इस अपील का मूल मुद्दा था—क्या अपीलीय न्यायालय (Appellate Court) को अतिरिक्त साक्ष्य (Additional Evidence) स्वीकार करने से पहले पक्षकारों की दलीलों और प्लीडिंग्स की जांच करना आवश्यक है?
मामले की शुरुआत 1995 में हुई जब प्रतिवादी (Abdul Shukoor) ने अपीलकर्ताओं (Iqbal Ahmed और अन्य) के साथ एक मकान बेचने का समझौता किया। कुल कीमत ₹10,67,000 तय हुई थी, जिसमें ₹5,00,000 अग्रिम दिया गया। शेष राशि एक वर्ष छह माह में चुकाई जानी थी। जब प्रतिवादी ने बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित करने से इनकार किया, तो अपीलकर्ताओं ने विशिष्ट पालन (Specific Performance) के लिए सिविल वाद दायर किया।
निचली अदालतों का दृष्टिकोण
- ट्रायल कोर्ट (2000):
- ट्रायल कोर्ट ने पाया कि समझौता वैध और सिद्ध है।
- अपीलकर्ता हमेशा तैयार और इच्छुक थे (Readiness & Willingness) और उनके पास राशि भी उपलब्ध थी।
- प्रतिवादी की दलील कि उसने केवल ₹1 लाख का ऋण लिया और खाली स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर किए, अविश्वसनीय मानी गई।
- नतीजतन, कोर्ट ने विशिष्ट पालन का आदेश पारित किया।
- हाईकोर्ट (2008):
- प्रतिवादी ने अपील दाखिल की और Order 41 Rule 27 CPC के तहत अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने की अनुमति मांगी।
- हाईकोर्ट ने मकान कर रजिस्टर, एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट और बिक्री विलेख जैसे दस्तावेजों को रिकॉर्ड में लिया।
- कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ताओं का दावा कि उन्होंने संपत्ति बेचकर धन जुटाया था, गलत है।
- परिणामस्वरूप, ट्रायल कोर्ट का निर्णय पलट दिया गया और प्रतिवादी को केवल ₹1 लाख लौटाने का आदेश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में अपील
अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया:
- हाईकोर्ट ने अतिरिक्त साक्ष्य बिना उचित प्रक्रिया के स्वीकार किया।
- उन्हें इन दस्तावेजों का खंडन करने का अवसर नहीं दिया गया।
- ट्रायल कोर्ट का सुविचारित निर्णय गलत तरीके से पलटा गया।
- सुनवाई के बाद हाईकोर्ट द्वारा लंबे समय तक फैसला न देना न्यायसंगत नहीं था।
वहीं, प्रतिवादी ने कहा:
- Order 41 Rule 27 CPC और धारा 73 साक्ष्य अधिनियम के तहत हाईकोर्ट को अधिकार था।
- दस्तावेज़ सार्वजनिक अभिलेख थे और मामले की सच्चाई उजागर करने आवश्यक थे।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से विश्लेषण करते हुए कहा:
- अतिरिक्त साक्ष्य और प्लीडिंग्स का संबंध:
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत को Order 41 Rule 27 CPC के तहत अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या वह साक्ष्य संबंधित पक्ष की प्लीडिंग्स (Written Statement/ Plaint) से मेल खाता है।
- यदि कोई तथ्य प्लीडिंग्स में नहीं है, तो उस आधार पर साक्ष्य पेश करना न्यायसंगत नहीं होगा।
- हाईकोर्ट की त्रुटि:
- हाईकोर्ट ने प्रतिवादी के लिखित बयान में ऐसे तथ्यों का उल्लेख न होने के बावजूद दस्तावेज़ स्वीकार कर लिए।
- इस प्रकार, हाईकोर्ट ने प्रक्रिया का पालन किए बिना अतिरिक्त साक्ष्य पर भरोसा कर ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया।
- कानूनी मिसालें:
- Bachhaj Nahar बनाम Nilima Mandal (2009) और Union of India बनाम Ibrahim Uddin (2012) के फैसलों का हवाला दिया गया, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित है कि बिना प्लीडिंग्स के नया साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- हाईकोर्ट का आदेश अवैध और अस्थिर माना गया।
- मामला पुनः विचार (Remand) हेतु हाईकोर्ट को वापस भेजा गया।
- हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि अपील और Order 41 Rule 27 की अर्जी को दोबारा विधिसम्मत तरीके से सुना जाए और शीघ्र निपटारा किया जाए।
- सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष (Merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की और केवल प्रक्रिया की त्रुटि को आधार बनाया।
- दोनों पक्षों को अपने-अपने खर्च स्वयं उठाने का आदेश दिया गया।
Case Citation
इक़बाल अहमद (मृत) बनाम अब्दुल शुकूर सिविल अपील संख्या: 10458/2010
न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ: न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर
अपीलकर्ता की ओर से: श्री राघवेन्द्र श्रीवास्तव, वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate)
प्रतिवादी की ओर से: सुश्री महालक्ष्मी पवनी, वरिष्ठ अधिवक्ता (Senior Advocate)
Source- Supreme Court of India
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