो-कॉज नोटिस जारी किया गया, जिसमें उनकी दो वेतन वृद्धि रोकने का प्रस्ताव था। जैन ने 23 जनवरी 2010 को विस्तृत उत्तर दिया और बताया कि उन्होंने नियमानुसार यात्रा की थी तथा इसमें कोई अनियमितता या लापरवाही नहीं हुई।
लेकिन विभाग ने उनका उत्तर नजरअंदाज कर दिया और मामला लोक सेवा आयोग को भेज दिया। आयोग ने 18 जनवरी 2012 को यह राय दी कि जैन चूँकि 31 मई 2012 को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, इसलिए वेतन वृद्धि रोकने के बजाय दो वेतन वृद्धि के बराबर राशि की वसूली की जाए।
इसके बाद 23 मई 2012 को विभाग ने आदेश जारी कर ₹34,268/- की वसूली का निर्देश दिया। यह आदेश जैन को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद 1 जून 2012 को सौंपा गया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री आलोक कटारे ने तर्क दिया कि:
- वसूली का आदेश सेवानिवृत्ति के बाद दिया गया, जो कि अवैध है।
- मध्यप्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966 की धारा 10(3) केवल तभी लागू होती है जब कर्मचारी की लापरवाही से शासन को कोई आर्थिक क्षति हुई हो। लेकिन इस मामले में कोई नुकसान नहीं हुआ।
- यात्रा भत्ता बिल ईमानदारी से प्रस्तुत किया गया था, और ₹880/- की राशि भी स्वीकृत नहीं हुई थी, इसलिए सरकारी नुकसान का प्रश्न ही नहीं उठता।
- बिना उचित शो-कॉज नोटिस दिए वसूली का आदेश पारित करना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ORYX Fisheries Pvt. Ltd. बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2010) 13 SCC 427 भी उद्धृत किया, जिसमें कहा गया है कि यदि प्राधिकरण उत्तर पर विचार किए बिना मात्र “असंतोषजनक” कहकर आदेश पारित करे तो वह आदेश गैर-कारणयुक्त (Non-Speaking Order) माना जाएगा।
प्रतिवादी की दलीलें
राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता श्री बी.एम. पटेल ने कहा कि:
- जैन की सेवानिवृत्ति के कारण वेतन वृद्धि रोकी नहीं जा सकती थी, इसलिए उचित विकल्प के तौर पर वसूली का आदेश दिया गया।
- उन्हें पर्याप्त अवसर दिया गया था, अतः आदेश वैध है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने कहा कि –
- वसूली का आदेश गैर-कारणयुक्त (Non-Speaking Order) है क्योंकि इसमें याचिकाकर्ता के उत्तर पर कोई विचार नहीं किया गया।
- आदेश पारित करने से पूर्व उचित शो-कॉज नोटिस नहीं दिया गया, जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
- चूँकि शासन को कोई आर्थिक क्षति नहीं हुई थी, इसलिए नियम 10(3) लागू नहीं होता।
- सेवानिवृत्ति के बाद इस तरह का दंडात्मक आदेश पारित करना अवैध है।
हाईकोर्ट का निर्णय
- दिनांक 23 मई 2012 का वसूली आदेश निरस्त किया गया।
- यदि शासन ने याचिकाकर्ता से कोई राशि वसूल की है, तो उसे एक माह के भीतर वापस लौटाने का निर्देश दिया गया।
- याचिका को स्वीकार करते हुए पी.के. जैन को पूर्ण राहत दी गई।
Case Citation
मामला:पी.के. जैन बनाम मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य रिट याचिका क्रमांक : 4093/2012
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ
पीठ; माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहलावत
याचिकाकर्ता की ओर से : श्री आलोक कटारे, अधिवक्ता
प्रतिवादी राज्य की ओर से : श्री बी.एम. पटेल, शासकीय अधिवक्ता
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