भारत में चेक बाउंस मामलों की संख्या न्यायिक प्रणाली पर असाधारण बोझ डाल रही है। लाखों केस लंबित हैं और अधिकांश मामले वित्तीय लेन-देन से जुड़े होते हैं। इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने 25 सितम्बर 2025 को Sanjabij Tari बनाम Kishore S. Borcar (Criminal Appeal No. 1755 of 2010) में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। यह निर्णय न केवल मामले के तथ्यों और कानून की व्याख्या करता है बल्कि चेक बाउंस मामलों की सुनवाई को तेज़ करने के लिए कई नये दिशा-निर्देश भी जारी करता है।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ
1. धारा 138 NI Act का उद्देश्य
- धारा 138 का मुख्य मकसद चेक को विश्वसनीय भुगतान साधन बनाना है।
- यह केवल दंडात्मक नहीं बल्कि वित्तीय अनुशासन लागू करने का साधन है।
2. धारणा (Presumptions) – धारा 118 और 139 NI Act
- यदि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार है, तो यह मान लिया जाएगा कि चेक कानूनी देनदारी के लिए जारी हुआ है।
- यह धारणा rebuttable (खंडन योग्य) है, लेकिन प्रारंभिक बोझ (onus) आरोपी पर होता है।
3. आयकर अधिनियम की धारा 269SS
- यदि ₹20,000/- से अधिक नकद लेन-देन होता है, तो यह केवल दंडनीय है (धारा 271D के तहत), लेकिन इससे लेन-देन अवैध या अमान्य नहीं हो जाता।
- इसलिए नकद लेन-देन से भी धारा 138 NI Act लागू होगी।
4. ब्लैंक चेक बचाव
- आरोपी का यह बचाव कि उसने मित्रता में ब्लैंक चेक दिया था, “अविश्वसनीय और हास्यास्पद” है।
5. नोटिस का जवाब न देना
- यदि आरोपी ने कानूनी नोटिस का जवाब नहीं दिया, तो यह माना जाएगा कि शिकायतकर्ता का दावा सही है।
6. हाईकोर्ट की गलती
- संशोधन (revision) में हाईकोर्ट को तथ्यों की पुनः समीक्षा नहीं करनी चाहिए।
- समवर्ती निष्कर्षों को पलटना “अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण” है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देश
(A) समन और सेवा
- आरोपी को समन केवल डाक से नहीं, बल्कि ई-मेल, व्हाट्सएप और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी भेजा जाएगा।
- शिकायतकर्ता को समन की सेवा का शपथपत्र दाखिल करना होगा।
(B) ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था
- जिला न्यायालयों में UPI/QR कोड से ऑनलाइन भुगतान की सुविधा अनिवार्य होगी।
- आरोपी सीधे राशि चुका सकेगा और शिकायतकर्ता को इसकी सूचना मिलेगी।
(C) शिकायत का संक्षिप्त प्रारूप
हर शिकायत में एक सिनॉप्सिस फॉर्मेट अनिवार्य होगा, जिसमें –
- पक्षकारों का विवरण
- चेक की जानकारी
- बाउंस का कारण
- नोटिस की स्थिति
- मांगी गई राहत
(D) त्वरित ट्रायल
- धारा 138 के मामलों को सारांश ट्रायल के रूप में निपटाना होगा।
- बिना ठोस कारण बताए इसे समन ट्रायल में नहीं बदला जा सकेगा।
(E) कम्पाउंडिंग गाइडलाइन (संशोधित)
- यदि आरोपी सबूत दर्ज होने से पहले राशि चुका देता है → कोई अतिरिक्त लागत नहीं।
- ट्रायल कोर्ट में निर्णय से पहले भुगतान → 5% अतिरिक्त लागत।
- सेशन/हाईकोर्ट में भुगतान → 7.5% अतिरिक्त लागत।
- सुप्रीम कोर्ट में भुगतान → 10% अतिरिक्त लागत।
(F) प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का लाभ
- चेक बाउंस मामलों में दोषियों को Probation of Offenders Act, 1958 का लाभ मिल सकता है।
(G) मॉनिटरिंग और डैशबोर्ड
- दिल्ली, मुंबई और कोलकाता की जिला अदालतों को विशेष डैशबोर्ड बनाना होगा।
- इसमें लंबित मामलों, मासिक निपटान और समझौते की संख्या का डेटा होगा।
केस का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट व सेशन कोर्ट के निर्णय को बहाल किया। आरोपी को आदेश दिया गया कि वह ₹7,50,000/- की राशि 15 किस्तों में (₹50,000/- प्रति माह) अदा करे।
इस निर्णय का महत्व
- कानूनी स्पष्टता: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि नकद लेन-देन होने पर भी धारा 138 लागू होगी।
- प्रोसेस में सुधार: ई-समन, ऑनलाइन भुगतान और डैशबोर्ड जैसी व्यवस्थाएँ न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ और पारदर्शी बनाएंगी।
- आरोपियों के लिए राहत: कम्पाउंडिंग गाइडलाइन में संशोधन से आरोपी जल्दी भुगतान करके सज़ा से बच सकते हैं।
- न्यायपालिका पर बोझ कम होगा: लाखों लंबित मामलों का जल्द निपटारा संभव होगा।
Case Citation
मामला: संजाबिज तारी बनाम किशोर एस. बोर्कर एवं अन्य क्रिमिनल अपील सं. 1755/2010
न्यूट्रल सिटेशन:2025 INSC 1158
निर्णय दिनांक:25 सितंबर 2025
कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
पीठ:माननीय न्यायमूर्ति मनमोहन ,माननीय न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया
अपीलकर्ताओं (Accused) की ओर से: श्री अमरजीत सिंह बेदी
राज्य कर्नाटक (Respondent) की ओर से: किशोर एस. बोर्कर ,अधिवक्ता श्री अंकित यादव
Source- Supreme Court Of India
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