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17 साल बाद मांगी अनुकंपा नियुक्ति — हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, तुरंत राहत की मंशा न होने का हवाला

माननीय न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया एवं न्यायमूर्ति आशीष श्रॉटी
मामला: सनी सेन बनाम मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य  WA 714/2024
निर्णय दिनांक: 01 अगस्त 2025
न्यायालय: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया एवं न्यायमूर्ति आशीष श्रॉटी

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की डिवीज़न बेंच ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता देना होता है, न कि वर्षों बाद की गई मांगों को पूरा करना।

न्यायालय ने यह पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से नियुक्ति के लिए अत्यधिक विलंब हुआ है और इस विलंब के कारण अनुकंपा नियुक्ति योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक अपवाद है और यह तभी दी जानी चाहिए जब परिवार तत्काल संकट में हो।

मामले की पृष्ठभूमि:

याचिकाकर्ता सनी सेन के पिता शेषनारायण सेन, जो कि शासकीय प्राथमिक विद्यालय, खुटियावद (जिला गुना) में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे, का निधन दिनांक 25.10.2007 को सेवा के दौरान हो गया। याचिकाकर्ता उस समय नाबालिग थे। उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति हेतु 17.10.2019 को आवेदन प्रस्तुत किया, जो कि उनके बालिग होने के लगभग तीन वर्ष बाद किया गया। इस आवेदन को विभाग द्वारा खारिज कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने इसके विरुद्ध पहले रिट याचिका (W.P. No. 12082/2021) दायर की, जिसे एकलपीठ ने दिनांक 07.02.2024 को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता की ओर से आवेदन अत्यधिक विलंब से किया गया तथा परिवार गंभीर आर्थिक संकट में नहीं था।

कानूनी प्रश्न:

क्या मृतक कर्मचारी के पुत्र द्वारा 17 वर्षों बाद किया गया अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन वैध ठहराया जा सकता है, और क्या इतने विलंब के बावजूद उच्च न्यायालय को राहत प्रदान करनी चाहिए?

न्यायालय का दृष्टिकोण एवं निर्णय:

डिवीज़न बेंच (माननीय न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया एवं न्यायमूर्ति आशीष श्रॉटी) ने यह स्पष्ट किया कि:

  1. अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार नहीं, बल्कि अपवाद है – यह केवल उस स्थिति में दी जाती है जब परिवार मृतक के निधन के कारण तत्काल आर्थिक संकट में हो।
  2. विलंब से किया गया आवेदन अस्वीकार्य है – याचिकाकर्ता ने बालिग होने के लगभग तीन वर्ष बाद अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन किया। नीति के अनुसार, यह आवेदन 1 वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए था।
  3. याचिकाकर्ता द्वारा समय पर कोई प्रयास नहीं किया गया – न तो उन्होंने आवेदन में देरी का उचित स्पष्टीकरण दिया, और न ही रिकॉर्ड में यह दर्शाया कि परिवार आर्थिक संकट में है।
  4. सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का संदर्भ – न्यायालय ने Canara Bank v. Ajithkumar G.K. (2025), State of West Bengal v. Debabrata Tiwari (2023), और Umesh Kumar Nagpal v. State of Haryana (1994) जैसे प्रमुख फैसलों का उल्लेख करते हुए यह दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य “तत्काल राहत” है, न कि स्थायी रोजगार की व्यवस्था।

प्रमुख विधिक सिद्धांत:

  • अनुकंपा नियुक्ति नियमों के अधीन है, न कि सहानुभूति के आधार पर अनिवार्य।
  • सहायक के रूप में कार्य की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है जब परिवार की स्थिति अत्यंत दयनीय हो।
  • विलंबित याचिका और वर्षों बाद दायर दावा “न्याय में देरी” की श्रेणी में आता है, जिसे न्यायालय सहन नहीं करता।

निष्कर्ष:

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने यह निर्णय न्यायिक विवेक, संवैधानिक सिद्धांतों (विशेषतः अनुच्छेद 14 व 16) तथा स्थापित न्यायिक दृष्टिकोण के अनुरूप दिया। यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि अनुकंपा नियुक्ति सहानुभूति नहीं, बल्कि नीति और समयबद्धता का विषय है।

Source – MP High Court

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