सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण प्रकरणों की सुनवाई दिनांक 24 सितम्बर 2025 को होगी। इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार ने तमिलनाडु राज्य के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद पी. विलसन तथा सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता शशांक रतनु को ओबीसी आरक्षण के पक्ष में प्रभावी पैरवी करने के लिए अधिकृत किया है।
सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी वर्ग के होल्ड उम्मीदवारों की ओर से भी वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, वरुण ठाकुर, विनायक प्रसाद शाह, उदय कुमार साहू और हनुमंत लोधी पक्ष रखेंगे।
यह सुनवाई ओबीसी वर्ग के 27% आरक्षण और लंबित भर्तियों पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है। लाखों अभ्यर्थी इस सुनवाई से आशा लगाए बैठे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय उनके भविष्य का रास्ता साफ करेगा।
ओबीसी आरक्षण विवाद की पृष्ठभूमि
ओबीसी आरक्षण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में विवाद सामने आए हैं। मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाकर 27% करने का निर्णय राज्य सरकार ने लिया था, लेकिन इस पर कानूनी आपत्तियाँ उठीं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया।
वर्तमान में कई भर्तियाँ और चयन प्रक्रियाएँ होल्ड पर हैं क्योंकि अदालत का अंतिम निर्णय आना बाकी है। लाखों ओबीसी अभ्यर्थी इस फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि इसका सीधा असर उनकी नियुक्तियों और भविष्य पर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की अहमियत
24 सितम्बर 2025 को होने वाली सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि 27% ओबीसी आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के अनुरूप है या नहीं। इसके साथ ही अदालत इस बात पर भी विचार करेगी कि क्या राज्य सरकार द्वारा आरक्षण बढ़ाने के लिए पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक आंकड़े और बैकवर्डनेस डेटा पेश किए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराता है तो ओबीसी वर्ग को बड़ा लाभ मिलेगा और लंबित नियुक्तियों का रास्ता साफ होगा।
मध्य प्रदेश सरकार का रुख
मध्य प्रदेश सरकार लगातार यह कहती रही है कि ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण मिलना चाहिए ताकि उन्हें समान अवसर प्राप्त हों और वे मुख्यधारा में शामिल हो सकें।
ओबीसी वर्ग के लिए संभावित परिणाम
यदि सुप्रीम कोर्ट का फैसला ओबीसी आरक्षण के पक्ष में आता है तो राज्य में चल रही भर्ती प्रक्रियाएँ दोबारा शुरू हो सकेंगी और होल्ड पर पड़े हुए चयन परिणाम जारी हो जाएंगे।
वहीं, यदि अदालत आरक्षण प्रतिशत पर आपत्ति जताती है तो राज्य सरकार को अपने निर्णय में संशोधन करना पड़ सकता है। इस स्थिति में नए सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण और डेटा संग्रहण की आवश्यकता हो सकती है।
Source – OBC Advocates Welfare Association
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