हमारा कानून

“होमगार्ड सैनिक को संचित निधि का लाभ देने का MP हाईकोर्ट का आदेश”

HONBLE-SHRI-JUSTICE-ASHISH-SHROT

मामला: रामभरोसा मीना बनाम मध्यप्रदेश शासन व अन्य
विचारण संख्या: रिट याचिका क्रमांक 9086/2023
निर्णय दिनांक: 21 जुलाई 2025
न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति अशिष श्रोती
न्यायालय: उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ, मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ के माननीय न्यायमूर्ति श्री अशिष श्रोती ने रामभरोसा मीना बनाम मध्यप्रदेश शासन मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए याचिकाकर्ता को “संचित निधि” का लाभ देने का आदेश जारी किया है।

याचिकाकर्ता रामभरोसा मीना, जो कि वर्ष 1982 से 2021 तक लगभग 40 वर्षों तक होमगार्ड सैनिक के रूप में कार्यरत रहे, ने याचिका दायर कर शासन द्वारा उन्हें संचित निधि का लाभ नहीं दिए जाने को चुनौती दी थी। शासन का तर्क था कि याचिकाकर्ता को वर्ष 1991 से 1996 तक सेवा से पृथक किया गया था, अतः वे नियम 2(1) के अंतर्गत पात्र नहीं हैं।

हालाँकि, याचिकाकर्ता ने शासन के 15 दिसंबर 2023 के आदेश का हवाला दिया, जिसमें पूर्व की संपूर्ण सेवा अवधि में एक बार सेवा से पृथक होने पर भी शेष सेवा को मान्यता देकर संचित निधि का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी।

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यह संशोधित आदेश पूर्व प्रभाव से लागू होगा और इसे दिनांक 06.02.2013 से प्रभावी माना जाएगा। इसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को उनकी सेवा के संचित निधि का लाभ प्राप्त होगा, सिवाय उस अवधि के जब वे सेवा से पृथक थे।

शासन का तर्क:
शासन ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को 15 फरवरी 1991 से 31 मई 1996 तक सेवा से पृथक (discharge) किया गया था, अतः शासनादेश की धारा 2(1) के तहत वे इस लाभ के पात्र नहीं हैं।

याचिकाकर्ता की दलील:
याचिकाकर्ता ने शासन के 15 दिसंबर 2023 के एक संशोधित आदेश का हवाला दिया, जिसमें पहले की बाध्यता — कि एक बार भी सेवा से पृथक नहीं होना चाहिए — को बदलकर यह कहा गया कि सेवा से पृथक रहने की अवधि को छोड़कर शेष सेवा अवधि के लिए संचित निधि दी जा सकती है

प्रासंगिक विधिक प्रावधान:

(क) 06.02.2013 का शासनादेश:

इस आदेश की धारा 2(1) में प्रावधान था कि यदि किसी होमगार्ड सैनिक को सेवा से कभी भी पृथक किया गया हो, तो वह “संचित निधि” के लाभ का पात्र नहीं होगा।

(ख) 15.12.2023 का संशोधित आदेश:

इसमें उक्त शर्त को संशोधित करते हुए कहा गया:

“होमगार्ड सैनिक के डिचार्ज वर्षों को छोड़कर शेष सेवा अवधि के लिए संचित निधि की गणना की जाएगी।”

यह स्पष्ट करता है कि सेवा से पृथक किए गए वर्षों को छोड़कर बाकी सेवा को मान्यता दी जाएगी।

4. न्यायालय की विधिक विवेचना:

(i) संशोधन की व्याख्या (Amendment by Substitution):

न्यायालय ने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Shamarao V. Parulekar v. District Magistrate, Thana (1952) और Income Tax Officer v. Vikram Sujitkumar Bhatia (2024) पर भरोसा करते हुए यह सिद्ध किया कि जब किसी प्रावधान में संशोधन “Substitution” द्वारा किया जाता है, तो उसका प्रभाव पूर्वप्रभावी (Retrospective) होता है।

(ii) न्यायालय की टिप्पणी:

न्यायालय ने कहा कि संशोधित शर्त को 06.02.2013 के आदेश में उसी समय से जोड़ा जाना चाहिए जब वह प्रभावी हुआ था, न कि केवल 15.12.2023 से।

(iii) प्रशासनिक विवेक का न्यायिक नियंत्रण:

न्यायालय ने यह भी कहा कि जब कार्यपालिका अपने विवेक से किसी नीति में परिवर्तन करती है, तो यदि वह नीति संविधान अथवा अधिनियम के विपरीत नहीं है और व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करती, तो न्यायालय उसमें हस्तक्षेप नहीं करता।

5. न्यायालय का निर्णय:

न्यायालय ने यह घोषित किया कि:

  • याचिकाकर्ता को “संचित निधि” का लाभ मिलना चाहिए।
  • 15.02.1991 से 31.05.1996 की अवधि को छोड़कर शेष सेवा अवधि को मान्यता मिलेगी।
  • शासन को निर्देश दिया गया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को लाभ का भुगतान किया जाए।

6. महत्वपूर्ण विधिक निष्कर्ष:

  • Substitution द्वारा किया गया संशोधन पूर्वप्रभावी होता है।
  • सेवा से पृथक होने की अवधि को छोड़कर शेष सेवा को संचित निधि हेतु मान्यता दी जा सकती है।
  • नीति संशोधन का लाभ उन सभी को मिलेगा जो संशोधन से पहले सेवा में रह चुके हैं।
  • कार्यपालिका की नीतिगत व्याख्या न्यायालय की सीमित न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

Source – MP High Court

Download Judgement PDF