हमारा कानून

मानसिक रोग का बहाना कर अपील, हाईकोर्ट ने कहा – सहमति से दिया गया तलाक अब नहीं पलटा जा सकता”- MP HIGH COURT

स्मृति अदीति चक्रवर्ती बनाम तीवन प्रसाद प्रजापति

मामला: स्मृति अदीति चक्रवर्ती बनाम तीवन प्रसाद प्रजापति
प्रथम अपील संख्या: FA No. 1523/2023
निर्णय दिनांक: 03 जुलाई 2025
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री दिनेश कुमार पालीवाल, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर की खंडपीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री दिनेश कुमार पालीवाल सम्मिलित थे, ने स्मृति अदीति चक्रवर्ती बनाम तीवन प्रसाद प्रजापति मामले में पारित एक महत्वपूर्ण निर्णय में पति-पत्नी के बीच सहमति से प्राप्त तलाक की डिक्री को वैध ठहराते हुए अपील को खारिज कर दिया है।

यह अपील हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 28 के अंतर्गत दाखिल की गई थी, जिसमें अपीलकर्ता (पत्नी) ने आरोप लगाया था कि दिनांक 01.05.2023 को कोटमा, जिला अनूपपुर के प्रथम जिला न्यायाधीश द्वारा पारित तलाक की सहमति डिक्री फर्जी तरीके से ली गई है।

अपील में यह कहा गया कि जब सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए, तब अपीलकर्ता मानसिक रूप से अस्वस्थ थीं और उनके साथ धोखाधड़ी की गई। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि तलाक की डिक्री छह माह की वैधानिक अवधि पूर्ण होने से पहले पारित कर दी गई, जो नियमों के विरुद्ध है।

हालाँकि, न्यायालय ने इन सभी दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि:

  • अपीलकर्ता एक शिक्षित महिला हैं, जो केंद्रीय विद्यालय में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं।
  • उन्होंने तलाक के पहले और दूसरे चरण की सुनवाई में खुद अदालत में उपस्थित होकर बयान दिया था, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि वे अपनी इच्छा से तलाक ले रही हैं और कोई दबाव, धमकी या मानसिक अस्थिरता का विषय नहीं है।
  • मानसिक बीमारी से संबंधित दस्तावेज़ ट्रायल कोर्ट में कभी प्रस्तुत नहीं किए गए और पहली बार इस अपील में लगाए गए हैं, जो संदेहास्पद प्रतीत होते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों (जैसे Manisha Anand v. Nilesh AnandPushpa Devi Bhagat v. Rajinder Singh) का हवाला देते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सहमति से प्राप्त डिक्री के विरुद्ध अपील सुनवाई योग्य नहीं होती, और यदि धोखाधड़ी का आरोप हो तो उसी ट्रायल कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए।

प्रमुख कानूनी प्रश्न:

  1. क्या सहमति से पारित तलाक डिक्री के विरुद्ध अपील न्यायालय में विचारणीय (Maintainable) है?
  2. क्या मानसिक अस्वस्थता और धोखाधड़ी के आधार पर डिक्री को शून्य किया जा सकता है?
  3. क्या छह माह की प्रतीक्षा अवधि से पहले डिक्री पारित होना अवैध है?

कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण:

1. धारा 96(3) सीपीसी (CPC)

“कोई अपील उस डिक्री के विरुद्ध नहीं की जा सकती जो पक्षकारों की सहमति से पारित की गई हो।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति से पारित डिक्री के विरुद्ध धारा 96(3) CPC के तहत अपील का अधिकार बाधित है।

2. Order 23 Rule 3 और Rule 3-A, CPC:

  • Rule 3: यदि कोर्ट यह माने कि समझौता वैध है तो उसे डिक्री के रूप में पारित किया जा सकता है।
  • Rule 3-A: ऐसे समझौते को अमान्य ठहराने के लिए अलग से कोई वाद (Suit) दायर नहीं किया जा सकता।
  • निष्कर्ष: केवल उसी कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review/Recall) दी जा सकती है जिसने डिक्री पारित की हो। अपील नहीं की जा सकती।

3. सुप्रीम कोर्ट की पूर्ववर्ती मिसालें:

  • Pushpa Devi Bhagat v. Rajinder Singh (2006) 5 SCC 566: सहमति डिक्री केवल उसी कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है जिसने डिक्री पारित की हो। अपील, स्वतंत्र वाद और अन्य माध्यम निषिद्ध हैं।
  • Manisha Anand v. Nilesh Anand (SLP 2025): यदि धोखाधड़ी या मानसिक अस्वस्थता का आरोप हो तो पक्षकार को ट्रायल कोर्ट में ही आवेदन देना चाहिए, न कि उच्च न्यायालय में अपील।
  • Rama Narang v. Ramesh Narang (2006) 11 SCC 114: सहमति डिक्री केवल समझौते का नहीं बल्कि न्यायालय की मुहर लगी वैधानिक डिक्री है, जिसमें अदालत की स्वीकृति सम्मिलित होती है।

हाईकोर्ट की विधिक टिप्पणियाँ:

  1. अपील विचारणीय नहीं:
    चूंकि यह डिक्री पक्षकारों की सहमति से पारित की गई थी, इसलिए धारा 96(3) CPC स्पष्ट रूप से अपील की अनुमति नहीं देती।
  2. मानसिक रोग के दस्तावेज संदिग्ध:
    अपीलकर्ता ने ट्रायल कोर्ट में कभी मानसिक रोग से संबंधित कोई दस्तावेज या आपत्ति नहीं रखी। यह बाद में गढ़ी गई कहानी प्रतीत होती है।
  3. 6 माह की अवधि पर आपत्ति अनुपयुक्त:
    दोनों पक्षों की सुनवाई दो बार हुई और कोर्ट द्वारा दोनों को समझाया गया, फिर भी दोनों ने अलग रहने पर सहमति दी। इस प्रकार, प्रक्रिया वैध मानी गई।
  4. अपीलकर्ता शिक्षित सरकारी कर्मचारी:
    एक केंद्रीय विद्यालय की शिक्षिका और सक्षम महिला होने के कारण यह मानना कठिन है कि उन्होंने अनजाने में सहमति दी हो।

अंतिम निर्णय:

  • अपील अस्वीकार्य (Not Maintainable) घोषित की गई।
  • सहमति डिक्री को वैध ठहराया गया।
  • धोखाधड़ी या मानसिक अस्वस्थता के दावे को अदालत ने अविश्वसनीय माना।
  • सभी दलीलों को तथ्यों व कानून के स्तर पर असंगत माना गया।

न्यायिक निष्कर्ष (Judicial Conclusion):

“सहमति से प्राप्त तलाक की डिक्री एक वैधानिक अनुबंध है जिसे केवल उसी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है जिसने उसे पारित किया हो। उच्च न्यायालय अपील में तथ्यात्मक विवादों की पुनः जांच नहीं कर सकता।”

Source – MP High Court

Download Judgement PDF