राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण बनाम संजय कुमार एवं अन्य
(Arbitration Appeal No. 37 of 2022)
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ
पीठासीन न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया
माननीय न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा दायर मध्यस्थता अपील संख्या 37/2022 में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया।
विवाद का विषय, जिला शिवपुरी की तहसील करेरा स्थित भूमि अधिग्रहण से संबंधित था, जिसमें मुआवज़े की राशि बढ़ाने हेतु संजय कुमार द्वारा दायर याचिका पर मध्यस्थ-ग्वालियर संभागीय आयुक्त द्वारा निर्णय दिया गया था। इस निर्णय को चुनौती देते हुए संजय कुमार द्वारा मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के अंतर्गत शिवपुरी के चतुर्थ जिला न्यायाधीश के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया था, जिसे न्यायालय ने 26.11.2021 को स्वीकार कर लिया।
1. पृष्ठभूमि:
यह विवाद राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3G के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण और उसके प्रतिकर (मुआवज़े) को लेकर उत्पन्न हुआ। शिवपुरी जिले की करेरा तहसील की भूमि का अधिग्रहण राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 25 व 76 के चौड़ीकरण हेतु किया गया। प्रारंभिक मुआवज़ा निर्धारण के विरुद्ध, संजय कुमार (उत्तरदायी पक्ष) ने मध्यस्थता हेतु आवेदन किया, जिसे ग्वालियर संभागीय आयुक्त ने सुनवाई हेतु स्वीकार किया।
2. प्रक्रिया और विवाद का विकास:
- अधिग्रहण के पश्चात NHAI द्वारा निर्धारित मुआवज़े से असंतुष्ट होकर संजय कुमार ने धारा 3G(5) के तहत मध्यस्थता याचिका दायर की।
- यह मध्यस्थता ग्वालियर संभागीय आयुक्त के समक्ष संपन्न हुई।
- मध्यस्थता में प्रतिकर वृद्धि याचिका खारिज कर दी गई।
- इसके बाद संजय कुमार ने धारा 34 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) के तहत आदेश को चुनौती दी, जो चतुर्थ जिला न्यायाधीश, शिवपुरी ने स्वीकार करते हुए मध्यस्थता आदेश को निरस्त कर दिया।
- इसी आदेश को NHAI ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर में अपील (AA No. 37/2022) के रूप में चुनौती दी।
3. मुख्य विधिक प्रश्न:
- क्या जिला न्यायालय, शिवपुरी को धारा 34 के अंतर्गत मध्यस्थता आदेश को चुनौती देने हेतु क्षेत्रीय अधिकार (territorial jurisdiction) प्राप्त था?
4. न्यायालय का दृष्टिकोण एवं विश्लेषण:
i. सीट ऑफ आर्बिट्रेशन (Seat of Arbitration) का महत्व:
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख किया, विशेषकर:
- BGS SGS Soma JV v. NHPC Ltd. (2020) 4 SCC 234
- Hindustan Construction Company Ltd. v. NHPC Ltd. (2020) 4 SCC 310
इन निर्णयों में स्पष्ट किया गया कि यदि मध्यस्थता का “सीट” (seat) निर्धारित है, तो वहीं की अदालत को ही विशेष क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त होता है, भले ही विवाद से संबंधित भूमि या पक्ष कहीं और स्थित हों।
ii. मध्यस्थ की नियुक्ति का विधिक प्रभाव:
ग्वालियर संभागीय आयुक्त की नियुक्ति स्वयं केंद्र सरकार की अधिसूचना (31.12.2001 तथा म.प्र. शासन की 11.02.2002 की चिट्ठी) के तहत की गई थी। इसका प्रभाव यह है कि “सीट ऑफ आर्बिट्रेशन” स्वतः ग्वालियर मानी जाती है, और इसी आधार पर धारा 34 की याचिका ग्वालियर की सिविल कोर्ट में ही दायर की जा सकती थी।
5. क्षेत्रीय अधिकार का अभाव – विधिक सिद्धांत:
- Kiran Singh v. Chaman Paswan (AIR 1954 SC 340) में सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्ध कर दिया है कि अधिकार क्षेत्र के अभाव में दिया गया निर्णय “शून्य” (nullity) होता है और उसकी वैधता कभी भी, कहीं भी चुनौती दी जा सकती है।
- इसी प्रकार, M.P. Power Trading Co. Ltd. v. Narmada Equipments (P) Ltd. (2021) 14 SCC 548 के अनुसार भी क्षेत्रीय अधिकार का अभाव याचिका की अस्वीकृति का पूर्ण आधार बनता है।
6. न्यायालय का निष्कर्ष:
- चूंकि मध्यस्थता का स्थान (seat) ग्वालियर था और शिवपुरी की अदालत को उस पर सुनवाई का अधिकार नहीं था,
- इसलिए शिवपुरी जिला न्यायालय द्वारा पारित आदेश क्षेत्राधिकार के अभाव में शून्य (null and void) माना गया,
- और उसे 25 जुलाई 2025 के निर्णय द्वारा निरस्त कर दिया गया।
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