यह मामला 4-5 मई 2021 की रात दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में हुई हिंसक घटना से जुड़ा है। FIR के अनुसार, आरोपी सुशील कुमार और उनके साथियों ने व्यक्तिगत रंजिश के कारण कई व्यक्तियों का अपहरण किया और उन्हें स्टेडियम ले जाकर लाठियों, डंडों और हथियारों से हमला किया। इस हमले में गंभीर चोटें आईं, जिनमें से एक पीड़ित सागर धनखड़ की मौत हो गई।
जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल से खून से सना कपड़ा, लकड़ी के डंडे और एक लोडेड डबल बैरल गन बरामद की। एक सह-आरोपी से मिले मोबाइल में घटना का वीडियो भी मिला, जिसकी FSL जांच में किसी भी तरह की एडिटिंग या छेड़छाड़ नहीं पाई गई।
घटना के बाद सुशील कुमार फरार हो गए, जिसके चलते अदालत ने गैर-जमानती वारंट जारी किया और दिल्ली पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया। अंततः 23 मई 2021 को उन्हें गिरफ्तार किया गया।

हाई कोर्ट का आदेश
दिल्ली हाई कोर्ट ने 4 मार्च 2025 को सुशील कुमार को नियमित जमानत दे दी थी। हाई कोर्ट ने इस दौरान उनके लंबे समय से जेल में रहने और प्रमुख गवाहों के बयान दर्ज होने जैसे कारणों को ध्यान में रखा।
सुप्रीम कोर्ट में अपील
पीड़ित पक्ष (अशोक धनखड़) और दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस जमानत आदेश को चुनौती दी। उनका कहना था कि—
- आरोप गंभीर हैं (हत्या, अपहरण, हमला और हथियार अधिनियम के तहत मामले)
- आरोपी का प्रभाव गवाहों पर पड़ सकता है
- आरोपी पहले भी फरार रह चुका है
- गवाहों के मुकरने का पैटर्न दिख रहा है, विशेषकर तब जब आरोपी को अस्थायी जमानत दी गई
कानूनी तर्क और सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर जोर दिया—
- जमानत रद्द करना और जमानत आदेश को निरस्त करना अलग बातें हैं – जमानत आदेश निरस्त करने में यह देखा जाता है कि क्या आदेश देते समय अदालत ने सभी जरूरी तथ्यों और कानूनों को ध्यान में रखा था या नहीं।
- गंभीर अपराधों में जमानत का मानदंड सख्त होना चाहिए – कोर्ट ने Kalyan Chandra Sarkar v. Rajesh Ranjan, Neeru Yadav v. State of U.P., और अन्य मामलों के संदर्भ में कहा कि अपराध की गंभीरता, आरोपी का व्यवहार, सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना, और गवाहों पर दबाव की आशंका को प्राथमिकता से देखना जरूरी है।
कोर्ट ने पाया कि—
- आरोपी घटना के बाद फरार रहा और गिरफ्तारी से बचने के लिए छुपता रहा।
- आरोपी का समाज में प्रभाव है (ओलंपियन और नामी पहलवान), जिससे गवाहों पर दबाव पड़ सकता है।
- अस्थायी जमानत के दौरान कई गवाह hostile हुए (35 में से 28 गवाह मुकर गए)।
- हाई कोर्ट ने इन गंभीर तथ्यों को अपने आदेश में पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट का जमानत आदेश कानूनी दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है और इसमें जरूरी तथ्यों पर विचार नहीं किया गया। इस आधार पर—
- हाई कोर्ट का जमानत आदेश रद्द किया गया।
- सुशील कुमार को एक सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत में सरेंडर करने का निर्देश दिया गया।
- आरोपी भविष्य में बदलते हालात में फिर से जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं, जिसे merits पर देखा जाएगा।
महत्व
यह फैसला एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि—
- गंभीर अपराधों में जमानत देने से पहले अदालत को आरोपी के प्रभाव, गवाहों की सुरक्षा और मुकदमे की निष्पक्षता पर गहराई से विचार करना चाहिए।
- समाज में प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों में अदालत को अतिरिक्त सतर्क रहना चाहिए, ताकि न्याय की प्रक्रिया पर बाहरी दबाव न पड़े।
- जमानत आदेश देते समय सभी प्रासंगिक तथ्यों का मूल्यांकन अनिवार्य है, अन्यथा ऊपरी अदालत उसे निरस्त कर सकती है।
Case Citation
मामला: Ashok Dhankad बनाम State of NCT of Delhi
कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, क्रिमिनल अपीलेट जूरिस्डिक्शन
जज: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा
Source- Supreme Court of India
Download Judgement PDF
- Order 2 Rule 1 CPC | Frame of suit
- ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत पर विचार कर सुनाई उम्रकैद, फांसी की सजा को किया खत्म : मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ; दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की 15 साल से अधिक सेवाएं पेंशन के लिए जोड़ी जाएंगी,
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट : नगर परिषद कैलारस में 109 संविदा नियुक्तियाँ अवैध, याचिकाएँ खारिज
- सुप्रीम कोर्ट : तेलंगाना रिश्वत प्रकरण में FIR रद्द करने का आदेश बरकरार