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30 साल से दावे के बावजूद दस्तावेज़ विफल, कोर्ट ने किया भूमि स्वामित्व का निर्धारण-MP हाईकोर्ट

प्रकरण: रामचरण सेहरिया एवं एक अन्य बनाम संतोष कुमार जैन SA 213/2024
न्यायालय: उच्च न्यायालय, मध्यप्रदेश, खंडपीठ ग्वालियर
निर्णय दिनांक: 14 जुलाई 2025
न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति जी. एस. अहलूवालिया

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर के माननीय न्यायमूर्ति श्री जी.एस. अहलूवालिया ने द्वितीय अपील संख्या 213/2024 में निर्णय सुनाते हुए अपील को खारिज कर दिया और निचली अदालतों द्वारा पारित स्थायी निषेधाज्ञा एवं स्वामित्व की घोषणा को सही ठहराया।

प्रकरण में रामचरण सेहरिया एवं एक अन्य द्वारा अपील प्रस्तुत की गई थी, जिसमें उन्होंने संतोष कुमार जैन द्वारा दायर की गई भूमि स्वामित्व और स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री को चुनौती दी थी। मामले में विवादित भूमि, जिला गुना के प्रतिभा कॉलोनी में स्थित 450 वर्ग फीट का एक भूखंड थी, जिसे वादी ने रजिस्ट्री के माध्यम से वर्ष 2009 में खरीदा था।

प्रतिवादियों का दावा था कि उन्होंने उक्त भूमि पर 30 वर्षों से मकान बनाकर निवास किया है, लेकिन इस संबंध में कोई वैध दस्तावेज़ या पक्के साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए गए। अपील में दिए गए बिजली बिल, संपत्ति कर रसीद आदि को न्यायालय ने अपर्याप्त एवं असंबंधित मानते हुए खारिज कर दिया।

माननीय उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि:

  • वादी का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है।
  • रजिस्ट्री और गवाही से स्वामित्व प्रमाणित है।
  • प्रतिवादियों द्वारा दावा की गई “दखल एवं निर्माण” की बात साक्ष्य के अभाव में सिद्ध नहीं हो सकी।
  • अपील में प्रस्तुत दस्तावेज़ न्याय के लिए अनिवार्य नहीं थे और ट्रायल के समय भी उपलब्ध थे, अतः उन्हें बाद में स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता।

1. विधिक प्रश्न (Legal Issues):

निम्नलिखित मुख्य विधिक प्रश्न न्यायालय के समक्ष थे:

  • क्या वादी भूमि का विधिक स्वामी है?
  • क्या प्रतिवादी का कब्जा वैध है अथवा वह अवैध अतिक्रमणकारी हैं?
  • क्या द्वितीय अपील में प्रस्तुत अतिरिक्त दस्तावेज (Order 41 Rule 27 CPC) न्याय के लिए आवश्यक हैं?
  • क्या निचली अदालतों द्वारा की गई तथ्यात्मक विवेचना “पर्सवर्स” (perverse) थी?

2. विधिक स्थिति एवं तर्क:

(a) स्वामित्व की वैधता (Title Validity):

वादी संतोष कुमार जैन ने वर्ष 2009 में रजिस्टर्ड विक्रय पत्र (Registered Sale Deed) प्रस्तुत किया, जो वैध स्वामित्व दर्शाने वाला प्रबल दस्तावेज है। इसके साथ ही वादी के नाम खसरा पंचसाला एवं किश्तबंदी खतौनी भी दाखिल की गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उनका नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज है।

न्यायिक निष्कर्ष: वादी का स्वामित्व विधिक रूप से सिद्ध हुआ।

(b) कब्जे का विवाद (Possession Claim):

  • प्रतिवादी ने दावा किया कि वे 30 वर्षों से भूमि पर बने दो कमरों में रह रहे हैं और उन्होंने उक्त भूमि के एवज में वादी के बड़े भाई को ₹50,000/- दिए थे।
  • किन्तु न तो ₹50,000/- की रसीद प्रस्तुत की गई, न ही यह सिद्ध किया गया कि उन्होंने किसी प्रॉपर्टी संबंधी अधिकार के तहत निर्माण किया था।
  • प्रतिवादी की ओर से रामश्री बाई (DW1) और विश्नुप्रसाद (DW2) की गवाही आई, किंतु उसमें कब्जे की विधिक या तथ्यात्मक पुष्टि नहीं हो सकी।

न्यायिक निष्कर्ष: प्रतिवादी का कब्जा असिद्ध, अवैध और अधिकारविहीन पाया गया।

(c) Order 41 Rule 27 CPC – अतिरिक्त साक्ष्य का अनुरोध:

  • प्रतिवादी ने अपील में अतिरिक्त दस्तावेज जैसे – स्वच्छता कर की रसीद और बिजली बिल प्रस्तुत किए।
  • कोर्ट ने पाया कि ये दस्तावेज ट्रायल के समय भी उपलब्ध थे और कोई उचित कारण नहीं दिया गया कि ये पहले क्यों नहीं पेश किए गए।
  • बिजली बिलों में अधिकांश समय 0 यूनिट खपत दर्शाई गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि परिसर में वास्तव में निवास नहीं किया जा रहा था।
  • एक रसीद वर्ष 2022 की है जबकि मामला वर्ष 2017 में दायर हुआ था, इस प्रकार यह दस्तावेज “post-facto fabrication” के अंतर्गत आता है।

न्यायिक निष्कर्ष: दस्तावेज़ न तो न्याय के लिए आवश्यक थे और न ही विश्वसनीय; अतः अतिरिक्त साक्ष्य को अस्वीकार करना विधिसम्मत था।

(d) धारा 100 CPC के अंतर्गत हस्तक्षेप की सीमा:

  • धारा 100 CPC के अंतर्गत उच्च न्यायालय केवल “substantial question of law” उठने पर हस्तक्षेप कर सकता है।
  • अपीलकर्ता कोई भी ठोस विधिक प्रश्न नहीं उठा सके, बल्कि निचली अदालतों के तथ्यान्वेषण को ही चुनौती दी गई थी।
  • न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि तथ्यात्मक निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण हों, तब भी जब तक वे “perverse” न हों, धारा 100 CPC के अंतर्गत उच्च न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

न्यायिक निष्कर्ष: कोई विधिक प्रश्न उत्पन्न नहीं हुआ; तथ्यों में पुनः मूल्यांकन का औचित्य नहीं।

3. निर्णय (Judgment):

  • ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय न्यायालय दोनों द्वारा पारित डिक्री को वैध और यथोचित माना गया।
  • द्वितीय अपील को खारिज कर दिया गया।
  • प्रतिवादी पक्ष किसी प्रकार का अधिकार, कब्जा या विधिक स्वामित्व प्रमाणित नहीं कर सका।

4. निष्कर्ष (Conclusion):

यह निर्णय विधि के उन सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है:

  • कि किसी संपत्ति का स्वामित्व केवल दस्तावेज़ों से ही सिद्ध होता है, मौखिक दावे या अस्पष्ट दस्तावेजों से नहीं।
  • बोझ साक्ष्य का (burden of proof) नियम यह कहता है कि जो दावा करता है, उसे ही प्रमाण देना होता है।
  • अतिरिक्त साक्ष्य केवल तभी स्वीकार किए जाते हैं जब वे अत्यावश्यक हों और पूर्व में उपलब्ध न हों।

Source – MP High Court

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