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सुप्रीम कोर्ट : विवाह संबंध समाप्त, पर पिता को बेटी के विवाह का खर्च उठाना होगा

सुप्रीम कोर्ट

यह मामला पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद और तलाक की कार्यवाही से संबंधित था।

  • पक्षकारों का विवाह 6 मई 1996 को हुआ था और उनके दो बच्चे हैं – एक बेटी (1997) और एक बेटा (1999)।
  • वर्ष 2009 में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक की याचिका दायर की, जिसमें पत्नी पर मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) के आरोप लगाए।
  • पत्नी ने इसके जवाब में घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज कराई।

घरेलू हिंसा मामले में प्रारंभिक स्तर पर पत्नी को प्रतिमाह ₹6,300/- भरण-पोषण की राशि तय की गई, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹7,500/- किया गया। बाद में अपीलीय न्यायालय ने पति को दोषी पाते हुए पत्नी को ₹2,00,000/- मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने बढ़ाकर ₹7,00,000/- कर दिया।


निचली अदालत और हाईकोर्ट का निर्णय

फैमिली कोर्ट ने 20 सितम्बर 2019 को पति के पक्ष में तलाक डिक्री जारी की। पत्नी ने इसे दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी तलाक को बरकरार रखते हुए कहा:

  • दोनों पक्षों के बीच विवाह के शुरुआती समय से ही विवाद रहे।
  • पत्नी द्वारा बार-बार पुलिस शिकायतें करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
  • 2009 से दोनों अलग रह रहे हैं और मेल-मिलाप की कोई संभावना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में अपील

पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, लेकिन केवल बेटी की शादी के खर्च के मुद्दे पर राहत मांगी। पत्नी की ओर से कहा गया कि पति की आमदनी है और वह शादी के खर्च में योगदान दे सकता है। पति ने आय होने से इनकार किया।


सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:

  • विवाहिक संबंध वस्तुतः समाप्त हो चुके हैं।
  • तलाक को बरकरार रखने का कोई कारण नहीं है।
  • बेटी की शादी के खर्च को लेकर पत्नी का दावा उचित है।
  • पिता का दायित्व है कि वह अपनी बेटी के विवाह में आर्थिक सहयोग करे, चाहे पति-पत्नी के संबंध खत्म हो चुके हों।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि:

  • पति को ₹10,00,000/- (दस लाख रुपये) का भुगतान बेटी की शादी के खर्च के लिए करना होगा।
  • भुगतान 15 अक्टूबर 2025 तक किया जाए।
  • भुगतान न करने की स्थिति में अपील फिर से खोली जाएगी।
  • तलाक डिक्री फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्णय के अनुसार बरकरार रहेगी।

कानूनी महत्व

यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि:

  • सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि तलाक के बाद भी पिता का कर्तव्य समाप्त नहीं होता और बेटी की शादी में योगदान देना उसकी जिम्मेदारी है।
  • कोर्ट ने यह भी दोहराया कि झूठी या बार-बार की गई शिकायतें मानसिक क्रूरता मानी जा सकती हैं और तलाक का आधार बन सकती हैं।
  • इस केस में महिला द्वारा केवल सीमित राहत (बेटी की शादी खर्च) की मांग को कोर्ट ने सराहा।

Case Citation

मामला: गीता @ रीता मिश्रा बनाम अजय कुमार मिश्रा,सिविल अपील संख्याएँ: C.A. No 11787-11792/2025 @ SLP(C) Nos. 15168-15173/2024,
न्यूट्रल सिटेशन:2025 INSC 1102
कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया,
पीठ:माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं माननीय न्यायमूर्ति संदीप मेहता
निर्णय दिनांक: 12-09-2025

Source- Supreme Court Of India

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