XXX बनाम भारत संघ एवं अन्य, W.P.(C) No. 699/2025
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय, भारत
पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
अधिवक्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, राकेश द्विवेदी सहित अन्य
निर्णय: 07 अगस्त 2025
उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 15 दिसंबर 1999 को सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ द्वारा अपनाई गई “इन-हाउस प्रोसीजर” के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराने की मांग की गई थी। यह प्रक्रिया न्यायपालिका के आत्म-अनुशासन और नैतिक मानकों को बनाए रखने के उद्देश्य से बनाई गई है, जिसके तहत जजों के आचरण से जुड़े मामलों की आंतरिक जांच की जाती है।
पृष्ठभूमि
- इलाहाबाद हाईकोर्ट (पूर्व में दिल्ली हाईकोर्ट) के एक न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित “इन-हाउस प्रक्रिया” की संवैधानिकता को चुनौती दी थी। खासतौर पर पैराग्राफ 5(b) और 7(ii) को लेकर विवाद था, जिसमें CJI को जांच समिति की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजने व हटाने की सिफारिश करने का अधिकार दिया गया है।
- याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि इन प्रावधानों से संविधान के अनुच्छेद 124, 217, 218 और मौलिक अधिकार (14, 21) का उल्लंघन होता है।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायाधीश के सरकारी बंगले में आग लगने के बाद जले हुए नोट मिले, जिससे अनियमितता की आशंका पैदा हुई। CJI ने इन-हाउस प्रक्रिया के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई और न्यायिक कार्य रोक दिया। न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने और जांच में शामिल होने का मौका मिला। जांच समिति ने गम्भीर कदाचार की पुष्टि की और हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की। CJI ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को रिपोर्ट भेज दी।
याचिकाकर्ता की दलीलें
- यह प्रक्रिया संसद द्वारा तय संवैधानिक जांच का विकल्प या उससे अतिरिक्त है, जिससे अधिकारों का हनन होता है।
- जांच समिति की अनुशंसा/रिपोर्ट बगैर पर्याप्त सुरक्षा के सार्वजनिक क्षेत्र में डालना संवैधानिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष
- कानूनी आधार: इन-हाउस प्रक्रिया पूर्णतः वैध है, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों (C. Ravichandran Iyer, Judges Inquiry Act, Additional District and Sessions Judge ‘X’) और अनुच्छेद 141 पर आधारित है।
- जांच की प्रकृति: यह केवल प्राथमिक (प्रारंभिक) जांच है, जिसे हटाने का अंतिम अधिकार संसद के पास है। इन-हाउस प्रक्रिया खुद हटाने का तरीका नहीं है।
- न्यायसंगत प्रक्रिया: न्यायाधीश को पर्याप्त अवसर मिलता है; गोपनीयता जरूरी है ताकि न्यायिक स्वतंत्रता एवं संस्थागत साख बनी रहे। रिपोर्ट सार्वजनिक करना उचित नहीं।
- संविधान से संगति: CJI का रिपोर्ट भेजना या सिफारिश करना संसद की शक्ति को सीमित नहीं करता, अंतिम निर्णय संसद और राष्ट्रपति का ही होता है।
- याचिका की देरी: याचिकाकर्ता ने जांच के दौरान कोई आपत्ति नहीं की, इसलिए बहुत देर से याचिका दाखिल करना अनुचित माना गया।
निष्कर्ष
- याचिका खारिज। “इन-हाउस प्रक्रिया” के पैराग्राफ 5(b) और 7(ii) वैध, संविधानसंगत हैं, ये मौलिक अधिकारों या संसद की शक्ति का उल्लंघन नहीं करते।
- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आंतरिक अनुशासन की यह प्रक्रिया न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाती है।
- पूरी प्रक्रिया गोपनीय, निष्पक्ष और संस्थागत गरिमा की रक्षा करती है।
संवैधानिक ढांचा और प्रासंगिक क़ानून
- संविधान: Articles 124(4)-(5), 217, 218 — जिनसे यह सिद्ध होता है कि न्यायाधीशों को हटाने की अंतिम/न्यायिक प्रक्रिया संसद के माध्यम से (इम्पीचमेंट) ही है; संसद को प्रक्रिया निर्धारित करने का अधिकार Article 124(5) के तहत है।
- Judges (Inquiry) Act, 1968 / Inquiry Act: संसद द्वारा निर्धारित औपचारिक प्रक्रिया जिसमें चार्ज निकाले जाना, साक्ष्य, क्रॉस-एक्सामिनेशन आदि शामिल हैं — यानि इम्पीचमेंट/रिमूवल की संवैधानिक प्रक्रिया काफी विस्तृत और कड़ी है।
- Judges (Protection) Act, 1985: सेक्शन 3(1)-3(2) की धाराएँ न्यायिक कार्य के सन्दर्भ में सुरक्षा देती हैं परन्तु 3(2) में गैर-अवरोधक प्रावधान है जो केन्द्र/राज्य/सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट आदि को ‘न्यायिक, प्रशासनिक या अन्य’ कार्रवाई करने का अधिकार संजोकर रखता है — न्यायालय ने इस ‘otherwise’ शब्द का अर्थ इन-house जांच के अनुकूल समझा।
Source – Supreme Court Of India
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